श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 12
फलों की टोकरी: बालकृष्ण और फलवाली की कथा
बालकृष्ण ने मुट्ठी भर चावल देकर एक फलवाली से फल माँगे। स्नेह से भरी स्त्री ने उन्हें फल दे दिए, और कृष्ण के स्पर्श से उसकी टोकरी हीरे-जवाहरातों से भर गई। पढ़ें पूरी कथा।

एक दोपहर गोकुल में नंद के आँगन के बाहर एक फलवाली आवाज लगा रही थी। आँगन में खेल रहे नन्हे कृष्ण ने उसे देखा और अपनी छोटी-छोटी मुट्ठियों में चावल भरकर उसके पास पहुँच गए। उस दिन उस फलवाली की टोकरी में जो हुआ, वह उसके जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार बन गया।
आँगन में फलवाली की पुकार
एक दोपहर कृष्ण अपने घर के आँगन में खेल रहे थे। तभी उन्होंने फल बेच रही एक स्त्री को देखा, जो चिल्ला रही थी कि फल ले लो, बिल्कुल ताजे फल हैं।
कृष्ण भागते हुए घर के अंदर गए और मुट्ठी भर चावल लेकर बाहर निकले। अपनी छोटी-छोटी मुट्ठियों में वे चावल संभाल नहीं पा रहे थे और अधिकतर दाने बाहर गिर रहे थे। फलवाली यह सब देख रही थी।
चावल के बदले फल
कृष्ण उसके पास पहुँचकर बोले कि ये चावल ले लो और बदले में उन्हें कुछ फल दे दो, क्योंकि उन्हें फल खाना बहुत पसंद है।
कृष्ण की मनमोहिनी सूरत और मधुर आवाज सुनकर वह महिला मुग्ध हो गई। उस प्यारे बालक के प्रति उसके मन में स्नेह उमड़ आया। उसने कहा कि उसे चावल नहीं चाहिए, वह उन्हें कुछ फल वैसे ही दे रही है और वे उन्हें खा लें। यह कहकर उसने कृष्ण को कुछ फल दे दिए।
कृष्ण का स्पर्श
जब फलवाली की नजर कृष्ण पर नहीं थी, तब कृष्ण ने हाथ बढ़ाकर टोकरी का स्पर्श कर लिया था। इस बात से बेखबर फलवाली अपनी टोकरी उठाकर घर की ओर चल पड़ी। पूरे रास्ते कृष्ण का ही चेहरा उसकी आँखों के सामने छाया रहा।
टोकरी में हीरे-मोती
घर पहुँचकर फलवाली ने टोकरी जमीन पर रखी। जैसे ही उसकी नजर उसके अंदर पड़ी, वह आश्चर्य से उछल पड़ी। टोकरी हीरे, मोतियों और जवाहरातों से भरी हुई थी। उसे समझ ही नहीं आया कि इतने सारे कीमती पत्थर उसकी टोकरी में कैसे आ गए।
बाद में उसने इसे ईश्वर का चमत्कार मानते हुए मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया। भगवान श्रीकृष्ण के स्पर्श के कारण ही उसकी टोकरी के फल मूल्यवान पत्थर बन गए थे। अच्छे लोगों के प्रति श्रीकृष्ण के प्रेम का यह एक उदाहरण था।
गोकुल की अनोखी घटनाएँ
गोकुल में ऐसी अनोखी घटनाएँ घटना अब एक आम बात हो गई थी। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता था जब कोई असामान्य घटना न घटती हो।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि निस्वार्थ स्नेह का फल सदा मिलता है। फलवाली ने बदले में कुछ पाने की इच्छा के बिना बालक को फल दे दिए, और ईश्वर ने उसे कई गुना लौटा दिया।
दूसरी सीख यह है कि भगवान भाव के भूखे हैं। कृष्ण के हाथ में चावल के दाने बहुत थोड़े थे, पर उनमें जो प्रेम था, उसी ने सारा चमत्कार रचा।
तीसरी सीख यह है कि अच्छे लोगों के प्रति ईश्वर का प्रेम सदा बना रहता है, और उनकी कृपा हमारे जीवन में कभी-कभी बिना बताए ही उतर आती है।
कथा का सार
फलों की टोकरी की यह कथा गोकुल में कृष्ण की उन अनोखी घटनाओं में से एक है जो रोज किसी न किसी रूप में घटती रहती थीं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।