श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 54
कृष्ण और सुदामा: चावल की पोटली, द्वारका में मित्र का स्वागत और झोंपड़ी से महल
गरीब ब्राह्मण सुदामा पत्नी सुशीला के कहने पर चार मुट्ठी चावल की पोटली लेकर पैदल द्वारका पहुँचे। श्रीकृष्ण ने नंगे पैर दौड़कर उन्हें गले लगाया, उनके चरण आँसुओं से धोए और चावल की पोटली को अमूल्य भेंट बताकर स्वीकार किया। सुदामा ने कुछ माँगा नहीं, पर घर लौटने पर उनकी झोंपड़ी महल बन चुकी थी। पढ़ें पूरी कथा।

गरीबी में भी संतोषी सुदामा अपनी पत्नी सुशीला के कहने पर चार मुट्ठी चावल की पोटली लेकर पैदल द्वारका पहुँचे। श्रीकृष्ण ने नंगे पैर दौड़कर उन्हें गले लगाया, उनके चरण आँसुओं से धोए और चावल को अमूल्य भेंट बताकर स्वीकार किया, और बिना माँगे ही सुदामा की झोंपड़ी महल में बदल गई।
संतोषी सुदामा और सुशीला का आग्रह
सुदामा कृष्ण के बचपन के दोस्त थे। उनका पालन-पोषण बड़ी गरीबी में हुआ था। आर्थिक सुविधाएँ उनके पास भले ही नहीं थीं, लेकिन ज्ञान का तो उनके पास अपार भंडार था। सुदामा के पास संतोष रूपी धन था, जिसके चलते उन्हें धन का अभाव कभी अनुभव ही नहीं होता था। सुदामा के पास जो कुछ भी था, उसी में वे संतुष्ट रहते थे। लेकिन सुदामा की पत्नी सुशीला बड़ी दुखी रहती थी। एक दिन सुदामा के घर में खाने को भी कुछ नहीं था। आखिरकार भूख से तंग आकर सुशीला सुदामा से बोली, ‘‘मुझे कितने दिन और भूखा रहना पड़ेगा? श्रीकृष्ण आपके इतने घनिष्ठ मित्र हैं। आप उनके पास जाकर उनकी सहायता क्यों नहीं माँग लेते? वे आपकी मदद अवश्य करेंगे।’’
लेकिन सुदामा सुशीला की इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं देते थे। वे आर्थिक सहायता के लिए कृष्ण के पास जाने को तैयार नहीं थे। लेकिन सुशीला उनसे अक्सर यह बात कहती रहती थी। एक दिन सुदामा ने सोचा, ‘मुझे सुशीला का दिल रख लेना चाहिए। मैं कृष्ण से सहायता भले ही न माँगूँ, लेकिन इतने दिनों बाद अपने प्रिय मित्र से भेंट करने का अवसर तो मुझे मिल ही जाएगा।’
यह सोचकर सुदामा ने सुशीला से एक दिन कह ही दिया कि वे कृष्ण से मिलने द्वारका जाएँगे और उन्हें अपने कष्टों के विषय में भी बताएँगे। पति की यह बात सुनकर सुशीला अत्यंत प्रसन्न हुई। जाने के दिन सुदामा ने सुशीला से कहा, ‘‘तुम्हीं बताओ, क्या कृष्ण के पास खाली हाथ जाना ठीक होगा? मैं बहुत दिनों बाद कृष्ण से मिलने जा रहा हूँ। क्या हमारे घर में ऐसा कुछ है जो मैं कृष्ण को भेंट कर सकूँ?’’
