श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 1
आकाशवाणी: कंस, देवकी और वासुदेव की कथा
देवकी के विवाह के दिन हुई आकाशवाणी ने कंस को भयभीत कर दिया। वासुदेव के वचन से देवकी के प्राण बचे, पर दोनों कारागार में डाल दिए गए। पढ़ें पूरी कथा।

मथुरा का शासक कंस क्रूर और अत्याचारी था, पर अपनी बहन देवकी से उसे सच्चा स्नेह था। उसी देवकी के विवाह के दिन एक आकाशवाणी हुई, जिसने भाई के प्रेम को भय और क्रोध में बदल दिया। यहीं से उस कथा की शुरुआत होती है जिसमें आगे श्रीकृष्ण का जन्म होता है।
मथुरा और अत्याचारी कंस
वृष्णि, अंधक और भोज वंशों के लोग सामूहिक रूप से यादव कहलाते थे, और उनकी राजधानी मथुरा थी। कंस वहाँ का शासक था। उसने अपने पिता उग्रसेन को कारागार में डालकर स्वयं सिंहासन हथिया लिया था।
कंस क्रूर और अत्याचारी था और मथुरा की जनता उसके आतंक से थर-थर काँपती थी। पूरे संसार में उसे केवल एक व्यक्ति से प्रेम था, और वह थी उसकी बहन देवकी।
देवकी और वासुदेव का विवाह
देवकी का स्वभाव अपने भाई से बिल्कुल अलग था। वह धार्मिक स्वभाव की और ईश्वर से डरने वाली कन्या थी। जब उसका विवाह कंस के मित्र और सामंत वासुदेव से तय हुआ, तो कंस की खुशी का ठिकाना न रहा।
निश्चित तिथि पर बड़ी भव्यता के साथ विवाह संपन्न हुआ। समारोह के बाद वासुदेव और देवकी रथ पर घर के लिए चले। बहन के प्रति अपने प्रेम के कारण कंस ने घोड़ों की रास स्वयं अपने हाथों में थाम ली।
आकाशवाणी और कंस का भय
मार्ग में अचानक आकाशवाणी हुई कि जिस बहन के विवाह पर कंस इतना प्रसन्न है, उसी का आठवाँ पुत्र उसका सर्वनाश करेगा।
यह सुनकर कंस के रोंगटे खड़े हो गए। वह बहन से प्रेम तो करता था, पर उसके लिए अपने प्राण देने को तैयार नहीं था। उसने देवकी को बालों से पकड़कर रथ से नीचे खींच लिया और उसे मारने के लिए तलवार निकाल ली।
वासुदेव की विनती और वचन
तभी वासुदेव ने कंस का हाथ थाम लिया। उन्होंने समझाया कि जब लोगों को पता चलेगा कि अपनी जान बचाने के लिए कंस ने निर्दोष नवविवाहिता बहन को मार डाला, तो वे क्या कहेंगे। सब लोग तो उसकी वीरता की प्रशंसा करते नहीं थकते, तो क्या ऐसे वीर को यह शोभा देता है।
पर कंस उस समय क्रोध में पागल हो रहा था और उसने सारे आग्रह अनसुने कर दिए। अंत में वासुदेव ने हाथ जोड़कर वचन दिया कि यदि वह देवकी को जीवनदान दे दे, तो देवकी से उत्पन्न हर बालक वे स्वयं उसे सौंप देंगे। यह प्रस्ताव सुनकर कंस सोच में पड़ गया।
कारागार में वासुदेव और देवकी
कंस ने बारात को मथुरा लौटने का आदेश दिया। रास्ते भर वह वासुदेव के प्रस्ताव पर विचार करता रहा। वह जानता था कि वासुदेव अपने वचन के पक्के हैं और प्राण दे देंगे, पर वचन से पीछे नहीं हटेंगे।
फिर भी उसने कोई जोखिम नहीं लिया। उसने वासुदेव और देवकी को कारागार की एक छोटी सी कोठरी में कैद कर दिया, जहाँ सशस्त्र पहरेदार दिन-रात पहरा देते थे और किसी को मिलने की अनुमति नहीं थी।
दोनों को कैद करके कंस निश्चिंत हो गया और उसकी क्रूरता और मनमानी और बढ़ गई। लोग उसके कुशासन से तंग आकर भगवान से मुक्ति की प्रार्थना करने लगे। उन्हें विश्वास था कि जग के पालनहार एक दिन उन्हें कंस के अत्याचारों से अवश्य मुक्ति दिलाएँगे।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि भय और स्वार्थ में डूबा मन प्रेम जैसे पवित्र संबंध को भी भुला देता है। जो कंस बहन के लिए घोड़ों की रास थामे हुए था, वही अपने प्राण बचाने के लिए उसकी जान लेने को तैयार हो गया।
दूसरी सीख वासुदेव के आचरण में है। संकट की घड़ी में उन्होंने क्रोध का उत्तर क्रोध से नहीं दिया, बल्कि धैर्य, विनम्रता और विवेक से बात की। उनका वचन ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति बना।
तीसरी बात यह कि अत्याचारी चाहे कितनी भी कड़ी पहरेदारी कर ले, अधर्म सदा के लिए टिकता नहीं। जनता की प्रार्थना और धर्म पर विश्वास ही आगे चलकर कृष्ण के अवतरण का आधार बनता है।
कथा का सार
आकाशवाणी की यह कथा श्रीकृष्ण के जन्म की भूमिका है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।