श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 50
मणि का खोना: सत्राजीत का मोह, प्रसेनजीत का शिकार और जाम्बवंत के पास स्यामंतक मणि
स्यामंतक मणि से द्वारका में शांति और समृद्धि आई, पर जब कृष्ण ने मणि राजा उग्रसेन को देने का सुझाव दिया तो सत्राजीत ने मना कर दिया। फिर मणि पहनकर शिकार पर गए प्रसेनजीत की वन में मृत्यु हो गई और मणि शेर से होती हुई रीछ जाम्बवंत की गुफा तक जा पहुँची। पढ़ें पूरी कथा।

स्यामंतक मणि ने द्वारका को शांति और समृद्धि दी, पर जब कृष्ण ने सत्राजीत को मणि राजा उग्रसेन को सौंपने का सुझाव दिया तो उसने इनकार कर दिया। कुछ दिनों बाद मणि पहनकर शिकार पर गए उसके भाई प्रसेनजीत की वन में मृत्यु हो गई, और मणि शेर से होती हुई रीछ जाम्बवंत की गुफा में पहुँच गई।
द्वारका में दिव्य प्रकाश का रहस्य और कृष्ण का उत्तर
द्वारका में लोगों ने जब सत्राजीत को देखा तो वे आश्चर्य में पड़ गए। वे भागते हुए कृष्ण के पास पहुँचे। वे जानते थे कि कृष्ण उनको उस दिव्य प्रकाश का रहस्य बता सकते हैं। पूछे जाने पर कृष्ण ने उन लोगों से कहा, ‘‘सूर्यदेव ने सत्राजीत को स्यामंतक मणि प्रदान की है। उस मणि में अकाल तथा युद्ध से रक्षा करने की शक्ति है।’’
कृष्ण की बात सुनकर सभी लोग बड़े प्रसन्न हुए। सत्राजीत की भक्ति की प्रशंसा करते हुए वे अपने घरों को लौट गए। उस रात सत्राजीत उस मणि को धारण किए हुए ही सो गया। अगली सुबह जब वह उठा तो उसने अपने बिस्तर से स्वर्णमुद्राओं को गिरते हुए देखा।
मणि की पूजा और द्वारका की शांति-समृद्धि
सत्राजीत ने उस मणि को मंदिर में स्थापित करके प्रतिदिन उसकी पूजा करनी शुरू कर दी। वह मणि आठ तोले सोना रोज प्रदान करती थी। सत्राजीत उस धन का उपयोग नगर के सौंदर्यीकरण में करने लगा। उस मणि ने द्वारका को शांति तथा समृद्धि प्रदान की। सभी लोग सत्राजीत की श्रद्धा और भक्ति की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे।
कृष्ण का सुझाव और सत्राजीत का इनकार
एक दिन कृष्ण सत्राजीत के घर पधारे। वे उससे बोले, ‘‘सत्राजीत, पूरी द्वारका तुम्हारी प्रशंसा कर रही है।’’
‘‘यह सब सूर्यदेव की कृपा तथा दयालुता के कारण है।’’ सत्राजीत ने उत्तर दिया।
‘‘उनकी यह कृपा उनके प्रति तुम्हारी भक्तिभावना के कारण हुई है। सत्राजीत, अब तुम्हारे पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं है। मेरे विचार से अब तुम्हें वह मणि राजा उग्रसेन को दे देनी चाहिए।’’
कृष्ण की बात सुनकर सत्राजीत भौंचक्का रह गया। वह बोल उठा, ‘‘मैं ऐसा क्यों करूँ? सूर्यदेव ने यह मणि मुझे दी है।’’
कृष्ण बोले, ‘‘क्योंकि वे राजा हैं और ऐसी मणि एक राजा को ही शोभा देती है। इस अमूल्य मणि की सुरक्षा की व्यवस्था भी एक राजा ही भली भाँति कर सकता है।’’
‘‘मणि तो मेरे पास भी सुरक्षित है और मुझे भी शोभा देती है। मैं इसे कदापि स्वयं से पृथक नहीं करूँगा।’’
प्रसेनजीत का वन में शिकार और दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु
कुछ दिनों बाद सत्राजीत का भाई प्रसेनजीत उस मणि को धारण करके वन में शिकार करने गया। जाने के पहले सत्राजीत ने उससे मणि का भली भाँति ध्यान रखने को कहा था। प्रसेनजीत ने भी आश्वासन दिया था कि वह मणि का ध्यान रखेगा। वन में पहुँचकर प्रसेनजीत घोड़े की पीठ से उतरकर एक पेड़ पर चढ़ गया और शिकार की प्रतीक्षा करने लगा।
बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के बाद उसकी दृष्टि एक शेर पर पड़ी जो उसी ओर आ रहा था। उस शेर को देखते ही उसकी बाँछें खिल गईं और वह उस पर निशाना लगाने लगा। तभी उसकी दृष्टि एक साँप पर पड़ी जो उसकी डाल के ऊपर वाली डाल से लिपटा हुआ ठीक उसके सिर पर झूल रहा था। वह अपने प्राण बचाने के लिए पेड़ से कूद गया। लेकिन दुर्भाग्यवश उसका हार उस पेड़ की एक अन्य शाखा में अटक गया और दम घुट जाने से तुरंत ही उसकी मौत हो गई।
शेर से जाम्बवंत तक: मणि का नया ठिकाना
उस मणि को देखकर शेर भी बहुत प्रसन्न हुआ। उसने प्रसेनजीत की ओर कोई ध्यान नहीं दिया और उस हार को उठाकर वहाँ से चलता बना। घने जंगल में जाम्बवंत नामक एक रीछ ने उस शेर को मुँह में मणि दबाए देख लिया। शेर पर आक्रमण करके उसने उसे मार डाला। उसने शेर को इसलिए मारा था ताकि उससे मणि लेकर वह अपने पुत्र को भेंट कर सके। वह मणि लेकर अपनी गुफा की ओर चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर उसने वह मणि अपने पुत्र को दे दी।
भक्ति से जुड़ा संदेश: भगवान की देन का सदुपयोग और मोह से मुक्ति
इस कथा में भक्ति का पहला संदेश यह है कि भगवान का दिया हुआ उपहार केवल अपने लिए नहीं, सबके कल्याण के लिए होता है। सत्राजीत ने मणि से मिलने वाले धन को नगर के सौंदर्यीकरण में लगाया और द्वारका को शांति तथा समृद्धि मिली। जब भक्ति का फल समाज के हित में लगता है, तब वह पूजा का सबसे सुंदर रूप बन जाता है।
कृष्ण ने सत्राजीत से कहा कि अब तुम्हारे पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं है, इसलिए मणि राजा उग्रसेन को दे दो। यह सुझाव त्याग और संतोष का संदेश देता है। भक्त को याद रखना चाहिए कि जो कुछ भी मिला है वह प्रभु की कृपा से मिला है, और उससे मोह बाँध लेना भक्ति की भावना के विपरीत है। सत्राजीत ने कहा कि वह मणि को कभी स्वयं से अलग नहीं करेगा, और यहीं भक्ति पर मोह की छाया पड़ने लगती है।
कथा का एक और संकेत यह है कि संसार की वस्तुएँ सदा किसी के पास टिककर नहीं रहतीं। जो मणि कुछ समय पहले मंदिर में पूजित थी, वह प्रसेनजीत के हार से होती हुई शेर और फिर जाम्बवंत की गुफा तक पहुँच गई। वस्तुओं के पीछे दौड़ने के बजाय भक्त को उनके देने वाले प्रभु का स्मरण रखना चाहिए, क्योंकि वही स्थायी है।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि ईश्वर से मिली संपत्ति का उपयोग समाज के कल्याण में करना चाहिए। सत्राजीत ने मणि से मिले स्वर्ण से द्वारका का सौंदर्यीकरण करवाया और सभी ने उसकी प्रशंसा की।
दूसरी सीख यह है कि अनुभवी और शुभचिंतक की सलाह को ध्यान से सुनना चाहिए। कृष्ण ने सत्राजीत को मणि राजा उग्रसेन को देने का सुझाव दिया, पर उसने मोह के कारण उसे स्वीकार नहीं किया।
तीसरी सीख यह है कि मोह और अधिकार की भावना मन को भक्ति से दूर कर देती है। जिस मणि को वह भक्ति का फल मानता था, उसे वह स्वयं से अलग करने को तैयार नहीं था।
चौथी सीख यह है कि किसी मूल्यवान वस्तु की रक्षा में बहुत सावधानी चाहिए, और जोखिम भरे स्थानों पर उसे ले जाना हानिकारक हो सकता है। प्रसेनजीत मणि पहनकर वन में गया और उसके प्राण चले गए।
पाँचवीं सीख यह है कि जीवन में परिस्थितियाँ पल भर में बदल जाती हैं। एक क्षण में मणि शेर के पास थी और अगले क्षण जाम्बवंत की गुफा में, इसलिए किसी वस्तु पर घमंड या अधिकार का अभिमान नहीं रखना चाहिए।
कथा का सार
द्वारका को समृद्धि देने वाली स्यामंतक मणि सत्राजीत के मोह के कारण राजा उग्रसेन को नहीं मिली और अंततः प्रसेनजीत की मृत्यु के बाद शेर से होती हुई जाम्बवंत की गुफा तक पहुँच गई। यह कथा सिखाती है कि भगवान की दी हुई वस्तुओं का सदुपयोग करना चाहिए और उनसे मोह बाँधने के बजाय देने वाले प्रभु का स्मरण रखना चाहिए। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।