श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 58

नरकासुर की मृत्यु: श्रीकृष्ण के चक्र से अत्याचारी का अंत, भगदत्त को अभयदान और सोलह सौ बंदिनियों की मुक्ति

मुर और उसके पुत्रों का अंत देखकर क्रोधित नरकासुर विशाल सेना के साथ युद्धभूमि में उतरा, पर गरुड़ ने उसके हाथियों को भगा दिया और श्रीकृष्ण के चक्र ने पलक झपकते ही उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया। देवी पृथ्वी की प्रार्थना पर कृष्ण ने भगदत्त को अभयदान दिया, सोलह सौ बंदिनियों को मुक्त कराया और अदिति के कुंडल तथा वरुण का छाता लौटाने अमरावती चले। पढ़ें पूरी कथा।

नरकासुर की मृत्यु: श्रीकृष्ण के चक्र से अत्याचारी का अंत, भगदत्त को अभयदान और सोलह सौ बंदिनियों की मुक्ति
नरकासुर की मृत्यु: श्रीकृष्ण के चक्र से अत्याचारी का अंत, भगदत्त को अभयदान और सोलह सौ बंदिनियों की मुक्ति — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

मुर और उसके पुत्रों की मृत्यु देखकर नरकासुर क्रोध से भर उठा और पर्वताकार हाथी पर सवार होकर पूरी सेना के साथ युद्धभूमि में आ गया। पर गरुड़ के प्रहार से उसकी हाथी-सेना बिखर गई और श्रीकृष्ण के चक्र ने पलक झपकते ही उसका अंत कर दिया। इसके बाद प्रभु ने भगदत्त को अभयदान दिया, सोलह सौ बंदिनियों को मुक्त कराया और लूटी गई वस्तुएँ लौटाने चल पड़े।

मुर के अंत के बाद नरकासुर का क्रोध

मुर और उसके पुत्रों की इस प्रकार मौत देखकर नरकासुर को बहुत क्रोध आया। अपने सेनापति को बुलाकर वह बोला, ‘‘मैं अभी तक कृष्ण को ढील देता रहा। उसी का लाभ उठाकर वह मुर और उसके पुत्रों को मारने में सफल हो गया। तुम तुरंत अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दो। मैं इस ढीठ यादव को समाप्त कर दूँगा जो कि मेरी शक्ति की परवाह न करते हुए यहाँ तक घुस आया है।’’

गरुड़ का आक्रमण और हाथियों की सेना का भागना

शीघ्र ही एक पर्वताकार हाथी पर सवार होकर राक्षसों की सेना के साथ नरकासुर युद्धभूमि में आ गया। नरकासुर के साथ हाथियों की सेना भी थी। गरुड़ ने उन हाथियों पर अपने नोकीले पंजों से आक्रमण कर दिया। भयानक हाथी चिंघाड़ते हुए रणभूमि से भागे। उन्होंने अपनी ही सेना को कुचलना शुरू कर दिया। यह देखकर नरकासुर क्रोध से बोला, ‘‘दुष्ट पक्षी, अब तू मेरा प्रहार सहन कर!’’ यह कहते हुए नरकासुर ने गरुड़ पर अपना अस्त्र चलाया। लेकिन उसे उस समय बड़ा आश्चर्य हुआ जब उस अस्त्र का गरुड़ पर कोई प्रभाव नहीं हुआ।

श्रीकृष्ण के चक्र से नरकासुर का अंत

नरकासुर अपनी विशाल गदा हाथ में लेकर कृष्ण पर फेंकने ही वाला था कि तभी उसे अपने ऊपर किसी वस्तु के घूमने की ध्वनि सुनाई पड़ी। उसने ऊपर देखा तो कृष्ण के चक्र को अपनी ओर आते पाया। उस चक्र ने पलक झपकते ही नरकासुर का मस्तक उसके धड़ से अलग कर दिया। नरकासुर की मौत हो गई। नरकासुर की यह दशा देखकर देवता बड़े प्रसन्न हुए। वे स्वर्ग से कृष्ण पर फूलों की बरसात करने लगे।

देवी पृथ्वी की प्रार्थना और भगदत्त को अभयदान

तभी कृष्ण ने देवी पृथ्वी को एक बालक असुर के साथ अपनी ओर आते हुए देखा। उनके साथ कुछ अन्य असुर भी थे। वे असुर अदिति के कुंडल और वरुण का छाता लिये हुए थे। उन दोनों ही वस्तुओं को कृष्ण के चरणों में रखते हुए देवी पृथ्वी ने कहा, ‘‘नरकासुर बड़ा भाग्यशाली था कि आपके हाथों उसका जीवन समाप्त हुआ। यह नरकासुर का पुत्र भगदत्त है। इस पर दया करके इसके प्राण न लीजिए।’’

तब कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले, ‘‘चिंता मत कीजिए, देवी पृथ्वी। अब भगदत्त अपने पिता के स्थान पर प्राग्ज्योतिषपुर के सिंहासन पर बैठेगा। भगदत्त, स्मरण रखना कि तुम्हारा स्थान अपनी प्रजा के लिए पिता के समान है। सदा उनकी पिता बनकर देखभाल करना और उनके प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करना। अपनी प्रजा की भावनाओं का आदर करना।’’

सोलह सौ बंदिनियों की मुक्ति और लूटी वस्तुओं की वापसी

फिर कृष्ण ने भगदत्त के साथ महल में प्रवेश किया। कृष्ण को देखकर उसके कारागार में कैद सोलह सौ सुंदरियों ने उनसे स्वयं को मुक्त कराने की प्रार्थना की। नरकासुर ने उनके शीलहरण के उद्देश्य से उन सबको वहाँ कैद किया था। कृष्ण ने भगदत्त से कहा, ‘‘इन सभी को पूरी सुरक्षा के साथ द्वारका पहुँचाने की व्यवस्था करो।’’

