श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 56

कृष्ण और मुर: प्राग्ज्योतिषपुर की दीवारें, पाँच सिरों वाले दानव का अंत और सुदर्शन चक्र

गरुड़ पर सत्यभामा के साथ सवार होकर श्रीकृष्ण नरकासुर की अभेद्य राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे। उन्होंने पर्वत, मायावी अस्त्र, जल और अग्नि की दीवारों को भेद दिया। फिर सोते हुए पाँच सिरों वाले दानव मुर को शंख बजाकर जगाया और सुदर्शन चक्र से उसका अंत किया। पढ़ें पूरी कथा।

कृष्ण और मुर: प्राग्ज्योतिषपुर की दीवारें, पाँच सिरों वाले दानव का अंत और सुदर्शन चक्र
कृष्ण और मुर: प्राग्ज्योतिषपुर की दीवारें, पाँच सिरों वाले दानव का अंत और सुदर्शन चक्र — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

नरकासुर की अभेद्य राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर पर्वतों, जल, अग्नि और वायु की दीवारों से घिरी थी और उसके द्वार पर पाँच सिरों वाला दानव मुर पहरा देता था। इंद्र की चेतावनी सुनकर श्रीकृष्ण केवल मुस्कुराए। उन्होंने सत्यभामा को साथ लेकर हर बाधा पार की और सुदर्शन चक्र के एक इशारे से मुर का अंत कर दिया।

गरुड़ पर प्रस्थान और इंद्र की चेतावनी

कृष्ण ने सत्यभामा को अपने साथ ही गरुड़ पर बैठा लिया। वे स्वयं उसके पीछे बैठे। वे चल ही रहे थे तभी इंद्र ने कहा, ‘‘प्रभो, प्राग्ज्योतिषपुर को विजय करना हम देवताओं के लिए भी असम्भव है। वह नगर पर्वतों, जल, अग्नि और वायु की दीवारों से सुरक्षित किया गया है। पाँच सिरों वाला दानव मुर नरकासुर के महल के द्वार की रक्षा करता है। आप अपना और रानी सत्यभामा का ध्यान रखिएगा।’’

पर्वत, मायावी अस्त्र, जल और अग्नि की दीवारों को भेदना

इंद्र की बात सुनकर कृष्ण मुस्कुराए। फिर उनके संकेत पर गरुड़ आकाश में ऊपर उठता चला गया। प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचने पर गरुड़ की चोंच किसी कठोर वस्तु से टकराई। कृष्ण ने देखा तो अपने सभी ओर पर्वतों को पाया। उन पर्वतों को लांघना किसी के लिए भी असम्भव था। लेकिन कृष्ण ने अपनी गदा उठाकर एक पर्वत पर जोर से आघात किया। कुछ ही क्षणों में वे सभी पर्वत विदीर्ण हो गए।

तभी कृष्ण पर मायावी अस्त्रों की बरसात होने लगी। कृष्ण ने दिव्य शरों की बौछार करके उन सभी अस्त्रों को व्यर्थ कर दिया। थोड़ा और आगे जाने पर कृष्ण को जल की दीवार मिली। आग्नेयास्त्र का प्रयोग करके कृष्ण ने उस दीवार को भी नष्ट कर दिया। फिर कृष्ण को अग्नि की दीवार मिली। वारुणास्त्र चलाकर कृष्ण ने उसे भी समाप्त कर दिया। इस प्रकार सभी बाधाओं को लांघते हुए कृष्ण नरकासुर की राजधानी पहुँच गए।

सोते हुए मुर को शंखनाद से जगाना

कृष्ण ने नरकासुर के महल के बाहर दानव मुर को गहरी निद्रा में सोते हुए देखा। उन्होंने सोचा, ‘‘आघात करने से पहले मैं इस दानव को इसकी नींद से जगाऊँगा।’’ यह सोचते हुए कृष्ण ने अपना शंख निकाला और विजयसुर फूँक दिया। शंख की बुलंद आवाज सुनते ही मुर चौंककर उठ बैठा। उसने गरुड़ पर सवार कृष्ण को अपने ऊपर मंडराते हुए देखा। वह बोला, ‘‘कृष्ण, मैं जानता हूँ कि तुम मेरे स्वामी नरकासुर को मारने के लिए आए हो। लेकिन उन तक पहुँचने से पहले तुम्हें मुझे पराजित करना होगा।’’

यह कहकर मुर ने अपना चमकता हुआ त्रिशूल उठाकर कृष्ण पर फेंका। लेकिन कृष्ण ने एक दिव्य बाण चलाकर उस त्रिशूल को मार्ग में ही तीन भागों में विभाजित कर दिया। यह देखकर मुर क्रोधावेश से काँप उठा। उसके त्रिशूल का वार संभालना किसी साधारण मानव के बस की बात नहीं थी। बड़े-बड़े राजा और देवता भी उसके त्रिशूल का मुकाबला नहीं कर सकते थे।

गदा का टकराव और नरकासुर का जागना

तभी कृष्ण ने बाणों की बौछार करके मुर के पाँचों मुख अपने बाणों से भर दिए। मुर के लिए बोल पाना भी असम्भव हो गया। मुर ने अपनी गदा घुमाकर कृष्ण पर फेंकी। कृष्ण ने गदा का जवाब गदा से दिया। दोनों गदाओं के टकराने पर भयानक विस्फोट हुआ और मुर की गदा के टुकड़े-टुकड़े हो गए।

उस वज्राघात जैसी ध्वनि से नरकासुर भी अपनी नींद से उठ बैठा। जब उसने खिड़की से बाहर झाँका तो वहाँ का दृश्य देखकर वह अचम्भे में पड़ गया। मुर को कृष्ण के साथ युद्ध करते देखकर नरकासुर सोचने लगा, ‘क्या मुर कृष्ण को पराजित करने में सफल हो सकेगा?’

