श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 9

नटखट कृष्ण: माखन चोरी और मुँह में ब्रह्मांड की कथा

बचपन में कृष्ण और बलराम अपने मित्रों के साथ गोकुल में माखन चुराते थे। एक दिन मिट्टी खाने के आरोप पर यशोदा ने कृष्ण का मुँह खुलवाया तो उसमें पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया। पढ़ें पूरी कथा।

नटखट कृष्ण: माखन चोरी और मुँह में ब्रह्मांड की कथा
नटखट कृष्ण: माखन चोरी और मुँह में ब्रह्मांड की कथा — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

समय बीतने के साथ कृष्ण और बलराम शैशव से बचपन में पहुँचे। बलराम गंभीर थे और कृष्ण नटखट, जो हर दिन मनोरंजन का कोई नया तरीका खोज लेते थे। उनकी शरारतों से पूरा गोकुल परेशान भी था और मोहित भी, और उन्हीं शरारतों के बीच एक दिन यशोदा को उनके असली स्वरूप की झलक मिली।

दो भाई, दो स्वभाव

समय बीतता रहा और शैशव से कृष्ण और बलराम दोनों ने बचपन में प्रवेश किया। दोनों भाई एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। बलराम कुछ गंभीर स्वभाव के थे, जबकि कृष्ण नटखट थे और मनोरंजन का कोई न कोई नया तरीका निकाल ही लेते थे। बलराम सदा उनके साथ रहते थे, क्योंकि वे चाहते थे कि उनका छोटा भाई कभी किसी खतरे में न फँसे।

माखन चोरी की शरारतें

कृष्ण चुपचाप गौओं के स्थान में घुसकर गायों की पूँछ खींचने लगते। जब गोपियाँ माँ यशोदा से मिलने जातीं, तो वे उनके घरों में घुसकर मक्खन चुरा लेते। पड़ोसियों के घरों में तो वे रोज ही घुसते थे। वे दूध, दही और मक्खन से भरे मटके तोड़ देते और कई बार उन्हीं में सन भी जाते।

इन कामों में वे अकेले नहीं होते थे। बलराम और उनके दोस्तों की टोली भी उनके साथ रहती थी। सबको कृष्ण के साथ माखन का स्वाद लेने में बहुत मजा आता था। उन्हें अपने घरों का मक्खन उतना स्वादिष्ट नहीं लगता था, जितना इस तरह खाने में आनंद आता था।

यशोदा की गोद और गोपियों का क्षमा करना

अगर किसी दिन कोई गोपी कृष्ण को मक्खन चुराते रंगे हाथों पकड़ लेती, तो वे तुरंत भागकर माँ यशोदा के पास पहुँचते और उनकी गोद में छिप जाते। वे जानते थे कि यशोदा की गोद में छिप जाने पर कोई उनसे कुछ नहीं कहेगा।

जब गोपियाँ यशोदा से शिकायतें करतीं, तो कृष्ण इतनी निश्छलता से उनकी ओर देखते कि यशोदा से उन्हें डाँटते ही नहीं बनता था। फिर कृष्ण तोतली बोली में गोपियों से क्षमा माँगते तो वे सब कुछ भूलकर उन्हें प्यार से चूमने लगतीं, और यशोदा भी प्रेम से उनका मस्तक सहलाने लगतीं। लेकिन कृष्ण ज्यादा देर शांत नहीं रहते थे और जल्दी ही फिर अपनी शरारतें शुरू कर देते।

मिट्टी खाने की शिकायत

एक दिन बलराम और कृष्ण के कुछ अन्य मित्र भागते हुए यशोदा के पास आए और बोले कि कन्हैया मुट्ठियों में मिट्टी भरकर खा रहा है और उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है। यशोदा तुरंत लड़कों के साथ बाहर दौड़ीं।

उन्होंने कृष्ण के दोनों हाथ पकड़कर डाँटते हुए पूछा कि क्या वे मिट्टी खा रहे थे, और उन्हें गोद में उठा लिया। जवाब में कृष्ण ने मुस्कुराते हुए 'नहीं' में सिर हिलाया। यशोदा ने कठोरता से कहा कि जल्दी मुँह खोलकर दिखाओ, वे बहुत बदमाश हो गए हैं।

कृष्ण के मुँह में ब्रह्मांड

कृष्ण ने किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह मुँह खोल दिया। अंदर का दृश्य देखकर यशोदा चकित रह गईं। कृष्ण के मुँह के भीतर तो सारा ब्रह्मांड दिख रहा था। तारे, सूर्य, ग्रह, चाँद, सभी पिंड उनके मुँह में थे।

यशोदा समझ गईं कि कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं विधाता हैं। वे हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं कि विधाता की उन पर बड़ी कृपा है कि उन्हें यह चमत्कार देखने के लिए दिव्य दृष्टि मिली और संसार में जन्म लेने के लिए उन्होंने उन्हें अपनी माँ के रूप में चुना। उन्होंने यह भी कहा कि पुत्र समझकर वे कभी-कभी कठोर बोल देती हैं, इसके लिए उन्हें क्षमा करें।

कृष्ण की माया और फिर वही नटखट बालक

फिर कृष्ण ने अपनी माया से यशोदा की स्मृति से वह सब मिटा दिया जो उन्होंने देखा था। वे फिर अपनी मैया के नटखट बच्चे बन गए और इधर-उधर दौड़ने लगे। यशोदा ने उनके पीछे दौड़कर उन्हें पकड़ लिया और गोद में उठाकर चूमने लगीं।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि निश्छलता और प्रेम में बड़ी शक्ति है। कृष्ण की भोली दृष्टि और तोतली क्षमा के आगे गोपियाँ और यशोदा सब कुछ भूल जाती थीं। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ शिकायतें भी स्नेह में बदल जाती हैं।

दूसरी सीख यह है कि ईश्वर कभी साधारण रूप में भी हमारे सामने होते हैं और हम उन्हें पहचान नहीं पाते। यशोदा ने रोज जिसे बालक समझकर डाँटा, उसी के मुँह में उन्होंने पूरा ब्रह्मांड देखा।

तीसरी सीख यशोदा की विनम्रता में है। सत्य जानने पर उन्होंने तुरंत हाथ जोड़कर क्षमा माँगी। और माया के कारण वह स्मृति मिट जाने के बाद भी वे फिर उसी ममता से अपने पुत्र को गोद में लेकर चूमने लगीं, क्योंकि माँ का प्रेम ज्ञान से भी बड़ा है।

कथा का सार

नटखट कृष्ण की ये लीलाएँ बताती हैं कि जो बालक माखन चुराता है, वही पूरे ब्रह्मांड का स्वामी भी है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।