श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 52

कृष्ण, जाम्बवती और सत्यभामा: जाम्बवंत का समर्पण, सत्राजीत की क्षमायाचना और शतधन्वा का षड्यंत्र

अट्ठाईस दिन के युद्ध के बाद जाम्बवंत ने कृष्ण के आगे समर्पण कर दिया और मणि के साथ अपनी पुत्री जाम्बवती उन्हें सौंप दी। द्वारका लौटकर कृष्ण ने मणि सत्राजीत को लौटाई, सत्राजीत ने क्षमा माँगी और सत्यभामा का विवाह कृष्ण से तय हुआ। पर शतधन्वा ने सत्राजीत की हत्या कर मणि चुरा ली। पढ़ें पूरी कथा।

कृष्ण, जाम्बवती और सत्यभामा: जाम्बवंत का समर्पण, सत्राजीत की क्षमायाचना और शतधन्वा का षड्यंत्र
कृष्ण, जाम्बवती और सत्यभामा: जाम्बवंत का समर्पण, सत्राजीत की क्षमायाचना और शतधन्वा का षड्यंत्र — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

अट्ठाईस दिन के युद्ध के बाद जाम्बवंत ने कृष्ण के आगे समर्पण कर दिया और स्यामंतक मणि के साथ अपनी पुत्री जाम्बवती भी उन्हें सौंप दी। द्वारका लौटकर कृष्ण ने मणि सत्राजीत को दी, सत्राजीत ने क्षमा माँगी और सत्यभामा का विवाह कृष्ण से तय किया, पर इससे क्रुद्ध शतधन्वा ने सत्राजीत की हत्या कर दी।

गुफा के बाहर प्रतीक्षा और द्वारका में शोक

जब कृष्ण बारह दिनों तक गुफा से बाहर नहीं निकले तो गुफा के बाहर खड़े उनके सहयोगी व्याकुल होने लगे। उनके दिमाग में यही आया कि कृष्ण का जीवन समाप्त हो गया है। यह सोचकर वे द्वारका लौट गए और कृष्ण के परिवार के सदस्यों को यह सूचना दे दी। पूरे द्वारका पर दुख के बादल छा गए। लोगों को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि संसार में कोई ऐसा भी है, जो कृष्ण को मार सके।

जाम्बवंत का समर्पण: अट्ठाईस दिनों का संग्राम

उधर गुफा के अंदर कृष्ण और जाम्बवंत का संग्राम जारी था। अट्ठाईस दिनों तक लगातार लड़ने के बाद भी कृष्ण पर थकावट का लेशमात्र भी नजर नहीं आ रहा था। उधर जाम्बवंत थक गया था। उसे लग रहा था जैसे उसका अंग-अंग टूट रहा हो। कृष्ण को पूरी तरह तरोताजा और स्वस्थ देखकर जाम्बवंत को बड़ा आश्चर्य हो रहा था। वह कृष्ण से बोला, ‘‘आप मुझे अजेय प्रतीत हो रहे हैं। मैं आपके समक्ष समर्पण करता हूँ।’’

स्यामंतक मणि और जाम्बवती से कृष्ण का विवाह

उनका युद्ध रुक गया। कृष्ण को स्यामंतक मणि देते हुए जाम्बवंत बोला, ‘‘मैं आपको इस मणि के साथ अपनी पुत्री जाम्बवती को भी पत्नी रूप में देना चाहता हूँ। उसे स्वीकार करके मुझे कृतार्थ कीजिए।’’

इस पर कृष्ण ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं तुम्हारी बेटी जाम्बवती को पत्नी रूप में स्वीकार करता हूँ। लेकिन विवाह के बाद मुझे शीघ्रातिशीघ्र द्वारका लौटना होगा। मुझे यह मणि इसके स्वामी को वापस करनी है।’’

जाम्बवंत ने तुरंत कृष्ण की यह बात मान ली। रीछ जाम्बवंत की बेटी थी तो रीछनी ही, लेकिन जैसे ही कृष्ण ने उसे जयमाला डाली, वह एक सुंदर स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गई।

द्वारका में कृष्ण की वापसी और रुक्मिणी की प्रसन्नता

फिर कृष्ण अपनी नई पत्नी और स्यामंतक मणि के साथ द्वारका लौट आए। द्वारका के लोग कृष्ण को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। वे तो यही मान बैठे थे कि अब कृष्ण उन्हें कभी नहीं दिखेंगे। जंगल की आग की तरह यह समाचार कृष्ण के परिवार तक जा पहुँचा। अब तो उनकी भी प्रसन्नता का पार न रहा। रुक्मिणी तो अपने मन की प्रसन्नता छिपा भी नहीं सकी। अपने पति को देखने के लिए वह अपने महल से दौड़कर बाहर निकल आई।

सत्राजीत की क्षमायाचना और सत्यभामा का विवाह

कृष्ण भी रुक्मिणी को इतने दिनों बाद देखकर बड़े प्रसन्न हुए। अपने महल में प्रवेश करते समय उन्होंने अपने एक सेवक से सत्राजीत को बुला लाने को कहा। सत्राजीत के आने पर कृष्ण ने उसे स्यामंतक मणि दी और पूरी बात कह सुनाई। कृष्ण के विषय में अनर्गल बातें फैलाने के कारण सत्राजीत अब पछता रहा था। वह कृष्ण के पैरों में गिर गया और क्षमायाचना करने लगा। कृष्ण ने उसे क्षमा कर दिया। फिर सत्राजीत ने कहा, ‘‘आप इस मणि को स्वीकार कीजिए। साथ ही मेरी बेटी सत्यभामा को भी पत्नी रूप में स्वीकार कर लीजिए।’’