चार मुट्ठी चावल की पोटली और द्वारका की पैदल यात्रा
उस समय सुदामा के घर में चावल का एक दाना तक नहीं था। इसलिए सुशीला अपनी पड़ोसन से चार मुट्ठी चावल ले आई। वे चावल एक पोटली में बाँधकर उसने सुदामा को दे दिए। सुदामा वही पोटली लेकर द्वारका की ओर चल पड़े।
रास्ते में वे सोच रहे थे, ‘मैं कृष्ण को पहचान पाऊँगा या नहीं। पता नहीं कृष्ण की रानियों का मेरे प्रति क्या व्यवहार होगा? कृष्ण का व्यवहार तो पूर्ववत् ही होगा, इसमें तो कोई संदेह ही नहीं है।’ कृष्ण और सुदामा दोनों को ही गुरुकुल छोड़े लम्बा समय हो चुका था, इसलिए इस प्रकार के विचार मन में आने स्वाभाविक ही थे। श्रीकृष्ण और सुदामा बचपन में ऋषि सांदीपनि के आश्रम में एक साथ अध्ययन करते थे। जब उन्होंने पढ़ाई समाप्त कर ली तो दोनों ही अपने गृहस्थ जीवन में व्यस्त हो गए। कृष्ण द्वारका में बस गए। सुदामा भी अपने गृहक्षेत्र में चले गए। आश्रम छोड़ने के बाद कृष्ण और सुदामा की भेंट नहीं हुई थी। यह बात भी सत्य थी कि वे दोनों एक-दूसरे को भूले बिल्कुल नहीं थे। मात्र अत्यधिक व्यस्तता के कारण उनकी भेंट सम्भव नहीं हो सकी थी।
पूरे रास्ते सुदामा यही सोचते रहे कि कृष्ण की द्वारका में पहुँचने पर उनके साथ कैसा व्यवहार होगा। सुदामा के पास किसी साधन के लिए पैसे तो थे नहीं, इसलिए वे पैदल ही द्वारका जा रहे थे। काँटों भरे रास्तों पर चलते-चलते उनके पैर छिल गए थे। पैरों में छाले भी पड़ गए थे। सुदामा का पूरा शरीर धूल से सन गया था। उनकी हालत किसी भिक्षुक जैसी ही हो गई थी।
द्वारका में कृष्ण का नंगे पैर दौड़कर स्वागत
इसी हालत में सुदामा द्वारका पहुँच गए। राजमहल पहुँचकर उन्होंने श्रीकृष्ण के पास अपने आगमन की सूचना भेजी। सुदामा का नाम सुनते ही श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। वे नंगे पैर ही महल के द्वार की ओर सुदामा का स्वागत करने दौड़ पड़े। एक गरीब ब्राह्मण और द्वारकाधीश के बीच इतना घनिष्ठ प्रेम देखकर सभी राजमहिलाओं और सेवक-सेविकाओं को बड़ा आश्चर्य हुआ।
महल के द्वार पर आते ही श्रीकृष्ण ने सुदामा को गले लगा लिया और बोले, ‘‘मित्र, तुम इतने दिनों तक कहाँ थे? आज तुम्हें देखकर मैं इतना प्रसन्न हूँ कि शब्दों द्वारा उसे अभिव्यक्त नहीं कर सकता।’’ श्रीकृष्ण का स्पर्श सुदामा के लिए किसी दिव्य अनुभव जैसा था। उनका स्पर्श करते ही सुदामा के शरीर की थकान मिट गई। उन्हें ऐसा लगा जैसे वे पूरी तरह तरोताजा हो गए हों।
श्रीकृष्ण सुदामा को महल के अंदर अपने निजी कक्ष में ले गए। उन्होंने सुदामा को एक स्वर्ण सिंहासन पर बैठाया और स्वयं उनका आदर-सत्कार करने लगे। सुदामा को तो अपनी आँखों पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। उन्हें लग रहा था जैसे वे स्वप्न देख रहे हों। महल की भव्यता देखकर उनकी जुबान पर जैसे ताला पड़ गया था। बड़े अचरज से उनके नेत्र चारों ओर घूम रहे थे।
आँसुओं से चरण धोना और रानियों का सत्कार