सुदर्शन चक्र से मुर का अंत और पुत्रों का संहार

तभी मुर ने अपनी सारी ताकत समेटकर कृष्ण पर फिर हमला बोला। सत्यभामा को आश्वस्त कर देने के भाव से कृष्ण ने एक बाँह उसके कंधों पर रखते हुए अपनी एक उंगली उठाई और उस उंगली पर सुदर्शन चक्र नाचने लगा। कृष्ण ने उंगली का इशारा मुर की ओर किया। उसी क्षण चक्र ने मुर के पाँचों सिरों को उसके धड़ से अलग कर दिया।

जब मुर के पाँच पुत्रों ने अपने पिता की यह दशा देखी तो उन्होंने भी गदाएँ और तलवारें उठाकर कृष्ण पर आक्रमण किया। लेकिन कृष्ण ने शीघ्र ही उन सब को भी परलोक भेज दिया।

भक्ति से जुड़ा संदेश: प्रभु पर भरोसा, बाधाओं का अंत और मुरारी का नाम

इंद्र की चेतावनी सुनकर कृष्ण का मुस्कुराना इस कथा का सबसे गहरा संकेत है। जिस नगर को जीतना देवताओं के लिए भी असम्भव माना गया, उसके सामने भी प्रभु के मन में कोई भय नहीं था। भक्त के लिए यही सीख है कि जब जीवन की बाधाएँ पर्वत जैसी बड़ी लगें, तब भी जिसने प्रभु का हाथ पकड़ रखा है, उसे घबराने की आवश्यकता नहीं। जो बाधा हमें असम्भव दिखती है, वह प्रभु के संकेत मात्र से टूट जाती है।

कृष्ण ने एक के बाद एक पर्वत, मायावी अस्त्र, जल की दीवार और अग्नि की दीवार को पार किया और हर बाधा का उत्तर उसी के अनुरूप साधन से दिया। यह दिखाता है कि प्रभु की कृपा से हर संकट का समाधान मिल जाता है। भक्त को केवल श्रद्धा के साथ आगे बढ़ते रहना है।

मुर को सोते हुए देखकर कृष्ण ने उसे पहले जगाने का निश्चय किया। यह प्रसंग भगवान की मर्यादा और धर्म के प्रति निष्ठा को दिखाता है। वे धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाते हैं, पर उनका आचरण सदा न्याय और मर्यादा के अनुरूप रहता है।

सबसे सुंदर दृश्य वह है जब मुर के अंतिम आक्रमण के समय कृष्ण ने सत्यभामा के कंधों पर बाँह रखकर उन्हें आश्वस्त किया और उसी भाव से उंगली पर सुदर्शन चक्र नचा दिया। युद्ध के बीच भी प्रभु अपने प्रिय जन को निश्चिंत रखते हैं। जो भगवान के आश्रय में है, उसके पास भय के लिए कोई स्थान नहीं रहता। परंपरा में इसी मुर दानव के वध के कारण श्रीकृष्ण को ‘मुरारी’ नाम से भी स्मरण किया जाता है।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि बाधा कितनी भी बड़ी हो, प्रभु पर भरोसा रखने वाला उससे नहीं डरता। इंद्र ने प्राग्ज्योतिषपुर को असम्भव बताया, पर कृष्ण केवल मुस्कुराए और आगे बढ़ गए।

दूसरी सीख यह है कि हर समस्या का समाधान सही उपाय और धैर्य से मिलता है। कृष्ण ने पर्वत पर गदा से, मायावी अस्त्रों पर दिव्य बाणों से, जल की दीवार पर आग्नेयास्त्र से और अग्नि की दीवार पर वारुणास्त्र से विजय पाई।

तीसरी सीख यह है कि शक्ति के साथ मर्यादा भी होनी चाहिए। कृष्ण ने सोते हुए मुर पर आघात नहीं किया, पहले शंख बजाकर उसे जगाया।

चौथी सीख यह है कि अहंकार और बाहुबल अंत में काम नहीं आते। जिस त्रिशूल का सामना बड़े-बड़े राजा और देवता नहीं कर सकते थे, उसे कृष्ण ने एक ही बाण से तीन टुकड़ों में बाँट दिया।

पाँचवीं सीख यह है कि अधर्म का साथ देने वाले का अंत भी उसके स्वामी के साथ ही निश्चित होता है। मुर ने नरकासुर के द्वार की रक्षा की, पर वह स्वयं और उसके पाँचों पुत्र कृष्ण के हाथों समाप्त हुए।

छठी सीख यह है कि प्रभु अपने प्रिय जनों को हर परिस्थिति में आश्वस्त रखते हैं। भीषण युद्ध के बीच भी कृष्ण ने सत्यभामा के कंधे पर बाँह रखकर उन्हें निर्भय किया।

कथा का सार

इंद्र ने जिस प्राग्ज्योतिषपुर को देवताओं के लिए भी असम्भव बताया था, उसकी पर्वत, जल और अग्नि की दीवारों को श्रीकृष्ण ने भेद दिया और सुदर्शन चक्र के एक इशारे से पाँच सिरों वाले दानव मुर का अंत कर दिया। यह कथा सिखाती है कि प्रभु की शरण में रहने वाले भक्त के लिए कोई बाधा असम्भव नहीं और अधर्म चाहे जितना शक्तिशाली दिखे, उसका अंत निश्चित है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।