कृष्ण सत्राजीत से बोले, ‘‘तुम्हारी पुत्री को पत्नी रूप में मैं प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करता हूँ। लेकिन मणि को तुम अपने पास ही रखो।’’ सत्राजीत ने कृष्ण की यह बात स्वीकार कर ली।

अक्रूर, कृतवर्मा और शतधन्वा का षड्यंत्र: सत्राजीत की हत्या

जब सत्यभामा के कृष्ण से विवाह का समाचार अक्रूर, कृतवर्मा और शतधन्वा को मिला, तो वे बड़े क्रोधित हुए। वे सभी स्वयं अनिंद्य सुंदरी सत्यभामा से विवाह करना चाहते थे। उन सबने सत्राजीत के विरुद्ध साँठगाँठ कर ली।

एक रात जब सत्राजीत अपने महल में सो रहा था, दुष्ट शतधन्वा ने वहाँ घुसकर उसे मार डाला। मणि को लेकर वह द्वारका से दूर भाग गया। जब सत्राजीत के परिवार के लोगों को उसकी हत्या की बात पता चली तो उन्हें तीव्र आघात लगा। सत्यभामा का तो हृदय ही टूट गया। उस समय कृष्ण हस्तिनापुर में थे। वह शीघ्र ही हस्तिनापुर जा पहुँची और वहाँ पहुँचकर कृष्ण को सब कुछ बताया। सत्राजीत की हत्या की बात सुनकर कृष्ण को भी बड़ा क्रोध आया। उन्होंने सत्यभामा को आश्वासन दिया कि सत्राजीत के हत्यारे को वे जीवित नहीं छोड़ेंगे।

भक्ति से जुड़ा संदेश: प्रभु की क्षमा, वचन और शरणागत का सम्मान

इस कथा में सबसे पहले जाम्बवंत का समर्पण भक्ति की भावना को प्रकट करता है। अट्ठाईस दिनों के युद्ध के बाद जब उसने देखा कि कृष्ण पर थकावट का कोई चिह्न नहीं है, तब उसने सहज भाव से अपनी हार स्वीकार की और कहा कि मैं आपके समक्ष समर्पण करता हूँ। जब मनुष्य अपने बल का अभिमान छोड़कर प्रभु की शक्ति के आगे झुक जाता है, तभी भक्ति का आरंभ होता है।

कृष्ण का वचन-पालन भी प्रेरणा देता है। उन्होंने जाम्बवती को स्वीकार करते समय कहा कि उन्हें शीघ्र द्वारका लौटकर मणि उसके स्वामी को वापस करनी है। जिस मणि के लिए वे वन में गए थे, उसे उन्होंने स्वयं नहीं रखा, बल्कि सत्राजीत को लौटा दिया और बाद में उसे अपने पास ही रखने को कहा। भगवान के आचरण में निर्लोभ भाव और अमानत के प्रति ईमानदारी दिखती है।

सत्राजीत की क्षमायाचना और कृष्ण का उसे क्षमा कर देना क्षमा के सौंदर्य को दिखाता है। जिसने उन पर अनर्गल बातें फैलाई थीं, उसे भी कृष्ण ने बिना कटु शब्द कहे क्षमा कर दिया। सच्चा भक्त भी पश्चाताप के साथ प्रभु के चरणों में गिरता है और उसे प्रभु की कृपा से क्षमा मिलती है। इसी कथा का दूसरा पक्ष यह है कि ईर्ष्या और लोभ में अंधे हुए लोग किस प्रकार दुष्कर्म की ओर बढ़ जाते हैं, और यह भी कि जब भक्त पर संकट आता है तो प्रभु उसे आश्वासन देने में देर नहीं करते, जैसे कृष्ण ने सत्यभामा को हत्यारे को जीवित न छोड़ने का वचन दिया।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि अपनी भूल का पश्चाताप कर क्षमा माँग लेना बड़ा साहस है। सत्राजीत ने कृष्ण के पैरों में गिरकर क्षमायाचना की और कृष्ण ने उसे क्षमा कर दिया।

दूसरी सीख यह है कि दिया हुआ वचन और किसी की अमानत के प्रति ईमानदारी सबसे ऊपर होनी चाहिए। कृष्ण ने मणि को स्वामी तक पहुँचाने का अपना कर्तव्य निभाया।

तीसरी सीख यह है कि अपने से बड़े बल के आगे समर्पण करना कमजोरी नहीं, समझदारी है। जाम्बवंत ने कृष्ण की शक्ति को पहचाना और युद्ध रोक दिया।

चौथी सीख यह है कि ईर्ष्या और लोभ मनुष्य को अपराध की ओर ले जाते हैं। अक्रूर, कृतवर्मा और शतधन्वा ने सत्यभामा को पाने की इच्छा में सत्राजीत के विरुद्ध षड्यंत्र रचा।

पाँचवीं सीख यह है कि संकट के समय अपनों के पास पहुँचकर सहारा माँगना चाहिए। सत्यभामा हस्तिनापुर जाकर कृष्ण से मिलीं और उन्हें आश्वासन मिला।

कथा का सार

जाम्बवंत के समर्पण, जाम्बवती और सत्यभामा के विवाह और सत्राजीत की क्षमायाचना के बाद शतधन्वा के षड्यंत्र ने स्यामंतक मणि की कथा को एक नया मोड़ दे दिया, जहाँ कृष्ण ने सत्यभामा को आश्वासन दिया कि हत्यारे को वे जीवित नहीं छोड़ेंगे। यह कथा सिखाती है कि प्रभु क्षमाशील और वचन के पक्के हैं, और लोभ तथा ईर्ष्या में डूबे लोग अंततः अपने ही कर्मों का फल पाते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।