कृष्ण ने अपने सेवकों से एक बड़े थाल में सुगंधित जल लाने को कहा, जिससे वे अपने थके हुए मित्र के हाथ-पैर धो सकें। सेवकों ने तुरंत आदेश का पालन किया। कृष्ण ने उस सुगंधित जल से तो उनके चरण धोए ही, अपने आँसुओं से भी धोए। सुदामा के नेत्रों से भी आँसू बह रहे थे। दो मित्रों का यह कैसा मर्मस्पर्शी मिलन था! कृष्ण को सुदामा के पैर धोते देखकर रुक्मिणी, सत्यभामा और अन्य सभी रानियों ने भी ऐसा किया।
फिर कृष्ण ने सेवकों को सुदामा को स्नान कराने का आदेश दिया। इसके बाद सुदामा को पहनने के लिए बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण दिए गए। इसके बाद सुदामा फिर से कृष्ण के सामने आए। सुदामा को देखकर लग रहा था जैसे वे पूरी तरह बदल गए हैं। वे अब वह सुदामा नहीं रह गए थे, जो कृष्ण के पास अपनी पत्नी के कहने पर आए थे। कृष्ण सुदामा की ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने सुदामा को सुगंधित पुष्पों, चंदन, दूर्वा घास, धूप, माला आदि से सजाया। अब तो सुदामा की शोभा भी देखते ही बन रही थी।
फिर श्रीकृष्ण सुदामा के साथ ही भोजन करने बैठे। स्वादिष्ट भोजन करके सुदामा उठे तो उन्हें पान और सुपारी खिलाई गई। इसके बाद सुदामा कृष्ण के साथ वार्तालाप करने लगे। इस समय कृष्ण की सभी पत्नियाँ सुदामा के पास खड़ी उन्हें पंखा झल रही थीं। सबका प्रयास यही था कि सुदामा को किसी प्रकार का कष्ट न होने पाए।
गुरुकुल की स्मृति: सांदीपनि का आशीर्वाद
श्रीकृष्ण सुदामा से बोले, ‘‘मित्र, मुझे पता है कि अत्यधिक गरीबी में रहने के बाद भी तुमने कभी धन की इच्छा नहीं की। तुम्हारे जैसे लोग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं जो कि निःस्वार्थ भाव से मुझे स्मरण करते हैं। वे हमेशा मेरा नाम जपते हैं और बदले में कुछ नहीं चाहते। मित्र, उस समय को याद करो जब हम दोनों गुरुकुल में एक साथ पढ़ते थे। एक दिन गुरुजी ने हमें जंगल जाकर ईंधन के लिए लकड़ियाँ ले आने को कहा था। वहाँ हम भीषण तूफान में फँस गए थे। सूर्यास्त के काफी पहले ही वन में पूरी तरह अंधेरा छा गया था। घनघोर बारिश भी हो रही थी। हम जंगल में रात काटने पर विवश हो गए थे। जब हम घर नहीं लौटे तो गुरु सांदीपनि स्वयं हमें देखने के लिए जंगल में आए थे। जब उन्होंने हमें वहाँ सकुशल देखा तो बड़े प्रसन्न हुए थे। उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया था कि हमें जो भी कष्ट मिला है, उसके बदले हमारी सारी मनोकामनाएँ पूरी हों। उन्होंने कहा कि मैं तुम लोगों से बहुत प्रसन्न हूँ। मेरी इच्छा की पूर्ति के लिए ही तुम दोनों ने इतना कष्ट सहा।’’
ये सब बातें कहते-कहते कृष्ण उस समय की यादों में खो गए। थोड़ी देर में वे चैतन्य हो गए और फिर बोले, ‘‘अच्छा, यह बताओ, भाभीजी ने मेरे लिए क्या भेजा है? मुझे तुम्हारे हाथ में एक पोटली दिख रही है। तुम अवश्य कुछ छुपा रहे हो। लाओ, पोटली मुझे दो। मैं भी जरा देखूँ। उसमें है क्या?’’
सूखे चावल की पोटली: कृष्ण के लिए अमूल्य भेंट
कृष्ण की बात सुनकर सुदामा को बड़ा संकोच अनुभव हुआ। उन्होंने अपनी आँखें नीची कर लीं। वे भला कृष्ण को सूखे चावल कैसे दे सकते थे?
