श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 3

श्रीकृष्ण का जन्म: कारागार से गोकुल तक की कथा

श्रावण कृष्ण अष्टमी की तूफानी मध्यरात्रि में कारागार में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। वासुदेव उन्हें टोकरी में लेकर शेषनाग की छाया में उफनती यमुना पार कर गोकुल पहुँचे। पढ़ें पूरी कथा।

श्रीकृष्ण का जन्म: कारागार से गोकुल तक की कथा
श्रीकृष्ण का जन्म: कारागार से गोकुल तक की कथा — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की उस रात तूफान और वर्षा ने मथुरा को झकझोर रखा था और यमुना बाढ़ से उफन रही थी। उसी रात कारागार में जंजीरों से जकड़े देवकी और वासुदेव के घर आठवें पुत्र के रूप में स्वयं भगवान विष्णु ने अवतार लिया।

प्रसवपीड़ा और तूफानी रात

श्रावण (अगस्त) माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात देवकी को प्रसवपीड़ा हुई। वह समझ गई कि अब उसका आठवाँ बेटा जन्म लेने वाला है। यह सोचकर वह बहुत दुखी थी कि पुत्र के जन्म का समाचार मिलते ही उसका क्रूर भाई आकर उसे मार डालेगा। जंजीरों से जकड़े असहाय दंपति एक-दूसरे को धीरज बँधाते रहे और ईश्वर से अपने पुत्र की रक्षा की प्रार्थना करते रहे।

मध्यरात्रि का समय हो रहा था। तूफान और वर्षा मथुरा को झकझोर रहे थे और बाढ़ से यमुना ने खतरनाक रूप धारण कर लिया था। सभी लोग अपने घरों में थे और प्रकृति के रौद्र रूप के कारण किसी की बाहर झाँकने की भी हिम्मत नहीं थी। वर्षा ऐसी थी जैसे आसमान स्वयं धरती पर उतर आना चाहता हो और बिजली ऐसे कौंध रही थी जैसे अभी नगर पर टूट पड़ेगी। उधर कंस बड़ी व्याकुलता से महल में चहलकदमी कर रहा था, क्योंकि आठवें पुत्र के जन्म का समय निकट होने से उसकी व्याकुलता चरम पर थी।

भगवान विष्णु के दर्शन और निर्देश

उधर देवता पलकें बिछाए देवकी के आठवें पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा कर रहे थे और उस दिव्य शिशु पर पुष्पवर्षा के लिए व्यग्र थे। देवकी और वासुदेव अपने पुत्र की प्राणरक्षा की गुहार लगा रहे थे। तभी उनकी कोठरी दिव्य प्रकाश से जगमगा उठी। आँखें खोलने पर उन्होंने सामने भगवान विष्णु को पाया। भावातिरेक से गद्गद् होकर वे प्रभु के चरणों में गिर पड़े। विष्णु के दर्शन मात्र से मानो उनके सारे कष्ट समाप्त हो गए।

दोनों के मस्तक पर हाथ रखकर अभयदान देते हुए भगवान ने देवकी से कहा कि उनकी पुत्र पाने की अभिलाषा शीघ्र पूर्ण होगी और थोड़ी ही देर में वे उनके गर्भ से अवतार लेंगे। फिर वासुदेव से बोले कि जैसे ही वे शिशुरूप में जन्म लें, एक भी क्षण गँवाए बिना उन्हें गोकुल में प्रिय मित्र नंद के घर ले जाएँ। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा ने एक बेटी को जन्म दिया होगा। उस बालिका के स्थान पर उन्हें लिटाकर वासुदेव उस बालिका को कारागार ले आएँ। भगवान ने आश्वासन दिया कि उनकी माया सारे कार्य सरल बना देगी। इतना कहकर भगवान विष्णु अंतर्धान हो गए।

मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण का जन्म

रात में बारह बजते ही देवकी ने एक पुत्र को जन्म दिया। वह शिशु साँवला था, पर उसके मुखमंडल पर दिव्य प्रकाश था। उसे देखकर देवकी का मातृहृदय ममता से भर गया। उसने शिशु को गोद में उठाकर हृदय से लगा लिया और चूमने लगी। वासुदेव भी पुत्र का मुख निहार रहे थे और उनके नेत्र जैसे स्नेह की वर्षा कर रहे थे।