फिर कृष्ण नरकासुर के अस्तबल में गए जहाँ उन्होंने चार दाँतों वाले ऐरावत के वंशजों को देखा। कृष्ण ने भगदत्त को वे हाथी इंद्र को वापस करने का आदेश दिया।

फिर कृष्ण सत्यभामा से बोले, ‘‘प्रिये, चलो, अब हम माता अदिति के पास चलते हैं। अपने कुंडल पाकर वे निश्चय ही बड़ी प्रसन्न होंगी। हम वरुण को भी उनका दिव्य छाता वापस कर देंगे।’’

यह कहकर कृष्ण सत्यभामा के साथ फिर गरुड़ पर सवार हुए और लूटी गई वस्तुएँ लौटाने के लिए अमरावती की ओर उड़ चले।

भक्ति से जुड़ा संदेश: अधर्म का अंत, शरणागत पर दया और पीड़ितों की रक्षा

नरकासुर ने अपनी शक्ति पर घमंड करके कृष्ण को ढीठ यादव कहा, पर अंत में उसका अस्त्र गरुड़ पर भी बेअसर रहा और प्रभु का चक्र पलक झपकते ही उसका अंत कर गया। यह प्रसंग भक्त को याद दिलाता है कि अहंकार चाहे जितना बड़ा हो, प्रभु की शक्ति के सामने टिक नहीं सकता। जो अधर्म और अत्याचार के रास्ते पर चलता है, उसका अंत निश्चित है।

इस कथा की सबसे कोमल बात यह है कि प्रभु अत्याचारी को दंड देने के बाद भी दया का द्वार बंद नहीं करते। देवी पृथ्वी ने जब भगदत्त के प्राण न लेने की प्रार्थना की, तो कृष्ण मुस्कुराए और बोले कि चिंता मत कीजिए। उन्होंने भगदत्त को न केवल प्राणदान दिया, बल्कि उसे सिंहासन भी सौंपा। भगवान दंड के साथ सुधार का अवसर भी देते हैं।

कृष्ण ने भगदत्त को राजा बनाते हुए धर्म का पाठ भी पढ़ाया कि प्रजा के लिए तुम्हारा स्थान पिता के समान है, उनकी देखभाल करना, कर्त्तव्यों का पालन करना और उनकी भावनाओं का आदर करना। यह शिक्षा केवल एक राजा के लिए नहीं, हर उस मनुष्य के लिए है जिसे जीवन में किसी पर अधिकार या ज़िम्मेदारी मिली है।

सोलह सौ बंदिनियों ने जब कृष्ण को देखकर मुक्ति की प्रार्थना की, तो प्रभु ने तुरंत उनकी सुरक्षित वापसी की व्यवस्था का आदेश दिया। पीड़ितों की पुकार प्रभु तक पहुँचती है और वे उनकी रक्षा का मार्ग स्वयं बनाते हैं। अंत में कृष्ण का माता अदिति को कुंडल और वरुण को छाता लौटाने के लिए चल पड़ना यह दिखाता है कि वे केवल शत्रु का नाश नहीं करते, बल्कि भक्तों और देवताओं का खोया हुआ सम्मान भी लौटाते हैं। परंपरा में इसी विजय की स्मृति नरक चतुर्दशी के पर्व से जुड़ी मानी जाती है।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि अहंकार में चूर व्यक्ति अपनी शक्ति को ही सब कुछ समझ लेता है। नरकासुर ने कृष्ण को ढील देने की बात कही, पर उसका अपना अस्त्र गरुड़ पर भी असर नहीं कर सका।

दूसरी सीख यह है कि अत्याचार का अंत एक दिन अवश्य होता है। जिस नरकासुर के नाम से तीनों लोक काँपते थे, उसका मस्तक कृष्ण के चक्र ने पलक झपकते ही धड़ से अलग कर दिया।

तीसरी सीख यह है कि शरण में आए की रक्षा और क्षमा भी धर्म है। देवी पृथ्वी की प्रार्थना पर कृष्ण ने भगदत्त के प्राण नहीं लिए और उसे प्राग्ज्योतिषपुर का सिंहासन सौंपा।

चौथी सीख यह है कि राजा या अधिकारी का स्थान प्रजा के लिए पिता के समान होता है। कृष्ण ने भगदत्त को प्रजा की देखभाल करने, कर्त्तव्य निभाने और उसकी भावनाओं का आदर करने का उपदेश दिया।

पाँचवीं सीख यह है कि पीड़ितों को मुक्त कराना और उन्हें सुरक्षित घर पहुँचाना सच्चा धर्म है। कृष्ण ने सोलह सौ बंदिनियों को पूरी सुरक्षा के साथ द्वारका पहुँचाने की व्यवस्था कराई।

छठी सीख यह है कि जिसकी जो वस्तु छीनी गई हो, उसे सम्मान सहित लौटाना चाहिए। कृष्ण ने इंद्र को हाथी, माता अदिति को कुंडल और वरुण को उनका दिव्य छाता लौटाने का निश्चय किया।

कथा का सार

श्रीकृष्ण के चक्र ने नरकासुर का अंत कर दिया, पर प्रभु ने देवी पृथ्वी की प्रार्थना पर उसके पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर प्राग्ज्योतिषपुर का सिंहासन सौंपा, सोलह सौ बंदिनियों को मुक्त कराया और लूटी गई वस्तुएँ लौटाने अमरावती की ओर चल पड़े। यह कथा सिखाती है कि अत्याचार का अंत निश्चित है और भगवान दंड के साथ दया, रक्षा और न्याय भी देते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।