कृष्ण ने सोचा, ‘सुदामा ने कभी धन की इच्छा नहीं की। ये तो सदा अपने कर्त्तव्यपालन में ही जुटे रहे और कभी ये विचार नहीं किया कि कर्त्तव्यपालन के दौरान धन की प्राप्ति होती है या नहीं। इस बार भी ये यहाँ मात्र अपनी पत्नी के कहने पर आए हैं। मैं इन्हें इतना धन दे दूँगा, जितना देवताओं के लिए भी दुर्लभ होता है।’
यह सोचकर कृष्ण ने चावलों की पोटली मुस्कुराते हुए सुदामा से छीन ली। सुदामा ‘ना-ना’ ही करते रह गए। उसमें सूखे हुए चावल देखकर कृष्ण बोले, ‘‘सुदामा, तुम्हें स्वयं नहीं पता कि तुम मेरे लिए कितनी अमूल्य भेंट लाए हो। सम्पूर्ण संसार का धन मिलकर भी इस उपहार की समानता नहीं कर सकता। यह उपहार लाने के लिए मैं तुम्हें कई-कई बार धन्यवाद देता हूँ।’’ यह कहते हुए कृष्ण ने उस पोटली से एक मुट्ठी चावल निकाल कर खा लिए।
सुदामा की विदाई और उनके मन के विचार
अगले कुछ दिनों तक सुदामा कृष्ण के महल में ही रहे। जीवन की लगभग हर सुख-सुविधा का उन्होंने वहाँ रहकर आनंद लिया। लेकिन उन्होंने अपना वह उद्देश्य नहीं बताया, जिसकी पूर्ति के लिए उनकी पत्नी ने उन्हें वहाँ भेजा था। विदाई के समय भी उन्होंने इस सम्बंध में कुछ नहीं कहा। एक तो सुदामा बड़े संकोची स्वभाव के थे। फिर उनके मन में धन की कोई लालसा भी नहीं थी।
विदाई लेकर सुदामा अपने घर की ओर चल पड़े। कृष्ण के महल में जिस तरह उनका स्वागत-सत्कार हुआ था, उससे वे बड़े प्रसन्न थे। मार्ग पर चलते हुए वे सोच रहे थे, ‘कृष्ण में कोई परिवर्तन नहीं आया है। वे तो सभी से समान रूप से प्रेम करते हैं। उन्होंने मुझ जैसे गरीब ब्राह्मण के पैर धोए और मेरे धूल भरे शरीर की कोई परवाह न करते हुए मुझे गले से लगा लिया। उन्होंने मुझे अपने फूलों से आच्छादित बिस्तर पर लिटाया और रानी रुक्मिणी ने मुझे पंखा झला। कृष्ण ने मेरे पैर दबाए जैसे मैं कोई देवता हूँ। वे जानते थे कि कहीं धन मिलने पर मैं अपना कर्तव्य छोड़कर धन के संग्रह में ही व्यस्त न हो जाऊँ। इसलिए धन न देकर उन्होंने उचित ही किया है। धन पाकर सब कुछ भुला देना मानव स्वभाव है। मैं भी अंततः हूँ तो एक मनुष्य ही।’
झोंपड़ी से महल: कृष्ण की कृपा
पूरे रास्ते यही सब विचार करते हुए सुदामा अपने घर जा पहुँचे। यह देखकर वे भौंचक्के रह गए कि उनकी छोटी सी झोंपड़ी के स्थान पर अब एक भव्य महल खड़ा है। उस महल के चारों ओर बहुत से सुंदर बगीचे हैं। उस महल की शोभा देखते ही बन रही थी। सुदामा ने यही सोचा कि वे किसी गलत स्थान पर आ गए हैं। यह सोचकर वे पीछे मुड़े।
तभी उन्हें अपनी पत्नी सुशीला की आवाज सुनाई दी। उन्होंने आवाज की दिशा में देखा। उनके आश्चर्य का उस समय तो पार ही न रहा, जब बहुत से दास और दासियाँ उनके स्वागत-सत्कार के लिए महल से बाहर निकल आए। वे सब हाथों में थाल लिए स्वागत गीत गा रहे थे। सुशीला भी अपने पति के स्वागत के लिए महल से बाहर निकल आई। वह उस समय बेशकीमती साड़ी और बहुमूल्य आभूषण पहने हुए थी। बहुत सी दासियाँ उसे घेरे हुए थीं।
अपनी पत्नी को इतने सुंदर महल में रहते और बहुमूल्य वस्त्र-आभूषण पहने देखकर सुदामा चकित रह गए। अब वे समझ गए कि कृष्ण के प्रभाव से ही उनकी झोंपड़ी महल में बदल गई थी। सुदामा का रोम-रोम कृष्ण के प्रति कृतज्ञता की भावना से खिल उठा। सुदामा सोच रहे थे, ‘सत्य बात तो यह है कि कृष्ण ही संसार के स्वामी हैं। उनके भक्तों को उन्हें अपने कष्टों के विषय में स्वयं कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है। वे तो सब जानते ही हैं। मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे कृष्ण जैसा मित्र मिला। ईश्वर मुझे प्रत्येक जन्म में कृष्ण जैसा ही मित्र दे।’
