श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 55

कृष्ण और नरकासुर: पृथ्वी पुत्र का अत्याचार, इंद्र की पुकार और द्वारकाधीश की शरण

वराह अवतार में भगवान विष्णु ने पृथ्वी को समुद्र से निकाला और पृथ्वी ने नरकासुर को जन्म दिया। वही नरकासुर तीनों लोकों के लिए आतंक बन गया। उसने इंद्र के हाथी, माता अदिति के कुंडल और वरुण का छाता छीन लिया। हारकर इंद्र श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचे। पढ़ें पूरी कथा।

कृष्ण और नरकासुर: पृथ्वी पुत्र का अत्याचार, इंद्र की पुकार और द्वारकाधीश की शरण
कृष्ण और नरकासुर: पृथ्वी पुत्र का अत्याचार, इंद्र की पुकार और द्वारकाधीश की शरण — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

वराह अवतार में भगवान विष्णु ने पृथ्वी को समुद्र की गहराइयों से निकाला और पृथ्वी ने जिस पुत्र को जन्म दिया, वही आगे चलकर भयानक दैत्य नरकासुर बना। उसने इंद्र के हाथी, माता अदिति के कुंडल और वरुण का छाता छीन लिया। जब कोई सहारा न बचा, तब इंद्र उसी की शरण में पहुँचे जो नरकासुर को पाठ पढ़ाने की शक्ति रखते थे, श्रीकृष्ण।

पृथ्वी पुत्र नरकासुर का जन्म और तीनों लोकों में आतंक

अपने वराह अवतार में भगवान विष्णु पृथ्वी को समुद्र की गहराइयों से निकाल कर लाए थे। समुद्र के गर्भ से निकलने के बाद पृथ्वी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो बाद में नरकासुर नाम से जाना गया। पृथ्वी जैसी माता का पुत्र होने के बाद भी नरकासुर आगे चलकर एक भयानक दैत्य बना।

बड़ा होने पर वह तीनों लोकों के लोगों को आतंकित करने लगा। हर कोई नरकासुर के नाम से ही थर्राता था। राजाओं, साधुओं, देवताओं, दैत्यों, किसी में भी नरकासुर का विरोध करने का साहस नहीं था। नरकासुर तीनों लोकों में विभिन्न राज्यों पर आक्रमण करता था और वहाँ लूटपाट और अत्याचार करता था। अपने आक्रमणों में वह दयाभाव का जरा सा भी परिचय नहीं देता था। वह स्त्रियों को भी नहीं छोड़ता था और अपने अंतःपुर में शामिल करने के लिए उनका भी हरण कर लेता था।

इंद्र के हाथियों पर नरकासुर की नज़र

एक दिन अपने सिंहासन पर आराम से बैठे हुए नरकासुर ने अपने एक मंत्री से पूछा, ‘‘मुझे बताओ, इंद्र के पास चार दाँतों वाले कितने हाथी हैं?’’

मंत्री ने उत्तर दिया, ‘‘इंद्र के पास ऐसे हजारों हाथी हैं, महाराज और उन सभी हाथियों की उत्पत्ति का स्रोत ऐरावत है।’’

नरकासुर के मन में इंद्र की गज सम्पदा पर अधिकार कर लेने की बात आई। उसने तत्काल अपनी सेना को अमरावती की ओर कूच करने का आदेश दिया। शीघ्र ही नरकासुर की सेना इंद्रलोक जा पहुँची। राक्षसों ने इंद्र की गजशाला पर अधिकार कर लिया। इंद्र निःसहाय होकर अपने सारे हाथियों को छिनते हुए देख रहे थे।

माता अदिति के कुंडल और वरुण का छाता

नरकासुर ने स्वर्ग में खूब लूटपाट मचाई। हाथियों की लूटपाट करते हुए नरकासुर की दृष्टि दूर चमकती हुई एक चमकीली वस्तु पर पड़ी। पता करने पर ज्ञात हुआ कि वे देवताओं की माता अदिति के कुंडल हैं। नरकासुर ने उन कुंडलों को भी नहीं छोड़ा। माता अदिति से उसने बलपूर्वक उन कुंडलों को छीन लिया। यही नहीं, उसने वरुण देव का छाता भी छीन लिया।

