श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 6
पूतना वध: गोपी के वेश में आई राक्षसी का अंत
कंस के आदेश पर शिशुओं का वध करती पूतना गोपी का रूप धरकर गोकुल पहुँची और विषैला दूध पिलाकर बालकृष्ण को मारना चाहा, पर कृष्ण ने उसके प्राण ही खींच लिए। पढ़ें पूरी कथा।

मथुरा की भयानक राक्षसी पूतना ने श्रावण माह में जन्मे सभी शिशुओं के वध का बीड़ा उठाया था। करीब एक दर्जन शिशुओं की हत्या के बाद वह गोपी का रूप धरकर गोकुल पहुँची, पर उसे क्या पता था कि जिस शिशु को वह मारने आई है, वह स्वयं जगत के पालनहार हैं।
पूतना का आतंक और गोकुल की चिंता
मथुरा में पूतना नाम की एक भयानक और क्रूर राक्षसी ने श्रावण माह में राज्य में जन्मे सभी शिशुओं का अंत करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली थी। उसके नृशंस कृत्यों के समाचार गोकुल तक भी पहुँच रहे थे।
गोकुलवासियों ने तय किया कि नंद के घर पुत्र जन्म की बात वे किसी को नहीं बताएँगे, क्योंकि वे अपने दुलारे कृष्ण को कोई हानि नहीं होने देना चाहते थे। लेकिन पूतना बहुत सी मायावी शक्तियों की स्वामिनी थी और अपनी शक्तियों से हर आवश्यक जानकारी प्राप्त कर लेती थी।
गोपी के वेश में गोकुल पहुँची पूतना
करीब एक दर्जन शिशुओं की हत्या के बाद पूतना कृष्ण को मारने के इरादे से गोकुल पहुँची। अपनी माया से उसने एक गोपी का रूप धारण कर लिया और गलियों में घूमने लगी। किसी ने उसे नहीं टोका, क्योंकि सब उसे गोपी ही समझ रहे थे। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि गोपी के वेश में एक भयानक राक्षसी उनके गाँव में आ गई है।
गोपी बनी पूतना नंद के घर के सामने पहुँची। उस समय यशोदा कृष्ण को गोद में लिटाए घर के बाहर चबूतरे पर बैठी थीं। पूतना उनके पास खड़ी होकर कृष्ण की सुंदरता की प्रशंसा करने लगी, और यशोदा उसे गाँव की ही कोई गोपी समझकर उससे बातें करती रहीं।
विषैला दूध और कृष्ण की लीला
शीघ्र ही पूतना ने यशोदा का विश्वास जीत लिया। जब उसने कृष्ण को गोद में खिलाने की अनुमति माँगी, तो यशोदा ने निःसंकोच उसे कृष्ण थमा दिए। तभी यशोदा को कोई काम याद आया और वे थोड़ी देर में लौटने की बात कहकर घर के अंदर चली गईं।
पूतना तो ऐसे ही क्षण की प्रतीक्षा में थी। वह शिशु को लेकर एक कोने में पहुँची और अपने विष भरे स्तनों का पान कराकर उसे मारने लगी। बेचारी पूतना क्या जानती थी कि शिशु के रूप में स्वयं जगत के पालनहार भगवान विष्णु उसके सामने हैं।
कृष्ण दूध के स्थान पर पूतना का रक्तपान करने लगे। पूतना ने उन्हें अपने शरीर से अलग करने की कोशिश की, पर सफल नहीं हो सकी। भय और पीड़ा से चीत्कार करती हुई वह अपने साथी दानवों को सहायता के लिए पुकारने लगी। उसे लग रहा था जैसे उसके स्तनों से होकर उसके प्राण ही निकल रहे हों। थोड़ी ही देर में चीखती हुई पूतना वहीं गिर पड़ी और उसने प्राण त्याग दिए। मृत्यु के समय वह अपना मायावी रूप छोड़कर अपने वास्तविक रूप में आ गई।
यशोदा का भय और बालकृष्ण की मुस्कान
पूतना की चीखें सुनकर यशोदा और अन्य गोपियाँ भागती हुई वहाँ पहुँचीं। जो दृश्य उन्होंने देखा, उस पर किसी को सहसा विश्वास नहीं हुआ। एक विशाल भयावह राक्षसी जमीन पर मृत पड़ी थी और बालकृष्ण उसके सीने पर बैठे खेल रहे थे।
भय से चीखती हुई यशोदा उसी ओर दौड़ीं, झपटकर कृष्ण को उठा लिया और देखने लगीं कि उन्हें कोई चोट तो नहीं आई। उस ममतामयी माँ को भला कौन समझाता कि जो जगदीश्वर पूरे विश्व को चोटों से बचाते हैं, उन्हें स्वयं चोट नहीं आ सकती! जब यशोदा ने कृष्ण को पूरी तरह स्वस्थ देखा तो वे हृदय से भगवान को धन्यवाद देने लगीं।
पूतना की मृत्यु की खबर और दहन संस्कार
जंगल की आग की तरह पूतना की मौत की खबर दूर-दूर तक फैल गई। आसपास के गाँवों से लोग मृत राक्षसी को देखने आने लगे। लेकिन गोकुल आकर जब उन्हें पता चलता कि उसे एक शिशु ने मारा है, तो वे उस शिशु के दर्शन के लिए व्यग्र हो उठते। जब कंस को पूतना की मौत का पता चला तो उसे गहरा आघात पहुँचा।
उधर गोकुल के लोगों ने पूरे रीति-रिवाज के साथ पूतना के शरीर का दहन संस्कार किया। जब उसका शरीर जल रहा था, तब पूरे गोकुल में सुगंध फैल गई थी, क्योंकि भगवान का स्पर्श पाकर पूतना का बदन पवित्र हो गया था।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि छल और कपट से किया गया पाप अंततः अपने ही विनाश का कारण बनता है। पूतना ने गोपी का रूप धरकर विश्वास जीता, पर वही छल उसके अंत का कारण बना।
दूसरी सीख यह है कि हर मीठी बात और सुंदर रूप पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। यशोदा ने सहज भाव से शिशु सौंप दिया, पर ईश्वर की कृपा ने ही बालक की रक्षा की।
तीसरी बात यह कि जो व्यक्ति ईश्वर के हाथों मारा जाता है, उसे भी उनका स्पर्श पाकर पवित्रता मिलती है। भगवान की लीला में दंड भी कृपा का ही एक रूप है।
कथा का सार
पूतना वध श्रीकृष्ण की पहली बड़ी बाल-लीला है, जिसने कंस के मन में भय और गहरा कर दिया। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।