श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 34
मथुरा में कृष्ण: त्रिवक्र का उद्धार, सुदामा माली और धनुष भंग की कथा
मथुरा पहुँचकर कृष्ण-बलराम ने नगर की शोभा देखी, कंस के अभिमानी धोबी को सबक सिखाया और दर्जी तथा माली सुदामा को वरदान दिया। कूबड़ वाली त्रिवक्र का उद्धार करके वे धनुर्यज्ञ स्थल पहुँचे और विशाल धनुष तोड़ दिया। पढ़ें पूरी कथा।

सूर्यास्त से पहले कृष्ण और बलराम अक्रूर के साथ मथुरा पहुँच गए। नगर की शोभा देखते हुए उन्होंने कंस के अभिमानी धोबी को सबक सिखाया, दर्जी, माली सुदामा और त्रिवक्र पर कृपा की और अंत में धनुर्यज्ञ का विशाल धनुष तोड़ डाला।
मथुरा के द्वार पर अक्रूर से भेंट
सूर्यास्त के पूर्व ही अक्रूर कृष्ण और बलराम के साथ मथुरा पहुँच गए। नंद और उनका दलबल पहले ही दूसरे रास्ते से मथुरा पहुँच गया था। दोनों ही दलों की भेंट मथुरा के द्वार के बाहर हुई। कृष्ण ने अक्रूर से कहा, “चाचाजी, आप घर चले जाइए, और हम मथुरा के मनोरम दृश्य देखेंगे।” इस पर अक्रूर ने कहा, “नहीं, मैं आप लोगों को साथ लिये बगैर अपने घर नहीं जाऊँगा।” इस पर कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “चाचाजी, चिंता मत कीजिए। हम आपके घर अवश्य आएँगे। हम भी आपके घर आकर चाची से मिलना चाहते हैं। लेकिन यह कार्य हम उस लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद ही करेंगे, जिसके लिए हम मथुरा आए हैं।”
मथुरा नगरी की शोभा
अक्रूर और नंद से अनुमति लेकर कृष्ण और बलराम अपने कुछ मित्रों के साथ मथुरा में घूमने निकल गए। मथुरा में सुंदर भवन और मंदिर थे। पक्की सड़कों की चौड़ाई काफी अधिक थी। सड़कों के किनारे सुंदर पेड़ लगाए गए थे। नगर की रक्षा के लिए जगह-जगह सैनिक तैनात किए गए थे। नगर में अनेक सुंदर बगीचे थे जिनकी शोभा देखते ही बनती थी। उन बगीचों में स्वादिष्ट फलों वाले पेड़ थे। कृष्ण और बलराम ने साथियों सहित जी भर कर उन वृक्षों के फल खाए।
नगर में राजा के सामंतों के बड़े सुंदर महल थे। उनकी शोभा भी निराली थी। विशेषकर संगमरमर से बने भवन तो देखते ही बनते थे। अस्त्र-शस्त्रों से लैस द्वारपाल उन भवनों के बाहर पहरा दे रहे थे।
नगर में फैला कृष्ण के आगमन का समाचार
उस समय तक पूरे नगर में कृष्ण और बलराम के आगमन का समाचार जंगल की आग की तरह फैल चुका था। उन्हें देखने के लिए सब ओर से नागरिकों की भीड़ आ जुटी। लोग जानना चाहते थे कि जिन अद्भुत बालकों ने कंस के मायावी राक्षसों को मौत के घाट उतार दिया था, आखिर वे दोनों बालक थे कैसे? जिस तरह वृंदावन में गोपियाँ कृष्ण को देखने के लिए व्याकुल रहती थीं, कुछ वैसी ही दशा मथुरा की स्त्रियों की हो रही थी। वे कृष्ण की छवि पर मुग्ध होकर उन्हें निहारे जा रही थीं। उनसे कृष्ण के मुख से अपने नेत्र हटाते नहीं बन रहा था। मथुरा की जिस गली से भी कृष्ण निकलते थे, वहीं लोग उन पर पुष्पों की वर्षा करने लगते थे। लोग उन्हें जगह-जगह रोककर फूलों की मालाएँ पहनाते थे।
कंस के अभिमानी धोबी को कृष्ण ने सिखाया सबक