जब इंद्र ने नरकासुर को अपनी ओर आते देखा तो वे अपने ऐरावत पर सवार होकर वहाँ से भाग निकले। इंद्र सोच रहे थे, ‘उस दुष्ट दानव ने बलपूर्वक मेरी माता के कुंडल छीन लिए और स्वर्ग में लूटपाट की। मैं उसका कुछ न कर सका। लेकिन मैं जानता हूँ कि उसे पाठ पढ़ाने की शक्ति कौन रखता है।’

इंद्र की श्रीकृष्ण के महल में पुकार

यह सोचते हुए इंद्र श्रीकृष्ण के महल में जा पहुँचे। उस समय इंद्र सत्यभामा के साथ बैठे हुए थे [कृष्ण सत्यभामा के साथ बैठे हुए थे]। इंद्र को दुखी देखकर कृष्ण ने पूछा, ‘‘क्या बात है, देवराज? आप इतने दुखी क्यों हैं?’’

‘‘प्रभो, दुष्ट नरकासुर ने स्वर्ग पर आक्रमण करके मेरी सम्पत्ति और हाथी छीन लिए। यही नहीं उसने मेरी माता अदिति के कुंडलों का भी हरण कर लिया। उसने वरुण का छाता भी छीन लिया और मुझे अमरावती से बाहर खदेड़ दिया। मुझ पर दया करके मुझे न्याय दिलाइए।’’ इंद्र ने हाथ जोड़कर कहा।

‘‘अभी वह कहाँ है?’’ सत्यभामा ने पूछा।

‘‘वह अपनी अभेद्य राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर जा पहुँचा है।’’ इंद्र ने उत्तर दिया।

कृष्ण का आश्वासन और सत्यभामा को साथ ले चलने का विचार

कृष्ण ने इंद्र को सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘देवराज, चिंता न करें। माता अदिति से कुंडल छीनकर नरकासुर ने अपनी मृत्यु को आमंत्रण दिया है।’’ यह कहकर कृष्ण ने अपना शंख और शस्त्र उठाया। उसी समय उनके सम्मुख गरुड़ भी प्रकट हो गया। वे जब गरुड़ पर सवार होने वाले थे, उनकी दृष्टि सत्यभामा पर पड़ी। वह बड़ी ही दुखी लग रही थी।

कृष्ण ने सोचा, ‘सत्यभामा ने सोचा भी नहीं होगा कि मुझे इतनी जल्दी उससे पृथक होना पड़ेगा। इसीलिए वह इतनी दुखी हो गई है। मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता। लेकिन मुझे नरकासुर को भी उसके कृत्य का दंड देना है। उचित यही होगा कि मैं सत्यभामा को भी अपने साथ ले चलूँ।’ यह विचार करके कृष्ण ने सत्यभामा की ओर देखा।

भक्ति से जुड़ा संदेश: शरणागति, न्याय की पुकार और प्रभु का आश्वासन

इस कथा में सबसे सुंदर क्षण वह है जब सब कुछ छिन जाने के बाद इंद्र सोचते हैं कि उसे पाठ पढ़ाने की शक्ति कौन रखता है, और सीधे श्रीकृष्ण के महल जा पहुँचते हैं। स्वर्ग के राजा होकर भी इंद्र ने जान लिया कि जहाँ अपना बल काम न आए, वहाँ प्रभु की शरण ही अंतिम सहारा है। भक्ति का यही अर्थ है कि संकट में मनुष्य अपना अहंकार छोड़कर भगवान के चरणों में हाथ जोड़कर खड़ा हो जाए।

