श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 7

तृणावर्त वध: चक्रवाती तूफान बने राक्षस का अंत

पूतना की मृत्यु के बाद कंस ने मायावी दानव तृणावर्त को भेजा, जो चक्रवाती तूफान बनकर बालकृष्ण को उड़ा ले गया। पर कृष्ण का भार बढ़ता गया और तृणावर्त धरती पर गिरकर मारा गया। पढ़ें पूरी कथा।

तृणावर्त वध: चक्रवाती तूफान बने राक्षस का अंत
तृणावर्त वध: चक्रवाती तूफान बने राक्षस का अंत — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

पूतना के मारे जाने के बाद कंस समझ गया कि उसका शत्रु गोकुल में ही है। इस बार उसने एक विशालकाय मायावी दानव तृणावर्त को भेजा, जो चक्रवाती तूफान का रूप धारण कर सकता था। पर जिसे वह मारने आया था, वही उसके अंत का कारण बना।

कंस का नया दानव तृणावर्त

पूतना के मारे जाने के बाद कंस समझ गया था कि उसके जीवन का शत्रु अवश्य गोकुल में ही है। इस बार उसने एक अन्य विशालकाय मायावी दानव तृणावर्त को बुला भेजा। कंस ने उससे कहा कि अब उसके परम शत्रु को मारने की जिम्मेदारी तृणावर्त की है और उसे मारकर ही वह लौटे।

तृणावर्त एक भयानक राक्षस था, जिसके पास भीषण चक्रवाती तूफान का रूप धारण करने की क्षमता थी। अपने मार्ग में आने वाली किसी भी वस्तु को वह तहस-नहस कर सकता था। कंस का आदेश पाते ही वह गोकुल की ओर चल पड़ा।

गोकुल में धूल का तूफान

उस समय यशोदा कृष्ण को गोद में लिटाए खिला रही थीं। कुछ देर खिलाने के बाद उन्होंने कृष्ण को जमीन पर बिठा दिया और स्वयं किसी घरेलू काम में लग गईं।

तभी तृणावर्त चक्रवाती तूफान का रूप लिए वहाँ आ पहुँचा। गोकुल धूल और अंधकार से घिर गया। इतनी धूल उड़ी कि एक हाथ की दूरी पर देखना भी कठिन हो गया। गोप-गोपियाँ हैरान थे कि गोकुल पर अचानक यह कैसी विपत्ति आ गई।

उधर यशोदा भागती हुई उस स्थान पर पहुँचीं जहाँ उन्होंने कृष्ण को बिठाया था, पर कृष्ण वहाँ नहीं थे। वे बहुत घबरा गईं और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें।

आकाश में बढ़ता भार

सर्वज्ञ श्रीकृष्ण तो वस्तुतः तृणावर्त की ही प्रतीक्षा कर रहे थे। वे स्वयं उस तूफान के साथ उड़ गए। मूर्ख तृणावर्त ने समझा कि उसने कृष्ण को अपने चंगुल में फँसा लिया है और वह उन्हें लेकर गोकुल से दूर चल पड़ा। वह कृष्ण को आकाश में बहुत ऊँचाई पर ले जाकर वहाँ से पटककर मार डालना चाहता था।

पर अपनी सारी ताकत लगाने के बाद भी वह कृष्ण को हवा में ऊपर नहीं ले जा सका और हैरान रह गया। बालकृष्ण हर क्षण भारी होते जा रहे थे।

तृणावर्त का अंत

शीघ्र ही कृष्ण का भार तृणावर्त की सहनशक्ति से बाहर हो गया। उनके वजन से दबा वह तेजी से भूमि की ओर गिरने लगा। उसने कृष्ण से खुद को छुड़ाने का पूरा जोर लगाया, पर सफल नहीं हुआ। कृष्ण उसके सिर पर हाथ मारते हुए खिलखिला रहे थे, और बालकृष्ण के वे हाथ तृणावर्त को हथौड़े की चोट जैसे लग रहे थे।

थोड़ी ही देर में वह पृथ्वी से जा टकराया। उसकी गर्दन टूट गई, हड्डियों के टुकड़े हो गए और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

शांत हुई वायु और यशोदा की चिंता

तृणावर्त के मरते ही वायु पूरी तरह शांत हो गई और लोग अपने घरों से बाहर आने लगे। यशोदा अपने प्यारे पुत्र को ढूँढ़ रही थीं। तभी लोगों की नजर कृष्ण पर पड़ी, जो एक विशाल राक्षस के शरीर के ऊपर खेल रहे थे। जब यशोदा को पता चला तो वे भागती हुई वहाँ पहुँचीं और कृष्ण को पूरी तरह सुरक्षित पाकर बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने कृष्ण को गोद में उठाकर उनका माथा चूमा।

वे मन में सोच रही थीं कि खतरे हमेशा उनके कृष्ण के सिर पर ही क्यों मंडराते रहते हैं, और उन्हें बेटे को लेकर चिंता होने लगी है। कोई ग्रामवासी यह नहीं समझ सका कि कृष्ण उस स्थान पर कैसे आ गए और उन्होंने विशालकाय राक्षस को कैसे मारा। पर अब तक वे इतना अवश्य समझ गए थे कि कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं हैं।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि अहंकार और बल के भरोसे चलने वाला व्यक्ति स्वयं अपने बोझ तले दब जाता है। तृणावर्त ने कृष्ण को हवा में उड़ाने का घमंड किया, पर उन्हीं के भार से वह धरती पर आ गिरा।

दूसरी सीख यह है कि अधर्म का मार्ग चुनने वाला बार-बार हारकर भी नहीं सुधरता। पूतना के अंत के बाद भी कंस ने नया दानव भेजा और उसे भी वही परिणाम मिला।

तीसरी सीख एक माँ की चिंता में है। यशोदा हर संकट के बाद अपने पुत्र को हृदय से लगाकर ईश्वर का धन्यवाद करती रहीं। सच्चा प्रेम और सजगता ही बच्चों की सबसे बड़ी सुरक्षा है।

कथा का सार

तृणावर्त का अंत देखकर गोकुलवासी यह समझने लगे कि कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।