श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ पुस्तक कवर

श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

गोकुल की मधुर कथाएँ

बाल कृष्ण की शरारतों, माखन चोरी, माता यशोदा के प्रेम और गोकुल की दिव्य लीलाओं की सरल हिंदी कथाएँ पढ़ें।

इस पुस्तक की हिंदी कथाएँ

स्यामंतक मणि: सत्राजीत की सूर्य भक्ति और सूर्यदेव का दिव्य उपहार का चित्र

स्यामंतक मणि: सत्राजीत की सूर्य भक्ति और सूर्यदेव का दिव्य उपहार

द्वारका का राजकुमार सत्राजीत सूर्यदेव का समर्पित भक्त था। वन में उपासना करते समय सूर्यदेव ने स्वयं प्रकट होकर उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे स्यामंतक नामक दिव्य मणि प्रदान की। पढ़ें स्यामंतक मणि की पूरी कथा।

अध्याय 49: पूरी कथा पढ़ें →
मणि का खोना: सत्राजीत का मोह, प्रसेनजीत का शिकार और जाम्बवंत के पास स्यामंतक मणि का चित्र

मणि का खोना: सत्राजीत का मोह, प्रसेनजीत का शिकार और जाम्बवंत के पास स्यामंतक मणि

स्यामंतक मणि से द्वारका में शांति और समृद्धि आई, पर जब कृष्ण ने मणि राजा उग्रसेन को देने का सुझाव दिया तो सत्राजीत ने मना कर दिया। फिर मणि पहनकर शिकार पर गए प्रसेनजीत की वन में मृत्यु हो गई और मणि शेर से होती हुई रीछ जाम्बवंत की गुफा तक जा पहुँची। पढ़ें पूरी कथा।

अध्याय 50: पूरी कथा पढ़ें →
मणि की खोज: सत्राजीत का संदेह, गुफा में कृष्ण और जाम्बवंत का भीषण युद्ध का चित्र

मणि की खोज: सत्राजीत का संदेह, गुफा में कृष्ण और जाम्बवंत का भीषण युद्ध

प्रसेनजीत के न लौटने पर सत्राजीत ने कृष्ण पर मणि के लिए उसे मार डालने का संदेह किया। कृष्ण स्वयं साथियों के साथ वन में खोज पर निकले, शेर के पदचिह्नों के सहारे एक गुफा तक पहुँचे और वहाँ भालू के बच्चे को मणि से खेलते देखा। फिर जाम्बवंत से उनका भीषण युद्ध छिड़ गया। पढ़ें पूरी कथा।

अध्याय 51: पूरी कथा पढ़ें →
कृष्ण, जाम्बवती और सत्यभामा: जाम्बवंत का समर्पण, सत्राजीत की क्षमायाचना और शतधन्वा का षड्यंत्र का चित्र

कृष्ण, जाम्बवती और सत्यभामा: जाम्बवंत का समर्पण, सत्राजीत की क्षमायाचना और शतधन्वा का षड्यंत्र

अट्ठाईस दिन के युद्ध के बाद जाम्बवंत ने कृष्ण के आगे समर्पण कर दिया और मणि के साथ अपनी पुत्री जाम्बवती उन्हें सौंप दी। द्वारका लौटकर कृष्ण ने मणि सत्राजीत को लौटाई, सत्राजीत ने क्षमा माँगी और सत्यभामा का विवाह कृष्ण से तय हुआ। पर शतधन्वा ने सत्राजीत की हत्या कर मणि चुरा ली। पढ़ें पूरी कथा।

अध्याय 52: पूरी कथा पढ़ें →
कृष्ण, शतधन्वा और अक्रूर: शतधन्वा का वध, स्यामंतक मणि और सार्वजनिक सभा का चित्र

कृष्ण, शतधन्वा और अक्रूर: शतधन्वा का वध, स्यामंतक मणि और सार्वजनिक सभा

कृष्ण की शपथ सुनकर शतधन्वा भयभीत हो गया, पर कृतवर्मा और अक्रूर ने भी उसे शरण नहीं दी। मिथिला के निकट कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका अंत किया। फिर अक्रूर के पास रखी स्यामंतक मणि को कृष्ण ने सार्वजनिक सभा में दिखाकर लोगों के संदेह दूर किए और मणि उसे लौटा दी। पढ़ें पूरी कथा।

अध्याय 53: पूरी कथा पढ़ें →
कृष्ण और सुदामा: चावल की पोटली, द्वारका में मित्र का स्वागत और झोंपड़ी से महल का चित्र

कृष्ण और सुदामा: चावल की पोटली, द्वारका में मित्र का स्वागत और झोंपड़ी से महल

गरीब ब्राह्मण सुदामा पत्नी सुशीला के कहने पर चार मुट्ठी चावल की पोटली लेकर पैदल द्वारका पहुँचे। श्रीकृष्ण ने नंगे पैर दौड़कर उन्हें गले लगाया, उनके चरण आँसुओं से धोए और चावल की पोटली को अमूल्य भेंट बताकर स्वीकार किया। सुदामा ने कुछ माँगा नहीं, पर घर लौटने पर उनकी झोंपड़ी महल बन चुकी थी। पढ़ें पूरी कथा।

अध्याय 54: पूरी कथा पढ़ें →
कृष्ण और नरकासुर: पृथ्वी पुत्र का अत्याचार, इंद्र की पुकार और द्वारकाधीश की शरण का चित्र

कृष्ण और नरकासुर: पृथ्वी पुत्र का अत्याचार, इंद्र की पुकार और द्वारकाधीश की शरण

वराह अवतार में भगवान विष्णु ने पृथ्वी को समुद्र से निकाला और पृथ्वी ने नरकासुर को जन्म दिया। वही नरकासुर तीनों लोकों के लिए आतंक बन गया। उसने इंद्र के हाथी, माता अदिति के कुंडल और वरुण का छाता छीन लिया। हारकर इंद्र श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचे। पढ़ें पूरी कथा।

अध्याय 55: पूरी कथा पढ़ें →
कृष्ण और मुर: प्राग्ज्योतिषपुर की दीवारें, पाँच सिरों वाले दानव का अंत और सुदर्शन चक्र का चित्र

कृष्ण और मुर: प्राग्ज्योतिषपुर की दीवारें, पाँच सिरों वाले दानव का अंत और सुदर्शन चक्र

गरुड़ पर सत्यभामा के साथ सवार होकर श्रीकृष्ण नरकासुर की अभेद्य राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे। उन्होंने पर्वत, मायावी अस्त्र, जल और अग्नि की दीवारों को भेद दिया। फिर सोते हुए पाँच सिरों वाले दानव मुर को शंख बजाकर जगाया और सुदर्शन चक्र से उसका अंत किया। पढ़ें पूरी कथा।

अध्याय 56: पूरी कथा पढ़ें →