श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 5
गोकुल में जीवन: नंद के घर उत्सव और कृष्ण का नामकरण
नंद के घर पुत्र के जन्म पर पूरा गोकुल उत्सव में डूब गया और स्वर्ग में भी देवता पुष्पवर्षा करने लगे। बालक का साँवला रूप देखकर सभी ने उसका नाम 'कृष्ण' रखा। पढ़ें पूरी कथा।

यमुना के तट पर बसा गोकुल उस दिन उत्सव में डूबा था। गाँव के प्रमुख नंद के घर पुत्र का जन्म हुआ था और हर घर रंगोली और झंडियों से सजा था। धरती पर गोकुल में और आकाश में स्वर्ग में एक ही आनंद छाया था, क्योंकि भगवान विष्णु का नया अवतार सबके सामने था।
यमुना तट का गोकुल गाँव
गोकुल यमुना नदी के तट पर स्थित एक गाँव था। वहाँ के निवासी सीधे-सादे और दयालु थे और बड़ी सादगी से जीवन बिताते थे। वे गायें पालते थे और उनका दूध, दही, मक्खन, घी आदि बेचकर अपनी जीविका चलाते थे। गायों के सहारे जीविका चलाने वालों को उस समय यादव कहा जाता था। नंद गोकुल के यादव लोगों के प्रमुख थे।
नंद के घर पुत्र जन्म का उत्सव
उस दिन गोकुल के निवासी अपने प्रमुख नंद के घर पुत्र के जन्म का उत्सव मना रहे थे। पूरे गोकुल में चहल-पहल थी और हर घर रंगोली और झंडियों से सजा था। स्त्री-पुरुषों ने उत्तम वस्त्र पहन रखे थे और वे मिठाइयाँ और उपहार लेकर नंद के घर पहुँच रहे थे। नंद प्रेम से सबके उपहार स्वीकार कर रहे थे और उनके पास उपहारों के ढेर लग गए थे।
यशोदा की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। वे कभी अपने पुत्र का मुख देखतीं और कभी आनंद में डूबे गोकुलवासियों को। लोग सड़कों पर गाते और नाचते थे, और पशुओं को देखकर भी लगता था कि सबको प्रसन्न देखकर वे भी खुश हैं।
इस खुशी के अवसर पर नंद जरूरतमंदों को पैसे, कपड़े और अनाज बाँट रहे थे और ब्राह्मणों को गौओं का दान कर रहे थे। ब्राह्मण वेदों और पुराणों के श्लोकों का पाठ करके नवजात शिशु के मंगलमय भविष्य की कामना कर रहे थे।
स्वर्ग में भी उत्सव
यह दृश्य तो गोकुल का था। उधर स्वर्ग में भी उत्सव मनाया जा रहा था। भगवान विष्णु के नए अवतार को देखकर देवता उल्लसित थे और आकाश से नवजात शिशु पर पुष्पवर्षा कर रहे थे। देवराज इंद्र ने विश्वकर्मा को स्वर्ग की सजावट का आदेश दिया था। उस दिन स्वर्ग की शोभा देखते ही बनती थी, और स्वर्गवासियों के प्रसन्न मुखमंडल देखकर लगता था जैसे स्वर्ग, स्वर्ग न रहकर गोकुल ही बन गया हो।
यशोदा और नंद का स्नेह
यशोदा अपने नवजात शिशु का साँवला मुखमंडल देखकर फूली नहीं समा रही थीं। वे बार-बार उसे उठाकर हृदय से लगातीं और चूम लेती थीं। केवल नंद को यह तथ्य ज्ञात था कि वह शिशु वास्तव में वासुदेव और देवकी का है, पर वे उसे भी पिता की दृष्टि से ही निहार रहे थे। नंद और यशोदा दोनों उस शिशु पर अपने स्नेह की वर्षा कर रहे थे।
गोप-गोपियों में शिशु को गोद लेने की होड़
गोकुल के सभी गोप और गोपियाँ नंद-यशोदा के पुत्र को देखने आए। गोप नंद को घेरकर बातचीत में लगे थे, जबकि गोपियाँ यशोदा और शिशु को घेरे हुए थीं। शिशु का सौंदर्य देखकर सब चकित थे। कोई साँवले मुख की प्रशंसा कर रहा था, कोई काली आँखों की तारीफ, और किसी को घुँघराले बालों की प्रशंसा के लिए शब्द ही नहीं मिल रहे थे।
जिसने एक बार बालक को गोद में उठा लिया, वह उसे किसी और को देना नहीं चाहता था, मानो सबमें उसे गोद में लेने की होड़ लगी हो। बहुत सी गोपियाँ तो यशोदा से मातृसुलभ ईर्ष्या से भर गईं, क्योंकि उन्हें लगता था कि यशोदा ने संसार के सबसे सुंदर शिशु को जन्म दिया है।
गोकुल के बच्चे भी शिशु को देखने आए थे। उनका मन था कि वह जल्दी बड़ा हो जाए और उनके साथ खेले। उन्हें तो उसे छू लेना ही बहुत अच्छा लग रहा था।
'कृष्ण' नाम का निश्चय
अब बात शिशु के नामकरण की थी। बालक का श्याम वर्ण देखकर सभी ने उसे 'कृष्ण' कहकर बुलाने का निश्चय किया।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख सादगी और सामूहिक आनंद की है। गोकुल के लोग साधारण जीवन जीते थे, फिर भी एक के सुख को पूरे गाँव ने अपना सुख बनाकर मनाया। जब मन निर्मल और सरल होता है, तभी दूसरों की खुशी में सच्चा आनंद मिलता है।
दूसरी सीख नंद के आचरण में है। उत्सव के बीच उन्होंने जरूरतमंदों को दान दिया और गौओं का दान किया। खुशी के अवसर पर बाँटना ही उसे सार्थक बनाता है।
तीसरी सीख यशोदा और नंद के निस्वार्थ स्नेह में है। नंद जानते थे कि शिशु वासुदेव-देवकी का है, फिर भी उन्होंने उसे पूरे पिता-भाव से अपनाया। सच्चा प्रेम जन्म के संबंध से नहीं, हृदय के भाव से बनता है।
कथा का सार
गोकुल में कृष्ण के जन्म का यह उत्सव उनकी बाल-लीलाओं की शुरुआत है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।