श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 2
तानाशाह कंस: देवकी के पुत्रों का वध और बलराम का जन्म
नारद मुनि के भड़काने पर कंस ने देवकी के छह नवजात पुत्रों का वध कर दिया। सातवें शिशु को दैवी शक्ति से रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया गया, जो आगे चलकर बलराम कहलाए। पढ़ें पूरी कथा।

कारावास में रहते हुए देवकी ने जब अपने पहले पुत्र को जन्म दिया, तो वासुदेव ने अपना वचन निभाते हुए भारी हृदय से उसे कंस के सामने प्रस्तुत किया। कंस ने उस समय शिशु को लौटा दिया, पर नारद मुनि के एक वाक्य ने उसके मन में ऐसा संदेह भर दिया कि वह तानाशाह से हत्यारा बन गया।
वासुदेव का वचन और पहला पुत्र
कारागार में डाले जाने के बाद वह दिन आया जब देवकी ने अपने पहले बच्चे को जन्म दिया। वासुदेव को कंस को दिया अपना वचन याद था, इसलिए उन्होंने भारी हृदय से शिशु के जन्म का समाचार कंस तक पहुँचा दिया। कंस ने आदेश दिया कि वासुदेव स्वयं शिशु को लेकर उसकी सेवा में उपस्थित हों।
वासुदेव नवजात शिशु को हाथों में लिए कंस के कक्ष में पहुँचे और बोले कि वचन के अनुसार वे अपना पहला बच्चा ले आए हैं। कंस ने बालक पर एक दृष्टि डाली। उसे पहले बच्चे से कोई खतरा नहीं था, इसलिए उसने शिशु लौटा दिया और कहा कि उसे इससे कोई डर नहीं है। वासुदेव प्रसन्नतापूर्वक शिशु को लेकर लौट आए और अपने बच्चे को सकुशल पाकर देवकी भी बहुत प्रसन्न हुई।
नारद मुनि के संदेह के बीज
वासुदेव को गए अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि नारद मुनि कंस से मिलने पहुँचे। उन्होंने कहा कि कंस का हृदय तो मोम का है, जिसने अपने हत्यारे बन सकने वाले बालक को छोड़ दिया। उन्होंने यह भी कहा कि यदि वे कंस के स्थान पर होते तो अपने जीवन के साथ ऐसा खिलवाड़ कभी नहीं करते, क्योंकि देवकी का कोई भी पुत्र उसका विनाश करने में सक्षम है।
इस प्रकार नारद मुनि ने कंस के मन में संदेह के बीज बो दिए।
कंस का क्रूर कृत्य
नारद मुनि के जाते ही कंस तत्काल कारागार जा पहुँचा। वहाँ वासुदेव और देवकी अपने नवजात शिशु को खिला रहे थे। कंस को अचानक क्रोध में आया देखकर वे चौंक गए। इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते, कंस ने झपटकर देवकी की गोद से बालक छीन लिया और उसे कारागार के कठोर फर्श पर दे मारा।
यह हृदय विदारक दृश्य देखकर माता देवकी और पिता वासुदेव की चीख निकल गई। शिशुहत्या जैसा पैशाचिक कृत्य करके कंस तेजी से कारागार से बाहर चला गया।
छह संतानों का वध और बढ़ता भय
इसी प्रकार कंस ने अपनी बहन और बहनोई के अगले पाँच बच्चों की भी हत्या कर दी। जैसे ही उसे सूचना मिलती कि देवकी ने किसी शिशु को जन्म दिया है, वह तुरंत कारागार पहुँचता और शिशु के प्राण ले लेता।
हर शिशु के जन्म के साथ उसका भय बढ़ता गया और वह कारागार में पहरेदारों की संख्या भी बढ़ाता गया। आठवाँ शिशु हमेशा उसकी आँखों के आगे नाचता रहता था। वह उसे मारकर मृत्यु के भय से मुक्ति पाने के लिए व्याकुल था।
सातवाँ शिशु और बलराम का जन्म
समय बीतता गया और देवकी सातवीं बार गर्भवती हुई। लेकिन इस शिशु के भाग्य में पिछली छह संतानों जैसी मृत्यु नहीं लिखी थी। देवकी का गर्भस्थ शिशु दैवी शक्ति से रोहिणी के गर्भ में पहुँच गया, जो वासुदेव की ही दूसरी पत्नी थीं। यही शिशु आगे चलकर बलराम के नाम से जाना गया।
उधर कंस को सूचना मिली कि देवकी का सातवाँ शिशु मृत पैदा हुआ है, और वह निश्चिंत हो गया।
बलराम के नाम: राम, संकर्षण और बलराम
बलराम का एक अन्य नाम संकर्षण भी है। यह नाम उन्हें शिशुकाल में गर्भ बदलने के कारण मिला। बचपन में उनका नाम राम रखा गया था, पर उनकी अतीव शक्ति के कारण लोग उन्हें बलराम कहने लगे।
श्रीकृष्ण बलराम के जन्म के इस रहस्य से परिचित थे, और इसी कारण वे जीवन भर उन्हें बड़े भाई के समान आदर देते रहे।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि संदेह और भय जब मन पर हावी हो जाते हैं, तो मनुष्य विवेक खो देता है। कंस ने पहले शिशु को लौटा दिया था, पर एक बात ने उसे निर्दयी हत्यारा बना दिया। बुरी संगति या उकसावे से मन को बचाए रखना आवश्यक है।
दूसरी सीख वासुदेव और देवकी के धैर्य में है। इतना बड़ा दुख सहकर भी उन्होंने वचन और धर्म का साथ नहीं छोड़ा।
तीसरी बात यह कि अत्याचारी जितना अधिक भयभीत होता है, उतना ही अधिक क्रूर होता जाता है। पर जिसे ईश्वर बचाना चाहता है, उसकी रक्षा का मार्ग वह स्वयं निकाल देता है, जैसा बलराम के जन्म में दिखता है।
कथा का सार
तानाशाह कंस की यह कथा आठवें पुत्र के जन्म की भूमिका बनाती है, जिसके लिए कंस इतना व्याकुल था। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।