इंद्र ने हाथ जोड़कर कहा कि प्रभो, मुझ पर दया करके मुझे न्याय दिलाइए। भक्त जब सच्चे मन से अपनी पीड़ा प्रभु के सामने रखता है, तो उसे किसी लंबी भूमिका की आवश्यकता नहीं होती। श्रीकृष्ण ने भी देर नहीं की। उन्होंने तुरंत आश्वासन दिया कि चिंता न करें और शंख तथा शस्त्र उठा लिए। यह प्रसंग बताता है कि शरण में आए भक्त की पुकार प्रभु तक पहुँचती है और वे उसे अकेला नहीं छोड़ते।

नरकासुर की कथा यह भी याद दिलाती है कि बल और सत्ता का अहंकार जब मर्यादा तोड़ता है, तो वह अपने ही विनाश को निमंत्रण देता है। जिस माता का वह पुत्र था, उसी धरती पर अत्याचार करना और देवताओं की माता अदिति के कुंडल छीन लेना उसके पतन का कारण बना। कृष्ण के शब्दों में, कुंडल छीनकर उसने अपनी मृत्यु को आमंत्रण दिया।

कथा के अंत में श्रीकृष्ण का सत्यभामा की ओर देखना भगवान के उस कोमल स्वरूप को दिखाता है जो धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाते हैं, पर अपने प्रिय जनों के मन की उदासी भी पढ़ लेते हैं। वे दंड देने जा रहे थे, फिर भी उनका ध्यान सत्यभामा के दुखी चेहरे पर गया। जो प्रभु इतने बड़े कार्य के बीच भी अपने भक्त और अपने प्रिय के मन की बात समझ लेते हैं, उनकी शरण में कोई भी चिंता टिक नहीं सकती।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि अच्छे कुल या श्रेष्ठ माता-पिता का होना ही महानता की गारंटी नहीं है। पृथ्वी जैसी माता का पुत्र होकर भी नरकासुर अपने कर्मों से भयानक दैत्य बना। मनुष्य की पहचान उसके कर्मों से होती है।

दूसरी सीख यह है कि अहंकार और लालच की कोई सीमा नहीं होती। इंद्र के हाथियों की बात सुनते ही नरकासुर ने सेना को कूच का आदेश दे दिया और आगे चलकर माता अदिति के कुंडलों तक को नहीं छोड़ा।

तीसरी सीख यह है कि माता और बड़ों का अपमान सबसे बड़ा अपराध है। कृष्ण ने कहा कि माता अदिति से कुंडल छीनकर नरकासुर ने अपनी मृत्यु को आमंत्रण दिया है।

चौथी सीख यह है कि जब अपनी शक्ति काम न आए, तब प्रभु की शरण में जाना ही सच्चा उपाय है। इंद्र निःसहाय हुए तो उन्होंने श्रीकृष्ण की ओर ही रुख किया।

पाँचवीं सीख यह है कि भगवान शरण में आए भक्त को आश्वासन देते हैं और उसकी रक्षा के लिए तुरंत तैयार हो जाते हैं। इंद्र की पुकार सुनते ही कृष्ण ने शंख और शस्त्र उठा लिए।

छठी सीख यह है कि कर्तव्य निभाते समय भी अपने प्रियजनों की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए। नरकासुर को दंड देने जाते हुए भी कृष्ण ने सत्यभामा का दुखी मन देखा और उन्हें अकेला न छोड़ने का विचार किया।

कथा का सार

पृथ्वी के पुत्र नरकासुर ने अहंकार में इंद्र के हाथी, माता अदिति के कुंडल और वरुण का छाता छीन लिया, पर पीड़ित इंद्र ने श्रीकृष्ण की शरण ली और प्रभु ने तुरंत उन्हें आश्वासन दिया। यह कथा सिखाती है कि अत्याचार का अंत निश्चित है और जो भक्त संकट में सच्चे मन से प्रभु को पुकारता है, उसे वे कभी अकेला नहीं छोड़ते। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।