श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 53
कृष्ण, शतधन्वा और अक्रूर: शतधन्वा का वध, स्यामंतक मणि और सार्वजनिक सभा
कृष्ण की शपथ सुनकर शतधन्वा भयभीत हो गया, पर कृतवर्मा और अक्रूर ने भी उसे शरण नहीं दी। मिथिला के निकट कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका अंत किया। फिर अक्रूर के पास रखी स्यामंतक मणि को कृष्ण ने सार्वजनिक सभा में दिखाकर लोगों के संदेह दूर किए और मणि उसे लौटा दी। पढ़ें पूरी कथा।

कृष्ण की शपथ सुनकर भयभीत शतधन्वा को कृतवर्मा और अक्रूर ने भी शरण नहीं दी, और मिथिला के निकट कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका अंत कर दिया। फिर मणि अक्रूर के पास होने का अनुमान लगाकर कृष्ण ने उसे सार्वजनिक सभा में दिखाया और लोगों के संदेह दूर करके मणि उसे लौटा दी।
शतधन्वा का भय और कृतवर्मा का इनकार
जब शतधन्वा को कृष्ण की शपथ के विषय में ज्ञात हुआ तो वह भयभीत होकर कृतवर्मा के पास जा पहुँचा। उसने कृतवर्मा से शरण माँगी। लेकिन उसने ऐसा करने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि वह कृष्ण के हाथों मरना नहीं चाहता।
अक्रूर के पास स्यामंतक मणि
तब शतधन्वा अक्रूर के पास गया और उससे बोला, ‘‘प्रिय मित्र, मुझे पता है कि तुम्हें कृष्ण की शपथ की जानकारी है। तुम इस स्यामंतक मणि को रख लो। मैं इसे छोड़कर दूर चला जाना चाहता हूँ।’’ लेकिन अक्रूर ने भी शतधन्वा की किसी भी प्रकार की मदद करने से इंकार कर दिया। हाँ, उसने वह मणि अपने पास अवश्य रख ली।
शतधन्वा का पलायन और सुदर्शन चक्र से अंत
अब शतधन्वा के पास और कोई विकल्प नहीं बचा था। वह अपने प्राण बचाने के लिए अपने रथ पर सवार होकर कहीं भाग गया। लेकिन शीघ्र ही बलराम और कृष्ण ने उसका पता लगा लिया और उसका पीछा करना शुरू किया। शतधन्वा ने अपना रथ पूरी गति से भगाना शुरू कर दिया। कृष्ण ने भी पूरी गति के साथ अपना रथ शतधन्वा के पीछे दौड़ा दिया।
मिथिला के निकट शतधन्वा के रथ का एक घोड़ा ठोकर खाकर गिर पड़ा और रथ लड़खड़ाने लगा। शतधन्वा ने इसके बाद भी भागने की कोशिश की, लेकिन कृष्ण ने सुदर्शन चक्र फेंककर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार शतधन्वा को अपने कृत्य का मूल्य चुकाना पड़ा।
मणि की खोज और कृष्ण का संदेह से बचने का विचार
कृष्ण ने स्यामंतक मणि ढूँढ़ने का प्रयास किया, लेकिन वह उन्हें कहीं नहीं मिली। तब कृष्ण के दिमाग में आया कि अवश्य ही वह मणि अक्रूर के पास होगी। कृष्ण ने सोचा, ‘जब तक वह मणि मिल नहीं जाती, मैं लोगों की दृष्टि में संदेहास्पद बना रहूँगा।’
यह सोचकर कृष्ण ने अक्रूर को बुला भेजा। अक्रूर के आने पर कृष्ण ने उससे कहा, ‘‘अक्रूर, मुझे पता है शतधन्वा ने सुरक्षा की दृष्टि से स्यामंतक मणि तुम्हारे पास रख दी थी। तुम वह मणि अपने पास ही रख सकते हो, लेकिन यह बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लो कि मणि तुम्हारे पास है। इससे लोगों के दिमाग के सारे संदेह दूर हो जाएँगे।’’
