श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 10
रस्सी की कहानी: यशोदा ने कृष्ण को ऊखल से क्यों बाँधा
त्योहार की तैयारी के बीच कृष्ण ने माखन के सारे बर्तन तोड़ दिए तो यशोदा उन्हें ऊखल से बाँधने लगीं। पर रस्सी हर बार दो इंच छोटी पड़ गई। पढ़ें पूरी कथा।

गोकुल में त्योहार की तैयारियाँ चल रही थीं और हर कोई इतना व्यस्त था कि बच्चों की देखभाल का समय भी नहीं निकाल पा रहा था। इसी हलचल के बीच कृष्ण ने ऐसी शरारत की कि यशोदा को उन्हें बाँधने का निर्णय लेना पड़ा, पर जगत के कर्णधार को बाँधना क्या इतना आसान था?
त्योहार की तैयारी और यशोदा की व्यस्तता
एक दिन गोकुल में कोई त्योहार मनाया जाना था। सारे गाँववाले घरों की सफाई में जुटे थे। उसके बाद उन्हें घरों को झंडियों और बंधनवारों से सजाना था, दही मथकर मक्खन निकालना था और पकवान बनाने थे। लोग इतने व्यस्त थे कि बच्चों की देखभाल के लिए भी समय नहीं निकाल पा रहे थे।
यशोदा भी तैयारी में लगी थीं। आखिर वे गाँव के मुखिया की पत्नी थीं, इसलिए उनकी व्यस्तता और भी ज्यादा थी। उन्होंने दूध उबलने के लिए चूल्हे पर रखा और दही मथने बैठ गईं। दही काफी था और वे बड़ी मथानी इस्तेमाल कर रही थीं, जिसमें उन्होंने एक बड़ी रस्सी बाँध रखी थी। रस्सी के दोनों सिरे बारी-बारी से खींचते हुए वे कृष्ण और उनकी शैतानियों के बारे में एक गीत गा रही थीं।
कृष्ण की भूख और रूठना
उसी समय कृष्ण भागते हुए बाहर से आए और बोले कि माँ, उन्हें बहुत तेज भूख लगी है और कुछ खाने को दो। यशोदा ने उन्हें गोद में बैठाकर सिर सहलाते हुए मक्खन खिलाना शुरू किया। तभी उन्हें चूल्हे पर रखे दूध की याद आई। उन्होंने तुरंत कृष्ण को जमीन पर बैठाया और रसोई की ओर भागीं।
माँ के इतनी जल्दी जमीन पर बैठा देने से कृष्ण रुष्ट हो गए। गुस्से में उन्होंने उस घड़े पर लात जमा दी जिसमें यशोदा दही मथ रही थीं। फिर उन्होंने मक्खन से भरे सारे बर्तन तोड़ डाले। उन्होंने भरपेट दही और मक्खन खाया और जो बचा, उससे बंदरों का पेट भरा।
यशोदा का क्रोध और कृष्ण की पकड़
लौटने पर यशोदा आँगन की हालत देखकर दंग रह गईं। सारे घड़े टूटे थे और दूध-दही चारों ओर बिखरा था, मानो बंदरों की टोली ने खूब उत्पात मचाया हो। पर यशोदा जानती थीं कि यह कृष्ण का काम है। उन्हें बड़ा क्रोध आया।
डंडा उठाकर वे कृष्ण के पीछे दौड़ीं और बोलीं कि इतना सारा दही-मक्खन उन्होंने यूँ ही बर्बाद कर दिया, जबकि उन्होंने कितनी मेहनत से मक्खन बनाया था। अब वे समझ गई हैं कि गोपियों की सारी शिकायतें सही थीं, और आज वे उन्हें नहीं छोड़ेंगी।
जगदीश्वर श्रीकृष्ण बाललीला करते हुए उनके आगे-आगे भाग रहे थे। भला जगत के कर्णधार को कौन पकड़ सकता था? पर जब कृष्ण ने देखा कि माँ बहुत थक गई हैं, तो उन्होंने खुद को पकड़वा दिया।
