श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 28

शंखचूड़ वध: गोपियों का हरण करने वाले कुबेर के सहयोगी का अंत

वन में कृष्ण की बाँसुरी पर गोपियाँ नृत्य कर रही थीं, तभी कुबेर के कुटिल सहयोगी शंखचूड़ ने कुछ गोपियों का हरण कर लिया। कृष्ण ने उसका पीछा करके उसे मार गिराया और उसके मस्तक की मणि बलराम को भेंट की। पढ़ें पूरी कथा।

शंखचूड़ वध: गोपियों का हरण करने वाले कुबेर के सहयोगी का अंत
शंखचूड़ वध: गोपियों का हरण करने वाले कुबेर के सहयोगी का अंत — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

एक रात वन में कृष्ण की बाँसुरी पर गोपियाँ नृत्य कर रही थीं, तभी कुबेर के कुटिल सहयोगी शंखचूड़ ने कुछ गोपियों का हरण कर लिया। पुकार सुनते ही कृष्ण और बलराम गोपियों की रक्षा के लिए आगे बढ़े।

वन में बाँसुरी की तान और गोपियों का नृत्य

एक रात बलराम और कृष्ण कुछ गोपियों के साथ वन में विचरण कर रहे थे। कृष्ण ने अपनी बाँसुरी बजानी शुरू की, जिसे सुनकर गोपियाँ नृत्य करने लगीं। बलराम भी स्वयं को बाँसुरी के सुर में सुर मिलाने से नहीं रोक सके। पशु-पक्षी भी उनके साथ गा रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वे भी बाँसुरी से सम्मोहित हो गए हों। उस संगीत और नृत्य की वजह से वन में बड़ा मनोरम वातावरण उपस्थित हो रहा था।

शंखचूड़ ने किया गोपियों का हरण

उसी समय कुबेर का शंखचूड़ नाम का एक कुटिल सहयोगी वहाँ भ्रमण कर रहा था। एक साथ इतनी सारी सुंदर कन्याओं को नृत्य करते देखकर उसका मन खिल उठा। उसकी इच्छा उन कन्याओं को अपना बना लेने की करने लगी। इसके पहले कि गोपियाँ कुछ समझ पातीं, शंखचूड़ ने कुछ गोपियों का हरण कर लिया। वे सभी सहायता के लिए कृष्ण को पुकारने लगीं। बलराम तुरंत एक विशाल वृक्ष उखाड़कर कृष्ण को देते हुए बोले, ‘‘कृष्ण, इस पेड़ से दुष्ट शंखचूड़ का मुकाबला करो।’’

कृष्ण ने किया शंखचूड़ का वध

कृष्ण ने उस पेड़ को हाथ में लेकर शंखचूड़ का पीछा किया। अब तो शंखचूड़ घबरा गया। गोपियों को वहीं छोड़कर वह अपने प्राण लेकर भागा। कृष्ण ने बलराम को गोपियों की देखरेख करने को कहा और स्वयं शंखचूड़ के पीछे दौड़े। कुछ ही आगे जाकर उन्होंने शंखचूड़ को काबू में कर लिया। शंखचूड़ ने कृष्ण की पकड़ से छूटने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। वे शंखचूड़ के मस्तक पर मौजूद मणि पर अधिकार करना चाहते थे। उनके एक ही प्रहार से शंखचूड़ का सिर उसके धड़ से अलग हो गया। उन्होंने उसके मस्तक से मणि निकालकर बलराम को भेंट की। गोपियाँ श्रीकृष्ण को बड़े प्रेम से निहार रही थीं। आखिर उन्हीं ने उनकी रक्षा की थी।

भक्ति से जुड़ा संदेश: पुकार सुनकर आते हैं भगवान

इस कथा में भक्ति का एक सुंदर भाव छिपा है। जैसे ही गोपियों ने सहायता के लिए कृष्ण को पुकारा, कृष्ण और बलराम तुरंत उनकी रक्षा के लिए तैयार हो गए। भक्त जब सच्चे मन से ईश्वर को पुकारता है, तो वे उसकी पुकार अनसुनी नहीं करते।

गोपियों का भरोसा केवल कृष्ण पर था, इसीलिए संकट के क्षण में भी उनके मुख से कृष्ण का ही नाम निकला। यही अनन्य भक्ति की पहचान है कि सुख में भी भगवान याद रहें और दुख में भी।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि संकट में ईश्वर को सच्चे मन से पुकारना चाहिए। गोपियों की पुकार सुनते ही कृष्ण और बलराम उनकी सहायता के लिए आगे बढ़ गए।

दूसरी सीख यह है कि दूसरों की सुंदरता या वस्तुओं पर बुरी नज़र रखने वाला अंत में अपना ही विनाश करता है। शंखचूड़ ने गोपियों को अपना बनाना चाहा, पर उसे अपने प्राण गँवाने पड़े।

तीसरी सीख यह है कि भाइयों और साथियों का आपसी सहयोग हर संकट में काम आता है। बलराम ने तुरंत वृक्ष उखाड़कर कृष्ण को दिया और फिर गोपियों की देखरेख का दायित्व भी सँभाला।

चौथी सीख यह है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली दिखे, ईश्वर के सामने वह टिक नहीं पाती। शंखचूड़ कृष्ण की पकड़ से छूटने का बहुत प्रयास करता रहा, पर सफल नहीं हो सका।

कथा का सार

शंखचूड़ के वध से कृष्ण ने एक बार फिर अपने भक्तों की रक्षा की और गोपियों के प्रेम को और दृढ़ किया। यह कथा सिखाती है कि सच्चे मन से पुकारने वाले की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।