श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 14

वृंदावन का जीवन: गौएँ चराते कृष्ण, बलराम और बाँसुरी की तान

वृंदावन में कृष्ण और बलराम अपने साथी ग्वालों के साथ रोज गौएँ चराने जाने लगे। मिल-बाँटकर भोजन, छिपाछिपी और कृष्ण की मोहक बाँसुरी ने वृंदावन के जीवन को आनंद से भर दिया। पढ़ें पूरी कथा।

वृंदावन का जीवन: गौएँ चराते कृष्ण, बलराम और बाँसुरी की तान
वृंदावन का जीवन: गौएँ चराते कृष्ण, बलराम और बाँसुरी की तान — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

वृंदावन में बच्चे अब बचपन के उत्तरार्ध में पहुँच चुके थे और गौओं को चराने जाने लगे थे। कृष्ण और बलराम की भी यही इच्छा थी, पर नंद को कंस का भय सताता था। काफी जिद के बाद जब उन्हें अनुमति मिली, तो वृंदावन के चरागाहों में कृष्ण के जीवन का सबसे आनंदमय दौर शुरू हुआ।

गौएँ चराने जाने की जिद

समय के साथ बच्चे बड़े होते गए। कृष्ण और बलराम की आयु के बच्चे अब बचपन के उत्तरार्ध में आ गए थे और गौओं को चराने ले जाने लगे थे। कृष्ण और बलराम की भी इच्छा थी कि वे उनके साथ जाएँ, पर नंद उन्हें अनुमति नहीं देते थे। उन्हें भय था कि कहीं कंस उनके बच्चों को हानि न पहुँचा दे।

लेकिन कृष्ण और बलराम की काफी जिद पर उन्होंने अनुमति दे दी। इस प्रकार दोनों भाई अन्य गोपालों के साथ गौएँ चराने जाने लगे, और यह उनकी रोज की दिनचर्या बन गई।

सुबह की तैयारी और दिन भर का खेल

कृष्ण और बलराम सुबह होते ही अपने दोस्तों के साथ गौओं को चराने निकल पड़ते थे। उनकी माताएँ कपड़ों में भोजन बाँधकर उन्हें दे देती थीं। गायों को चरने के लिए छोड़कर लड़के पूरा दिन खेलते रहते थे।

कृष्ण नेता, बलराम नियंत्रक

कृष्ण उस छोटे से दल के नेता थे। बलराम को छोड़कर सभी बच्चे बिना कोई प्रश्न किए कृष्ण का अनुकरण करते थे। बलराम बच्चों के नियंत्रक की भूमिका निभाते थे और जब शैतानियाँ बढ़ने लगतीं तो उन्हें रोकते थे।

कृष्ण बच्चों को रोज नए-नए खेल खिलाते और इस तरह अपना और साथी ग्वालों का भरपूर मनोरंजन करते।

मिल-बाँटकर भोजन और जंगली फल

दोपहर तक खेलते-खेलते जब वे थक जाते, तो किसी पेड़ की छाया में बैठ जाते। फिर अपनी-अपनी पोटली खोलकर भोजन निकालते और उसे मिल-बाँटकर खाते। मिल-बाँटकर खाने का अपना अलग ही आनंद था।

भोजन के बाद वे थोड़ी देर पेड़ों की छाया में विश्राम करते और फिर जंगली बेरों और फलों की तलाश में निकल पड़ते। पेड़ों पर चढ़कर वे फल खाते और डालों पर बंदरों की तरह उछलते।

छिपाछिपी और बाँसुरी की तान

कृष्ण को छिपाछिपी का खेल बहुत पसंद था। वे छिपने का स्थान ढूँढ़ने में बड़े कुशल थे और प्रायः ऐसी जगह छिप जाते थे कि साथियों के लिए उन्हें ढूँढ़ना कठिन हो जाता था।

कृष्ण को बाँसुरी बजाना भी बहुत प्रिय था। वे इतनी अच्छी बाँसुरी बजाते थे कि लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनकी बाँसुरी सुनकर लगता था जैसे स्वर्गलोक का कोई गंधर्व बाँसुरी बजा रहा हो। मनुष्य तो क्या, गाय-बछड़े भी उसकी तान सुनकर उनके चारों ओर आ जुटते थे।

कृष्ण की बाँसुरी की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई थी। पक्षी भी उसे सुनकर उड़ना भूल जाते थे और आसपास के पेड़ों पर आ बैठते थे।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि मिल-बाँटकर खाने में सच्चा आनंद है। कृष्ण और उनके मित्र अपनी-अपनी पोटली खोलकर सबके साथ भोजन करते थे, और इसी में उन्हें अलग ही स्वाद मिलता था।

दूसरी सीख नेतृत्व और संतुलन की है। कृष्ण दल के नेता थे और खेल-खेल में सबका मनोरंजन करते थे, जबकि बलराम नियंत्रक बनकर सीमा में रखते थे। अच्छे समूह में उत्साह और अनुशासन दोनों का संतुलन जरूरी है।

तीसरी सीख यह है कि कला और माधुर्य सबको जोड़ने की शक्ति रखते हैं। कृष्ण की बाँसुरी की तान से मनुष्य, पशु और पक्षी सब एक सूत्र में बँध जाते थे।

कथा का सार

वृंदावन का यह जीवन कृष्ण की बाँसुरी, मित्रता और खेलों से भरा था। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।