यशोदा का ममता भरा निर्णय
कृष्ण के हाथ पकड़कर यशोदा ने उन्हें पीटने के लिए डंडा उठाया, पर उनके भोले चेहरे और मक्खन से सने मुख को देखकर हाथ नीचे नहीं आया। वे बैठ गईं और कृष्ण को बाँहों में भरकर बोलीं कि वे उनके साथ क्या करें, उन्हें तो पीट भी नहीं सकतीं। उन्होंने पूछा कि वे इतने नटखट क्यों हैं और उन्हें इतना क्यों सताते हैं।
फिर यशोदा ने तय किया कि जब तक वे अपना काम पूरा नहीं कर लेतीं, तब तक कृष्ण को बाँधकर रखेंगी।
दो इंच छोटी रस्सी
वे कृष्ण के हाथ पकड़कर उन्हें आँगन में पड़े ऊखल तक ले गईं और पास पड़ी रस्सी से उन्हें ऊखल से बाँधने लगीं। पर रस्सी दो इंच छोटी पड़ गई। यशोदा दूसरी रस्सी ले आईं और पहली से बाँधकर उसे लंबा किया, पर इस बार भी वह दो इंच छोटी निकली। वे फिर एक कमरे से और रस्सी लाईं और उसे भी जोड़ा, पर तब भी रस्सी दो इंच छोटी रही।
अब वे पड़ोसी के घर से बहुत सी रस्सियाँ ले आईं और सबको आपस में बाँधकर एक काफी बड़ी रस्सी बना ली। पर वह भी दो इंच छोटी पड़ गई। हैरानी के मारे यशोदा का बुरा हाल था और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि रस्सी बार-बार छोटी क्यों पड़ रही है। निराश होकर उन्होंने कृष्ण से पूछा कि वे उन्हें क्यों सता रहे हैं और इसमें उन्हें क्या आनंद आ रहा है।
कृष्ण का बँध जाना और अगली शरारत
कृष्ण ने अनुभव किया कि माँ बहुत परेशान हो गई हैं, इसलिए उन्होंने खुद को रस्सी से बँध जाने दिया। तब यशोदा ने राहत की साँस लेकर कहा कि अब वे कोई शैतानी नहीं कर पाएँगे, और यदि वे उपद्रव न मचाते तो उन्हें इस तरह बँधना भी न पड़ता।
कृष्ण को ऊखल से बँधा छोड़कर यशोदा घर के अंदर चली गईं। वे सोच रही थीं कि बँधे होने के कारण कृष्ण कोई शैतानी नहीं कर पाएँगे। पर जो शैतानी न करें, वे कृष्ण कैसे! उन्होंने सोचा कि वे बलराम भैया के पास जाएँगे, जो उनके हाथ खोल देंगे। यह सोचकर कृष्ण भारी ऊखल को अपनी पीठ पर लादे चल पड़े।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि प्रेम के बंधन में ही ईश्वर बँधते हैं। जगत को अपनी माया में बाँधने वाले कृष्ण को कोई रस्सी नहीं बाँध सकी, पर जब उन्होंने माँ की परेशानी देखी, तो उन्होंने स्वयं को बँध जाने दिया।
दूसरी सीख यशोदा की ममता में है। क्रोध में डंडा उठाकर भी वे अपने पुत्र के भोले चेहरे के आगे हार गईं। माँ का क्रोध भी प्रेम का ही एक रूप है।
तीसरी सीख यह है कि अपने प्रयास में हार न मानना अच्छा है, पर यह भी समझना चाहिए कि कुछ बातें हमारे सामर्थ्य से परे हैं। यशोदा ने एक के बाद एक रस्सियाँ जोड़ीं, पर अंत में कृपा से ही कार्य पूरा हुआ।
कथा का सार
रस्सी की यह कथा दिखाती है कि ईश्वर को बाँधने वाली रस्सी केवल प्रेम की होती है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।