श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 42

रुक्मिणी का कृष्ण प्रेम: रुक्मिणी का अटल संकल्प और ब्राह्मण सुनंद के हाथ भेजा संदेश

भीष्मक कृष्ण को अपना दामाद बनाना चाहते थे, पर रुक्मी ने शिशुपाल का नाम सुझाया। रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को ही जीवनसाथी मानने का संकल्प किया और ब्राह्मण सुनंद के हाथ कृष्ण को संदेश भेजने का निश्चय किया। पढ़ें पूरी कथा।

रुक्मिणी का कृष्ण प्रेम: रुक्मिणी का अटल संकल्प और ब्राह्मण सुनंद के हाथ भेजा संदेश
रुक्मिणी का कृष्ण प्रेम: रुक्मिणी का अटल संकल्प और ब्राह्मण सुनंद के हाथ भेजा संदेश — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

विदर्भ के राजा भीष्मक कृष्ण को अपना दामाद बनाना चाहते थे, पर रुक्मी शिशुपाल से रुक्मिणी का विवाह कराना चाहता था। रुक्मिणी ने उपवन में यह वार्तालाप सुन लिया और श्रीकृष्ण को ही अपना जीवनसाथी मानते हुए ब्राह्मण सुनंद के हाथ उन्हें संदेश भेजने का निर्णय किया।

कृष्ण और बलराम का संवाद: विदर्भ की राजकुमारी

कृष्ण के जासूसों ने उन तक सारी सूचना पहुँचा दी थी। जब बलराम कृष्ण के पास जरासंध के अगले आक्रमण के विषय में चर्चा करने आए तो कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले, ‘‘उसके विषय में चिंता नहीं कीजिए, भैया। हमारे जासूसों ने सूचना दी है कि जरासंध ने कुछ दिन शांत रहने का निर्णय किया है।’’ यह समाचार सुनकर बलराम के मुखमंडल पर प्रसन्नता के भाव आ गए। फिर कृष्ण के साथ थोड़ा मजाक करने के भाव से वे बोले, ‘‘अब तुम्हारे पास विदर्भ की उस सुंदर राजकुमारी के सपने देखने के लिए पर्याप्त समय है। उसकी सुंदरता के चर्चे तो दूर-दूर तक हैं।’’

बलराम की बात सुनकर कृष्ण थोड़े गम्भीर हो गए। फिर वे बलराम से बोले, ‘‘दाऊ, मैं उससे हर हालत में विवाह करना चाहता हूँ, लेकिन वह राजा भीष्मक की पुत्री है, जो जरासंध के अधीन हैं। उसका भाई रुक्मी जरासंध का घनिष्ठ मित्र है।’’ यह सुनकर बलराम कृष्ण को सांत्वना देते हुए बोले, ‘‘कृष्ण, तुम चिंता मत करो, मैंने सुना है कि राजा भीष्मक और उनकी रानी तुम्हें ही अपना दामाद बनाना चाहते हैं।’’ बलराम की बात सुनकर कृष्ण शांत रहे। बलराम उनका कंधा थपथपाकर बाहर निकल गए।

उपवन में रुक्मिणी का संकल्प

एक दिन की बात है। राजकुमारी रुक्मिणी उपवन में बैठी हुई कृष्ण के बारे में सोच रही थी, ‘जरासंध जैसा शक्तिशाली नरेश भी मेरे श्रीकृष्ण का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मैं सिर्फ उन्हें ही अपने पति के रूप में चाहती हूँ।’ तभी उसने देखा कि उसके पिता भीष्मक और रुक्मी उसी ओर टहलते हुए आ रहे हैं। वे उसके विवाह के विषय में ही चर्चा कर रहे थे। रुक्मिणी एक वृक्ष के पीछे छिपकर उनकी बातचीत सुनने लगी।

भीष्मक और रुक्मी का विवाद: शिशुपाल का प्रस्ताव

‘‘रुक्मी,’’ राजा भीष्मक ने कहा, ‘‘तुम्हारी माँ और मैंने रुक्मिणी का हाथ कृष्ण के हाथों में देने का निर्णय लिया है।’’ यह सुनकर रुक्मी सन्न रह गया। वह इस निर्णय का कड़ा विरोध करते हुए बोला, ‘‘पिताजी, आप ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं? कृष्ण ने मेरे प्रिय मित्र और सम्राट जरासंध के दामाद कंस को मारा है। फिर हम सम्राट जरासंध को क्रोधित करने का जोखिम भी नहीं उठा सकते। यदि हमने ऐसा किया तो महाराज जरासंध इस शत्रुतापूर्ण कार्य के लिए हमें अवश्य दंड देंगे।’’

‘‘लेकिन रुक्मी, हमारी दृष्टि में रुक्मिणी के लिए कृष्ण से अच्छा वर नहीं है। फिर जरासंध एक बार भी कृष्ण को पराजित करने में सफल नहीं हो सके हैं।’’ राजा भीष्मक बोले।

‘‘पिताजी, ये तो मात्र समय की बात है,’’ रुक्मी हँसते हुए बोला, ‘‘महाराज जरासंध यादवों को समाप्त करने के लिए एक शक्तिशाली सेना तैयार कर रहे हैं। अगले युद्ध में उनकी विजय निश्चित है। कृष्ण को उसके अपराधों का दंड मिलने में अब अधिक समय नहीं लगेगा।’’

‘‘तो रुक्मी, तुम्हारा सुझाव क्या है? तुम्हारे विचार से तुम्हारी बहन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त वर कौन है?’’ राजा भीष्मक ने पूछा।

‘‘पिताजी, मेरा मित्र शिशुपाल रुक्मिणी के लिये सर्वाधिक उपयुक्त है। वह चेदि राज्य का युवराज है भी।’’ रुक्मी ने कहा।

