श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 23

प्रलम्ब वध: बलराम का अपहरण करने आए राक्षस का अंत

कंस ने दोनों भाइयों को अलग करने के लिए प्रलम्ब को बलराम का हरण करने भेजा। प्रलम्ब गोप बनकर खेल में शामिल हुआ और बलराम को कंधे पर बिठाकर भागा, पर बलराम ने अपने घूँसे से उसका सिर फोड़ डाला। पढ़ें पूरी कथा।

प्रलम्ब वध: बलराम का अपहरण करने आए राक्षस का अंत
प्रलम्ब वध: बलराम का अपहरण करने आए राक्षस का अंत — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

कृष्ण और बलराम के कारनामे समय-समय पर कंस के कानों तक पहुँचते रहते थे और वह समझ नहीं पा रहा था कि इन दोनों भाइयों को कैसे समाप्त करे। तब उसके मन में एक नई चाल आई: दोनों को अलग कर दिया जाए, तो कृष्ण की ताकत आधी रह जाएगी।

कंस की चाल: दोनों भाइयों को अलग करना

कृष्ण और बलराम के कारनामे समय-समय पर कंस के कानों तक पहुँचते रहते थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उन दोनों भाइयों को कैसे समाप्त करे। एक दिन उसने सोचा कि उसे दोनों को अलग-अलग कर देना चाहिए, इस तरह कृष्ण की ताकत आधी रह जाएगी और उसके राक्षसों को उसे खत्म करने में आसानी होगी।

यह सोचकर उसने प्रलम्ब नाम के एक शक्तिशाली राक्षस को बुलाया और आदेश दिया कि वह वृंदावन जाकर बलराम का हरण कर ले, जिससे कृष्ण की ताकत आधी रह जाए और वे उसे आसानी से मार सकें।

गोप बनकर आया प्रलम्ब और कृष्ण का नया खेल

जब प्रलम्ब वृंदावन पहुँचा तो उसने गोपों को खेलते पाया। उसने स्वयं भी एक गोप का रूप धारण कर लिया और दूसरे गोपों के साथ घुल-मिल गया। लेकिन कृष्ण की नजरों से यह सब भला कैसे छुप सकता था?

उन्होंने गोपों को इकट्ठा करके कहा कि पुराने खेल खेलते हुए अब ऊब होने लगी है, वे एक नया खेल बताते हैं। गोप नया खेल जानने के लिए उत्सुक हो उठे। कृष्ण ने कहा कि वे दो दल बनाएँगे और प्रत्येक दल का एक नेता होगा। कृष्ण पहले दल के नेता बने और दूसरे दल का नेतृत्व बलराम ने संभाला। फिर कृष्ण ने कहा कि हारने वाले दल के गोपों को जीतने वाले गोपों को अपने कंधों पर बैठाकर थोड़ी दूर दौड़ना होगा।

खेल में हार और प्रलम्ब की माँग

प्रलम्ब जानबूझकर कृष्ण वाले दल में शामिल हो गया। पहली बार का खेल कृष्ण का दल जीत गया और बलराम के दल के सदस्य कृष्ण के दल के सदस्यों को कंधों पर उठाकर थोड़ी देर दौड़े। प्रलम्ब को अपने दल की जीत की कोई खुशी नहीं थी, वह तो अपने दल के हारने की प्रतीक्षा कर रहा था।

दूसरी बार का खेल कृष्ण का दल हार गया। प्रलम्ब ने कृष्ण से कहा कि मित्र, वह बलराम भैया को अपने कंधों पर बिठाना चाहता है, वह देखना चाहता है कि बलराम भैया कितने भारी हैं। कृष्ण ने गोप बने प्रलम्ब को अनुमति दे दी। वे मन ही मन हँस रहे थे, क्योंकि प्रलम्ब की असलियत वे समझ चुके थे। जैसे ही बलराम प्रलम्ब के कंधों पर बैठे, वह मथुरा की ओर भाग निकला।

बलराम का बढ़ता भार

बलराम को मथुरा की ओर ले जाए जाते देखकर सभी गोप घबरा गए और उनकी कुशलता की चिंता करने लगे। कृष्ण ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि वे बलराम भैया की बिल्कुल चिंता न करें, उनका बलपूर्वक अपहरण करना इस पृथ्वी पर किसी के लिए भी असंभव है, और बलराम भैया से अधिक शक्तिशाली कोई नहीं है।

उधर बलराम को भी प्रलम्ब पर संदेह हो गया था, इसलिए उन्होंने अपना भार बढ़ा दिया था। प्रलम्ब के लिए उन्हें उठाकर दौड़ना मुश्किल हो गया। वह सोच रहा था कि यह छोटा सा बालक इतना भारी कैसे हो गया।

प्रलम्ब का वास्तविक रूप और अंत

जब प्रलम्ब के लिए बलराम को ले जाना असंभव हो गया, तो उसने उन्हें समाप्त करने का निर्णय कर लिया। बिना एक क्षण गँवाए वह अपने वास्तविक भयानक रूप में आ गया। पर्वताकार प्रलम्ब के कंधों पर बैठे बलराम ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे काले बादलों के बीच चंद्रमा हो।

फिर प्रलम्ब सहसा आकाश की ओर उछला और आकाशमार्ग से ही तीव्र गति से मथुरा की ओर बढ़ चला। बलराम गरजकर बोले कि दुष्ट राक्षस, मुझे कहाँ ले जा रहा है, वापस पृथ्वी पर चल! पर प्रलम्ब ने कोई उत्तर नहीं दिया। यह देखकर बलराम का शरीर क्रोध से जल उठा और उन्होंने कसकर प्रलम्ब के सिर पर अपने घूँसे का प्रहार किया।

प्रलम्ब को बलराम की मुष्टिका वज्र के समान लगी। उसका सिर फट गया और वह मृत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

बलराम का स्वागत

बलराम उसके शरीर से नीचे उतर आए। उस समय तक अन्य गोप भी वहाँ एकत्र हो गए थे। सभी लोग बलराम को प्रलम्ब वध पर बधाई देने लगे। कृष्ण ने अपने बलशाली और साहसी भाई को गले लगा लिया।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि अपने भाई या साथी पर पूरा विश्वास रखना चाहिए। बलराम को ले जाते देखकर गोप घबरा गए, पर कृष्ण निश्चिंत रहे, क्योंकि उन्हें पता था कि बलराम से अधिक शक्तिशाली इस पृथ्वी पर कोई नहीं है।

दूसरी सीख यह है कि छल से रूप बदलने वाला भी सजग दृष्टि से बच नहीं पाता। प्रलम्ब गोप बनकर खेल में घुल-मिल गया था, पर कृष्ण ने उसकी असलियत पहले ही भाँप ली थी और बलराम को भी जल्दी ही संदेह हो गया।

तीसरी सीख यह है कि अपनी चाल से दूसरों को बाँटने की कोशिश करने वाला स्वयं ही हार जाता है। कंस दोनों भाइयों को अलग करना चाहता था, पर इसका परिणाम उसके एक और राक्षस के अंत के रूप में निकला।

कथा का सार

प्रलम्ब के वध के साथ कंस की दोनों भाइयों को अलग करने की चाल विफल हो गई और कृष्ण-बलराम का साथ और मजबूत हुआ। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।