श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 17

व्योमासुर वध: गड़रिए के वेश में आए राक्षस का अंत

कंस के भेजे राक्षस व्योमासुर ने गड़रिए का रूप धरकर ग्वालबालों के साथ खेल का बहाना बनाया और उन्हें एक-एक करके गुफा में बंद करने लगा। कृष्ण ने उसका पीछा किया, उसका वध किया और सभी साथियों को छुड़ा लिया। पढ़ें पूरी कथा।

व्योमासुर वध: गड़रिए के वेश में आए राक्षस का अंत
व्योमासुर वध: गड़रिए के वेश में आए राक्षस का अंत — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

बकासुर की मृत्यु का समाचार सुनकर कंस झल्ला उठा। उसके एक-एक शक्तिशाली दैत्य एक ग्वाले के हाथों मारे जा रहे थे, फिर भी उसने हार नहीं मानी। इस बार उसने ऐसे राक्षस को चुना जो बल के बजाय छल से कृष्ण को मारना चाहता था।

कंस की झल्लाहट और व्योमासुर का चुनाव

बकासुर की मौत का समाचार सुनकर कंस झल्ला उठा। उसके शक्तिशाली दैत्य एक-एक करके कृष्ण द्वारा मारे जा रहे थे। वह यही सोचकर हैरान था कि इतने भयानक राक्षस एक ग्वाले के हाथों कैसे मारे जाते हैं। लेकिन अब भी उसने हिम्मत नहीं हारी और व्योमासुर नाम के एक और भयानक राक्षस को वृंदावन भेजने का फैसला किया।

गड़रिए का रूप और खेल का बहाना

कंस की आज्ञा मिलते ही व्योमासुर वृंदावन की ओर चल पड़ा। वहाँ उसने अदृश्य रहकर कृष्ण की गतिविधियों पर निगाह रखनी शुरू की और फिर छल से कृष्ण के प्राण हरने की योजना बनाई। उसने एक गड़रिए का रूप धारण किया और ग्वालबालों के साथ खेलने लगा। वह उन्हें नए-नए खेल सुझाता और उसके सुझाए खेल ग्वालबालों को बहुत पसंद आ रहे थे।

एक दिन उसने उन्हें नया खेल सिखाते हुए कहा कि सब ग्वालबाल दो समूहों में बँट जाएँ। बड़ा समूह भेड़ बन जाए और छोटा समूह उनका रखवाला, जबकि वह स्वयं चोर बनकर भेड़ चुराने की कोशिश करेगा।

गुफा में बंद होते गोप

ग्वालबालों को यह खेल बहुत पसंद आया और उन्होंने इसे चुनौती के रूप में लिया। कुछ गोप भेड़ की आवाज निकालते हुए इधर-उधर भागने लगे। चोर बना व्योमासुर उन्हें इस तरह अपने साथ ले जाता, जैसे खेल के अनुसार भेड़ लिए जा रहा हो। इस तरह वह ग्वालबालों को ले जाकर एक गुफा में बंद कर देता।

इस प्रकार बहुत सारे गोप गायब हो गए।

कृष्ण का संदेह और व्योमासुर का अंत

अब कृष्ण को गड़रिए पर संदेह होने लगा। उन्होंने चुपचाप उसका पीछा किया और देख लिया कि वह किस तरह उनके साथियों को गुफा में बंद कर देता है। कृष्ण तुरंत उस गड़रिए पर झपट पड़े। व्योमासुर भी अपने असली रूप में आकर कृष्ण से भिड़ गया।

कुछ क्षणों तक संघर्ष चला। थोड़ी देर लड़ने के बाद कृष्ण ने उसे उठाकर धरती पर पटक दिया और उसकी गर्दन मरोड़ दी। व्योमासुर ने दम तोड़ दिया। उसे चीखने तक का मौका नहीं मिला।

गुफा से साथियों की मुक्ति

फिर कृष्ण ने अपने साथियों को गुफा से मुक्त कराया। कृष्ण को धन्यवाद देते हुए गोपों ने उन्हें अपने कंधों पर उठा लिया।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि मीठे बोल और मनोरंजन के बहाने आने वाला हर व्यक्ति मित्र नहीं होता। व्योमासुर ने खेल के नाम पर विश्वास जीता और उसी विश्वास का दुरुपयोग किया। अजनबी की मीठी बातों पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं करना चाहिए।

दूसरी सीख कृष्ण की सजगता में है। साथियों के गायब होते ही उन्होंने संदेह को अनदेखा नहीं किया, बल्कि चुपचाप पीछा करके सच्चाई जान ली। संकट में सजगता और सही समय पर कदम उठाना ही रक्षा करता है।

तीसरी सीख सच्चे नेतृत्व की है। कृष्ण ने अपने साथियों को संकट में अकेला नहीं छोड़ा, बल्कि स्वयं आगे बढ़कर उन्हें मुक्त कराया। जो नेता अपनों की रक्षा करता है, उसे सबका प्रेम और सम्मान मिलता है।

कथा का सार

व्योमासुर के अंत के साथ कंस की एक और चाल विफल हो गई और कृष्ण के प्रति गोपों का विश्वास और गहरा हुआ। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।