श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 4
गोकुल पहुँचना: नंद और वासुदेव की मित्रता की कथा
वासुदेव श्रीकृष्ण को लेकर आधी रात गोकुल में नंद के घर पहुँचे। नंद ने मित्र का मान रखते हुए अपनी नवजात पुत्री से बालक की अदला-बदली की और वासुदेव कन्या को लेकर कारागार लौट आए। पढ़ें पूरी कथा।

यमुना पार करने के बाद वासुदेव गोकुल पहुँचे, जहाँ चारों ओर सन्नाटा पसरा था। मध्यरात्रि में अपने मित्र नंद के द्वार पर उन्होंने दस्तक दी और उनसे वह माँगा जो कोई मित्र ही दे सकता है: अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा।
मध्यरात्रि में नंद के द्वार पर
कुछ देर और चलने के बाद वासुदेव गोकुल जा पहुँचे। वहाँ भी सन्नाटा पसरा था और किसी व्यक्ति की छाया तक नजर नहीं आ रही थी। नंद के घर पहुँचकर वासुदेव ने दरवाजा खटखटाया।
मध्यरात्रि में दरवाजा खटखटाए जाने की आवाज सुनकर नंद को हैरानी हुई। उन्होंने सोचा कि इस समय कौन आया होगा। उनकी पत्नी यशोदा ने थोड़ी देर पहले ही एक बेटी को जन्म दिया था। नंद ने आगे बढ़कर दरवाजा खोला तो सामने वासुदेव को देखकर आश्चर्यचकित रह गए और उनका स्वागत करते हुए उन्हें घर के अंदर ले आए।
वासुदेव की विनती
वासुदेव ने नंद से कहा कि उन्हें तो उनकी दशा पता ही है, कंस ने उनके सभी बच्चों के प्राण निर्दयता से हर लिए हैं। यह उनका आठवाँ पुत्र है और यदि कंस को इसके जन्म का पता चल गया तो वह इसे कभी नहीं छोड़ेगा। उन्होंने नंद से आग्रह किया कि वे इस बच्चे को स्वीकार करके इसकी देखभाल करें और बदले में अपनी पुत्री उन्हें दे दें। उन्होंने कहा कि वे जीवन भर नंद के ऋणी रहेंगे।
यह सुनकर नंद एक क्षण के लिए सोच में पड़ गए। वासुदेव और देवकी की दशा से वे पहले से परिचित थे। फिर उन्होंने वासुदेव की विनती स्वीकार करने का निर्णय लिया और उनकी गोद से बालक को उठा लिया। बालक को गोद में लेते ही उन्हें दिव्य अनुभूति हुई।
नंद का त्याग: पुत्री और पुत्र की अदला-बदली
वासुदेव से दो क्षण प्रतीक्षा करने को कहकर नंद अपने शयनकक्ष में गए, जहाँ यशोदा अपनी नवजात पुत्री के साथ गहरी नींद में सो रही थीं। नंद ने चुपचाप कन्या को उठाया और उसके स्थान पर वासुदेव के पुत्र को लिटा दिया। फिर बाहर आकर उन्होंने अपनी बेटी वासुदेव को सौंप दी।
अपने मित्र का यह त्याग देखकर वासुदेव का गला रुंध गया। उन्होंने नंद को धन्यवाद दिया और कन्या को लेकर मथुरा की ओर वापस चल पड़े।
कारागार में वापसी
इस यात्रा में भी शेषनाग वासुदेव के साथ रहकर उनकी सुरक्षा करता रहा। इस बार भी यमुना नदी ने उन्हें लौटने का मार्ग दे दिया। शीघ्रता से चलते हुए वासुदेव कारागार पहुँच गए, जिसके द्वार पहले की तरह खुले थे।
जैसे ही वासुदेव अपनी कोठरी में पहुँचे, कारागार के द्वार अपने आप बंद हो गए। शेषनाग भी अंतर्धान हो गया, क्योंकि उसका कार्य पूरा हो चुका था। जंजीरों ने एक बार फिर वासुदेव और देवकी को जकड़ लिया। सब कुछ ऐसे हो गया जैसे कुछ हुआ ही न हो।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख सच्ची मित्रता की है। नंद ने बिना किसी स्वार्थ के अपने मित्र की विपदा समझी और अपनी नवजात पुत्री तक सौंप दी। संकट के समय जो साथ खड़ा हो, वही सच्चा मित्र है।
दूसरी सीख यह है कि ईश्वर की योजना में हर व्यक्ति की अपनी भूमिका होती है। वासुदेव, नंद, शेषनाग और यमुना, सबने अपना-अपना कार्य निभाया, और जब कार्य पूरा हुआ तो सब कुछ पहले जैसा हो गया।
तीसरी सीख वासुदेव के संयम में है। इतने बड़े कार्य के बाद भी वे चुपचाप कारागार लौट आए, ताकि प्रभु की लीला में कोई बाधा न आए।
कथा का सार
गोकुल पहुँचने की यह कथा बताती है कि श्रीकृष्ण अब सुरक्षित नंद के घर पहुँच चुके हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।