फिर सुदामा आराम से उस महल में पत्नी सुशीला के साथ रहने लगे। अब पूरी तरह सम्पन्न सुदामा श्रीकृष्ण की भक्ति में लगे रहे।
भक्ति से जुड़ा संदेश: निःस्वार्थ प्रेम, भाव की भेंट और भगवान की कृपा
सुदामा की कथा भक्ति का सबसे सुंदर उदाहरण है, क्योंकि इसमें भक्त कुछ माँगता नहीं और भगवान सब कुछ दे देते हैं। सुदामा गरीबी में भी संतोष रूपी धन के साथ जीते थे और द्वारका जाकर भी अपनी पत्नी के भेजे उद्देश्य का एक शब्द नहीं बोले। कृष्ण ने स्वयं कहा कि सुदामा जैसे लोग उँगलियों पर गिने जा सकते हैं जो निःस्वार्थ भाव से उन्हें स्मरण करते हैं और बदले में कुछ नहीं चाहते। जो भक्त बिना माँगे प्रभु का स्मरण करता है, उसकी हर आवश्यकता प्रभु स्वयं जान लेते हैं।
कृष्ण ने चार मुट्ठी सूखे चावल को जिस प्रेम से स्वीकार किया, वह भक्ति में भाव की महिमा को प्रकट करता है। भगवान को वस्तु नहीं, भक्त का प्रेम चाहिए। सुदामा को संकोच था कि वे सूखे चावल कैसे दें, पर कृष्ण के लिए वही सम्पूर्ण संसार के धन से बढ़कर थे। भक्त के पास जो है, वही यदि श्रद्धा और प्रेम से अर्पित किया जाए, तो प्रभु उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं।
कृष्ण का नंगे पैर दौड़ना, सुदामा को गले लगाना और अपने आँसुओं से उनके चरण धोना भगवान के उस स्वरूप को दिखाता है जो ऊँच-नीच का भेद नहीं देखता। द्वारकाधीश होकर भी उन्होंने एक गरीब ब्राह्मण का सम्मान किया। सुदामा के विचार भी भक्ति की परिपक्वता दिखाते हैं। उन्होंने सोचा कि कृष्ण ने धन देकर नहीं, बल्कि बिना कहे अपनी कृपा से उचित किया, क्योंकि धन पाकर मनुष्य अक्सर अपना कर्तव्य भूल जाता है। झोंपड़ी का महल बन जाना यही बताता है कि जो भक्त प्रभु पर भरोसा रखता है, उसे सब कुछ मिलता है, पर वह सम्पन्न होकर भी उन्हीं की भक्ति में लगा रहता है।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि संतोष सबसे बड़ा धन है। सुदामा के पास साधन नहीं थे, फिर भी उन्हें धन का अभाव कभी अनुभव नहीं होता था।
दूसरी सीख यह है कि सच्ची मित्रता में पद, धन या स्थिति नहीं देखी जाती। द्वारकाधीश कृष्ण ने गरीब ब्राह्मण सुदामा का नंगे पैर दौड़कर स्वागत किया और उन्हें स्वर्ण सिंहासन पर बैठाया।
तीसरी सीख यह है कि भगवान को वस्तु की कीमत नहीं, भाव की कीमत प्यारी होती है। सूखे चावल की पोटली को कृष्ण ने सम्पूर्ण संसार के धन से बढ़कर अमूल्य उपहार बताया।
चौथी सीख यह है कि निःस्वार्थ भाव से किया गया स्मरण और भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। सुदामा ने कुछ माँगा नहीं, फिर भी कृष्ण ने उनकी झोंपड़ी को महल में बदल दिया।
पाँचवीं सीख यह है कि धन और सुख मिलने के बाद भी भक्ति और कर्तव्य को नहीं भूलना चाहिए। कथा के अंत में सम्पन्न हो जाने के बाद भी सुदामा श्रीकृष्ण की भक्ति में ही लगे रहे।
छठी सीख यह है कि अपने कष्ट भगवान को बताने की आवश्यकता नहीं, वे सब जानते हैं। सुदामा ने अपने मुँह से कुछ नहीं कहा, फिर भी प्रभु ने उनकी हर आवश्यकता पूरी कर दी।
कथा का सार
सुदामा चार मुट्ठी चावल लेकर कृष्ण के पास गए और बिना कुछ माँगे लौटे, पर घर पहुँचकर उन्होंने अपनी झोंपड़ी की जगह भव्य महल पाया और वे सम्पन्न होकर भी श्रीकृष्ण की भक्ति में लगे रहे। यह कथा सिखाती है कि निःस्वार्थ प्रेम, संतोष और सच्चे भाव से किया गया स्मरण भगवान को सबसे प्रिय है, और वे अपने भक्त की हर आवश्यकता बिना कहे ही पूरी कर देते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।