श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 15
वत्सासुर वध: बछड़े का रूप धरकर आए राक्षस का अंत
कंस ने जासूसों से कृष्ण का ठिकाना जान लिया और बछड़े का रूप धरने वाले राक्षस वत्सासुर को वृंदावन भेजा। कृष्ण ने उसकी असलियत पहचान ली और उसे पेड़ पर पटककर मार डाला। पढ़ें पूरी कथा।

पूतना और तृणावर्त के बाद भी कंस ने कृष्ण को मारने की योजनाएँ नहीं छोड़ीं। जब उसे पता चला कि गोकुलवासी गाँव छोड़कर कहीं चले गए हैं, तो उसने हर दिशा में जासूस दौड़ा दिए, और जब कृष्ण का ठिकाना मिल गया, तो उसने एक ऐसे राक्षस को चुना जो बछड़े का रूप धर सकता था।
कंस की नई योजना
कंस ने कृष्ण को समाप्त करने की योजनाएँ अभी तक छोड़ी नहीं थीं। पूतना और तृणावर्त के मारे जाने के बाद उसने कुछ अन्य दैत्यों को भेजा था, पर वे भी अपना उद्देश्य पूरा करने में असफल रहे थे। अब कंस अच्छी तरह समझ गया था कि उसका शत्रु कोई सामान्य बालक नहीं है, इसलिए वह ऐसे शक्तिशाली दानवों को तलाश रहा था जिनके सामने कृष्ण का टिक पाना संभव ही न हो।
उसे यह समाचार मिल चुका था कि गोकुल के लोग अपना गाँव छोड़कर किसी नए स्थान पर जा चुके हैं, पर यह किसी को पता नहीं था कि वे रातोंरात कहाँ गए। यह जानकर कंस बहुत क्रोधित हुआ। वह नहीं चाहता था कि उसका शत्रु किसी भी तरह बच निकले, इसलिए कृष्ण का पता लगाने के लिए उसने हर दिशा में जासूस भेजे।
जासूस की सूचना और वत्सासुर को आदेश
शीघ्र ही एक जासूस ने लौटकर बताया कि पूरा गाँव गोकुल छोड़कर वृंदावन पहुँच गया है और कृष्ण वहीं पल-बढ़ रहा है, जो गोपों और गाय-बछड़ों के साथ पूरा दिन चरागाहों में बिताता है। यह सुनकर कंस बहुत प्रसन्न हुआ।
उसने वत्सासुर नाम के एक भयानक राक्षस को बुलाया और कहा कि उसमें बछड़े का रूप धारण करने की क्षमता है। उसका परम शत्रु कृष्ण पूरा दिन वृंदावन में गोपों और बछड़ों के साथ चरागाहों में रहता है, इसलिए वह बछड़े का रूप लेकर वहाँ जाए और मौका मिलते ही कृष्ण को मार डाले।
झुंड में अलग दिखता बछड़ा
दूसरे दिन जब कृष्ण बलराम और अन्य मित्रों के साथ चरागाह में गाय-बछड़ों को चरा रहे थे, तभी उनकी नजर झुंड में मौजूद एक बछड़े पर पड़ी, जो अन्य बछड़ों से बिल्कुल अलग लग रहा था। कृष्ण ने बलराम को संकेत करके यह बताया। दोनों भाई चुपचाप उस बछड़े के पास पहुँचे।
बलराम स्वयं आगे बढ़कर उस बछड़े को काबू में करने के इच्छुक थे। वे हमेशा ध्यान रखते थे कि उनके भाई को कोई हानि न पहुँचे, और इसीलिए हर कठिनाई का सामना पहले खुद करने को तैयार रहते थे।
वत्सासुर का अंत
कृष्ण अब तक उस बछड़े की असलियत समझ गए थे और उसे सबक सिखाना चाहते थे। उन्होंने चुपचाप बछड़े के पीछे पहुँचकर उसके दोनों पिछले पैर पकड़ लिए। बछड़ा कुछ कर पाता, इससे पहले ही उन्होंने उसे जमीन से उठाकर सिर के बल एक पेड़ पर दे मारा। बछड़ा बने राक्षस की उसी क्षण मौत हो गई, और मरते ही वह अपने वास्तविक रूप में आ गया।
ग्वालों की खुशी और कृष्ण की सावधानी
उस दानव की मौत देखकर कृष्ण के साथ मौजूद गोपों ने राहत महसूस की। शोर मचाते हुए उन्होंने कृष्ण और बलराम को अपने कंधों पर उठा लिया।
कृष्ण और बलराम ने उनसे कहा कि मित्रों, इस घटना के बारे में गाँव में किसी को मत बताना, क्योंकि यदि बापू को पता चल गया तो वे उन्हें तुम लोगों के साथ गाएँ चराने नहीं आने देंगे। साथी ग्वालों ने तुरंत यह बात मान ली, क्योंकि कृष्ण और बलराम के बिना गाएँ चराने आना उन्हें भी मंजूर नहीं था।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि छल से रूप बदलने वाला भी सजग दृष्टि से बच नहीं पाता। झुंड में छिपा वत्सासुर अन्य बछड़ों जैसा दिखने का प्रयास कर रहा था, पर कृष्ण की पैनी नजर ने उसे तुरंत पहचान लिया। जीवन में भी सजगता और विवेक से कपटी को पहचाना जा सकता है।
दूसरी सीख भाई के स्नेह की है। बलराम हर संकट में सबसे पहले आगे बढ़कर अपने छोटे भाई की रक्षा के लिए तैयार रहते थे। सच्चा बड़ा भाई वही है जो छोटे के हिस्से का खतरा भी स्वयं उठाने को तत्पर हो।
तीसरी सीख मित्रता की है। ग्वाले साथियों ने कृष्ण और बलराम की बात बिना प्रश्न किए मान ली, क्योंकि उनके लिए उनका साथ ही सबसे प्रिय था। सच्चे मित्र एक-दूसरे का साथ निभाने के लिए हर बात पर विश्वास करते हैं।
कथा का सार
वत्सासुर के अंत के साथ कंस की एक और चाल विफल हो गई, पर उसकी खोज अभी जारी है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।