द्वारका की सार्वजनिक सभा में मणि और अक्रूर को वापसी
अक्रूर तो श्रीकृष्ण का संदेश मिलने के समय से ही भय से काँप रहा था। उसने चुपचाप मणि निकालकर कृष्ण को दे दी। कृष्ण ने अक्रूर से कहा, ‘‘मैं द्वारका के लोगों को मणि दिखाने के बाद फिर से इसे तुम्हें ही वापस कर दूँगा।’’ अक्रूर को कृष्ण की बात पर पूरा भरोसा था।
फिर कृष्ण ने द्वारका के लोगों की एक सार्वजनिक सभा में उस मणि को दिखाने के बाद उसे अक्रूर को ही वापस कर दिया।
भक्ति से जुड़ा संदेश: प्रभु की शरण ही सच्चा आश्रय और सत्य की पारदर्शिता
इस कथा में सबसे बड़ा संदेश यह है कि बुरे कर्म करने वाले को संसार में कोई सच्चा आश्रय नहीं मिलता। शतधन्वा ने पहले कृतवर्मा से और फिर अक्रूर से शरण माँगी, पर किसी ने उसे सहारा नहीं दिया, क्योंकि वे कृष्ण के हाथों मरना नहीं चाहते थे। जो अधर्म के रास्ते पर चलता है, उसे अंत में अकेला ही रह जाना पड़ता है, जबकि प्रभु की शरण में जाने वाला कभी निराश्रित नहीं होता।
कृष्ण का आचरण पारदर्शिता और धैर्य का सुंदर उदाहरण है। जब उन्हें लगा कि जब तक मणि नहीं मिलती वे लोगों की दृष्टि में संदेहास्पद बने रहेंगे, तब उन्होंने स्वयं आगे बढ़कर सत्य को सबके सामने रखने का मार्ग चुना। मणि को सार्वजनिक सभा में दिखाकर उन्होंने किसी पर आरोप नहीं लगाया, बल्कि सत्य को स्वयं बोलने दिया। भक्त के लिए भी यही मार्ग उचित है कि वह अपने ऊपर लगे संदेहों का उत्तर क्रोध से नहीं, सत्य और पारदर्शिता से दे।
अक्रूर का कृष्ण पर पूरा भरोसा रखना भी इस कथा का भाव है। उसने भय में काँपते हुए भी मणि सौंप दी और कृष्ण ने अपने वचन के अनुसार उसे लौटा दिया। प्रभु अपने शरणागत का विश्वास कभी नहीं तोड़ते, और जो उन पर भरोसा करता है, उसके साथ वे न्याय और करुणा से पेश आते हैं।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि अधर्म और अपराध करने वाले को अंत में कोई बचा नहीं सकता। शतधन्वा को न कृतवर्मा ने शरण दी, न अक्रूर ने, और कृष्ण ने उसे दंड दिया।
दूसरी सीख यह है कि अपने ऊपर लगे संदेहों को दूर करने के लिए सत्य को सबके सामने रखना चाहिए। कृष्ण ने सार्वजनिक सभा में मणि दिखाकर सबके मन के संदेह मिटा दिए।
तीसरी सीख यह है कि दिए हुए वचन का पालन करना चाहिए। कृष्ण ने सभा में मणि दिखाने के बाद उसे अक्रूर को ही लौटाने का वचन निभाया।
चौथी सीख यह है कि किसी के भरोसे का सम्मान करना चाहिए। अक्रूर को कृष्ण की बात पर पूरा भरोसा था और उसका भरोसा टूटा नहीं।
पाँचवीं सीख यह है कि भय के कारण गलत का साथ देने से बचना चाहिए, पर साथ ही गलत करने वाले को अपना भी साथ नहीं देना चाहिए। कृतवर्मा और अक्रूर ने शतधन्वा की मदद से इंकार कर दिया।
कथा का सार
शतधन्वा के अंत और मणि के सार्वजनिक प्रदर्शन के बाद कृष्ण के ऊपर से सारे संदेह मिट गए और मणि फिर अक्रूर के पास सुरक्षित रही। यह कथा सिखाती है कि सत्य की पारदर्शिता, वचन-पालन और प्रभु पर भरोसा हर संदेह और संकट को दूर कर देते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।