अत्यंत कठिनता से भावनाओं पर नियंत्रण करके उन्होंने देवकी से शिशु देने को कहा, ताकि वे शीघ्र गोकुल पहुँच सकें। जिस स्त्री के सभी पुत्रों की हत्या हो चुकी हो, उसके लिए शिशु को सौंपना अत्यंत कठिन था, फिर भी देवकी ने भगवान की बात याद करके वासुदेव को शिशु दे दिया।

जंजीरें खुलीं और कारागार का द्वार

शिशु के वासुदेव की गोद में आते ही चमत्कार हुआ और सभी जंजीरें खुल गईं। वासुदेव और देवकी स्वतंत्र हो गए। जब वासुदेव द्वार की ओर बढ़े तो देवकी ने आँखों में आँसू भरकर कहा कि उसे अंतिम बार अपने पुत्र को गोद में लेकर प्यार कर लेने दें, पता नहीं वह उसका मुख फिर कभी देख पाएगी या नहीं।

वासुदेव उसकी भावनाएँ समझते थे। उन्होंने धैर्य बँधाते हुए कहा कि चिंता मत करो, हमारा शिशु सामान्य बालक नहीं है, स्वयं भगवान विष्णु ने हमारे पुत्र के रूप में जन्म लिया है, और उन्हें जितनी जल्दी हो सके इसे गोकुल पहुँचाना है। देवकी की आँखों से गंगा-यमुना बह रही थी, फिर भी कर्त्तव्य को स्मरण करके वह एक ओर हट गई।

तभी कारागार का द्वार खुल गया और वासुदेव ने सभी द्वारपालों को गहरी नींद में सोता पाया। उनकी दृष्टि एक टोकरी पर पड़ी। उन्होंने उसमें पुराने कपड़े बिछाकर शिशु को लिटा दिया और टोकरी को सावधानी से सिर पर रखकर गोकुल की ओर चल पड़े।

शेषनाग की छाया और उफनती यमुना

उस समय भी घनघोर वर्षा हो रही थी। तभी शेषनाग ने आकर अपना सहस्र सिरों वाला फन टोकरी के ऊपर ऐसे फैला दिया, जैसे कोई वर्षा से बचने के लिए छाता तान ले।

शीघ्र ही वासुदेव यमुना के तट पर पहुँचे। बाढ़ के कारण नदी भयंकर रूप में थी और वहाँ कोई नाव भी नहीं थी। कोई विकल्प न देखकर उन्होंने मन ही मन भगवान विष्णु का स्मरण किया और उफनती नदी में पैर रख दिया। आश्चर्य की बात यह कि पैर रखते ही पानी फट गया और नदी ने स्वयं उन्हें पार जाने का मार्ग दे दिया।

वासुदेव प्रभु के गुण गाते हुए नदी पार करने लगे, और शेषनाग अब भी उनके साथ था। जैसे ही उन्होंने दूसरे तट पर पैर रखा, यमुना ने फिर अपना भयानक रूप धारण कर लिया। टोकरी में लेटे शिशु के मुख पर मंद मुस्कान थी, मानो अपनी लीला देखकर वह मन ही मन हँस रहा हो। वासुदेव भी जग के कर्णधार की ऐसी कृपा देखकर गद्गद् थे।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि जब हर मार्ग बंद दिखे और मनुष्य असहाय हो जाए, तब भी ईश्वर पर विश्वास और धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। देवकी और वासुदेव ने जंजीरों में भी प्रार्थना नहीं छोड़ी, और प्रभु ने स्वयं आकर उन्हें अभयदान दिया।

दूसरी सीख वासुदेव के साहस और श्रद्धा में है। उफनती यमुना के सामने उन्होंने प्रभु का स्मरण करके पहला कदम बढ़ाया, और मार्ग अपने आप खुल गया। सच्चे विश्वास के साथ उठाया गया पहला कदम ही कठिन बाधाओं को पार कराता है।

तीसरी सीख देवकी के त्याग में है। अपने सभी पुत्र खो चुकी माँ ने कर्त्तव्य और भगवान के वचन पर भरोसा करके अपना शिशु सौंप दिया। धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी बड़ा त्याग भी करना पड़ता है।

कथा का सार

श्रीकृष्ण के जन्म की यह कथा बताती है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, प्रभु का प्रकाश उसे चीरकर आता है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।