रुक्मिणी का दृढ़ निश्चय और विवाह के अधिकार रुक्मी को

अपने भाई रुक्मी की यह बात सुनकर रुक्मिणी को बहुत क्रोध आया। वह बुदबुदाती हुई बोली, ‘‘मैं उस सियार से कभी विवाह नहीं करूँगी। यदि मेरे माता-पिता मुझे विवश करेंगे, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। मैंने श्रीकृष्ण को अपना जीवनसाथी स्वीकार कर लिया है। अब यदि कोई मेरा सर्वस्व बनेगा तो वह श्रीकृष्ण ही होंगे।’’

राजा भीष्मक ने रुक्मिणी के विवाह से सम्बंधित सारे अधिकार रुक्मी को ही दे दिए। अब रुक्मी किसी ऐसे व्यक्ति से भी अपनी बहन का विवाह कर सकता था, जिससे उसके माता-पिता सहमत न हों। इस वार्तालाप के बाद राजा भीष्मक और रुक्मी उपवन से चले गए। उन्हें पता नहीं चला कि रुक्मिणी ने उनका सारा वार्तालाप सुन लिया है। रुक्मिणी उनकी बातें सुनकर बहुत चिंतित हो गई थी।

ब्राह्मण सुनंद को बुलाया और श्रीकृष्ण को संदेश भेजने का निर्णय

महल में लौटकर उसने सुनंद को बुला भेजा। सुनंद एक ब्राह्मण था जो रुक्मिणी से अपनी पुत्री के समान स्नेह करता था। जब सुनंद रुक्मिणी के पास आया तो उसे पूरी बात बताते हुए रुक्मिणी ने उससे पूछा, ‘‘हे ज्ञानी ब्राह्मण देवता, मुझे यह बताइए कि श्रीकृष्ण को मेरी ओर से गुप्त संदेश भेजना क्या उचित होगा?’’

इस पर सुनंद ने कहा, ‘‘रुक्मिणी, उचित यही है कि तुम उसी से विवाह करो जिससे तुम्हारा हृदय जुड़ गया है। यदि तुम शिशुपाल से प्रेम नहीं करती हो तो तुम्हें उससे कदापि विवाह नहीं करना चाहिए। फिर तुम्हारे माता-पिता भी तुम्हारा हाथ कृष्ण के हाथों में ही देना चाहते थे। ऐसी स्थिति में कृष्ण को पत्र भेजना मेरे विचार से कदापि अनुचित नहीं है।’’

‘‘ब्राह्मण देवता, क्या आप मेरा संदेश लेकर मेरे हृदय के अधिराज श्रीकृष्ण के पास जाएँगे?’’ रुक्मिणी ने सुनंद को आशा भरी निगाहों से देखते हुए पूछा।

‘‘बिल्कुल जाऊँगा, बेटी। मैं तो तुम्हें अपनी पुत्री के समान मानता हूँ। तुम्हारा संदेश लेकर वर के पास जाना तो मेरे लिए प्रसन्नता की बात होगी।’’

श्रीकृष्ण उस समय तक द्वारका नगरी में बस चुके थे।

भक्ति से जुड़ा संदेश: अनन्य प्रेम और ईश्वर को समर्पित जीवन

इस कथा में रुक्मिणी की अनन्य भक्ति का सुंदर रूप दिखता है। जब उसके सामने शिशुपाल का प्रस्ताव आया, तब उसने साफ कहा कि उसने श्रीकृष्ण को अपना जीवनसाथी स्वीकार कर लिया है और अब कोई और उसका सर्वस्व नहीं बन सकता। भक्ति का सार यही है कि भक्त का मन एक ही ईश्वर में स्थिर रहे।

रुक्मिणी ने अपनी बात ऐसे व्यक्ति के सामने रखी जिस पर उसे विश्वास था। भक्ति में भी सच्चे मार्गदर्शक का साथ मिलना बड़ा सौभाग्य है। ब्राह्मण सुनंद ने भी निःस्वार्थ भाव से सहायता का वचन दिया, और भक्त का संदेश भगवान तक पहुँचाने को प्रसन्नता की बात माना। यह भक्ति और सेवा के सुंदर संबंध का उदाहरण है।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि जीवन के बड़े निर्णयों में अपने हृदय और विवेक की आवाज़ को महत्व देना चाहिए। रुक्मिणी ने जिसे अपना जीवनसाथी स्वीकार कर लिया, उस निश्चय पर वह अडिग रही।

दूसरी सीख यह है कि जो ईश्वर की शरण में है, उसे किसी शक्तिशाली से डरने की आवश्यकता नहीं। रुक्मिणी को विश्वास था कि जरासंध जैसा शक्तिशाली नरेश भी श्रीकृष्ण का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

तीसरी सीख यह है कि भय और स्वार्थ के कारण सही निर्णय ठुकराने वाला स्वयं बड़ी भूल करता है। रुक्मी ने जरासंध के भय से कृष्ण के प्रस्ताव को अस्वीकार किया, जबकि माता-पिता की दृष्टि में कृष्ण से अच्छा वर नहीं था।

चौथी सीख यह है कि अच्छे और निःस्वार्थ सलाहकार का साथ जीवन की कठिन घड़ी में बड़ा सहारा देता है। सुनंद ने रुक्मिणी को उचित सलाह दी और संदेश ले जाने का वचन दिया।

कथा का सार

रुक्मिणी के हृदय में बसे श्रीकृष्ण के प्रति उसके अटल प्रेम ने उसे सुनंद के हाथ संदेश भेजने के लिए प्रेरित किया। यह कथा सिखाती है कि भक्त का मन जब एक ही ईश्वर में टिक जाता है, तो उसे भगवान तक पहुँचने का मार्ग मिल ही जाता है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।