तभी कृष्ण की दृष्टि उस ओर से गुजर रहे एक धोबी पर पड़ी। वे उसे रोकते हुए बोले, “भैया, हमें पहनने के लिए कुछ अच्छे कपड़े दे दो। ईश्वर तुम्हें इसका अच्छा फल देगा।” वह धोबी राजा कंस का था और इस बात का उसे बड़ा अभिमान भी था। वह कृष्ण को खरी-खोटी सुनाता हुआ बोला, “वाह, एक ग्वाला शाही कपड़े पहनेगा? यह कहने का तुम्हारा साहस कैसे हुआ? अगर मैं यह बात महाराज से कह दूँ तो वे तुम्हें कारागार में डलवा देंगे। बेहतर यही है कि तुम यहाँ से चले जाओ।” कृष्ण ने उस धोबी को उसकी ढीठता का सबक सिखाने का निश्चय किया। इसलिए उन्होंने उस धोबी को एक हल्का थप्पड़ जड़ दिया। लेकिन धोबी के लिए तो वह थप्पड़ ही भारी पड़ गया। उसने अपने जीवन में कभी वैसा करारा थप्पड़ नहीं खाया था। वह तुरंत भूमि पर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। उसके साथी भी अपने कपड़ों के गट्ठर वहीं छोड़कर भाग खड़े हुए।
दर्जी की सेवा और कृष्ण का वरदान
उन गट्ठरों को खोलकर कृष्ण ने अपने साथियों में सारे कपड़े बाँट दिए। उन सुंदर कपड़ों को पाकर सारे गोप बड़े खुश हुए। लेकिन कई कपड़ों की नाप ठीक नहीं थी। पास ही एक दर्जी की दुकान थी। वह दर्जी गोपों की परेशानी समझ गया। वह उन्हें अपनी दुकान पर ले जाकर आश्वासन देता हुआ बोला, “चिंता मत करो, मैं ये सारे कपड़े तुम्हारी नाप के बना दूँगा।” जल्दी ही वह अपने पूरे परिवार के साथ इस काम में जुट गया। शीघ्र ही उसने कृष्ण और उनके साथियों को उनकी नाप के कपड़े दे दिए। दर्जी की इस सेवा भावना से कृष्ण बड़े प्रसन्न हुए। वे उसे धनी होने का वरदान देकर आगे बढ़ गए। गोप उन सुंदर कपड़ों को पहनकर बड़े खुश थे।
माली सुदामा का स्वागत और कृष्ण का वरदान
उस दर्जी की दुकान से थोड़ा ही आगे सुदामा नाम के शाही माली का घर था। कृष्ण और बलराम उस माली के घर जा पहुँचे। उन्हें देखकर सुदामा खुशी से फूला नहीं समाया। उसने फूलों, पान के पत्ते और चंदन से दोनों भाइयों की पूजा की। फिर उन्हें सुंदर सुगंधित पुष्पों की माला पहनाई। उसके स्वागत-सत्कार से कृष्ण और बलराम बड़े प्रसन्न हुए और उसे भी वरदान देकर आगे बढ़ गए।
सेविका त्रिवक्र और चंदन का लेप
उस मार्ग पर कुछ आगे जाने के बाद कृष्ण और उनके साथियों की भेंट एक स्त्री से हुई। वह स्त्री बड़ी ही सुंदर थी लेकिन उसकी पीठ पर कूबड़ निकला हुआ था। वह कूबड़ उसकी सारी सुंदरता नष्ट कर रहा था। वह स्त्री चंदन का लेप लिये हुए थी। कृष्ण ने उस स्त्री से पूछा, “तुम कौन हो? क्या तुम हमें चंदन का थोड़ा सा लेप दे सकती हो?”
“मेरा नाम त्रिवक्र है। मैं महाराज कंस और उनके परिवार की सेविका हूँ। चंदन का लेप बनाने में मैं सिद्धहस्त हूँ। तुम्हारे जैसा सुंदर लड़का मैंने अपने पूरे जीवन में कभी नहीं देखा। तुम ही इस चंदन के योग्य हो। तुम्हें यह चंदन देकर मुझे प्रसन्नता होगी।” त्रिवक्र ने कृष्ण के साँवले-सलोने बदन पर पीला लेप लगाया, जबकि बलराम के गोरे शरीर पर लाल लेप का प्रयोग किया। उस चंदन ने दोनों भाइयों की शोभा और बढ़ा दी। फिर दोनों भाइयों की शोभा निहारती हुई त्रिवक्र उनके चरणों पर गिर पड़ी। उसे लग रहा था जैसे उनके दर्शन करके उसका जीवन धन्य हो गया हो।
कृष्ण ने दूर किया त्रिवक्र का कूबड़
कृष्ण ने उस स्त्री के कूबड़ का उपचार कर देने का निर्णय किया। उसकी ठोड़ी पर अपनी एक उंगली रखकर उन्होंने उसे उठा दिया। उनके ऐसा करते ही उस स्त्री की पीठ पर मौजूद कूबड़ ठीक हो गया। अब उसके शरीर की एकमात्र व सबसे बड़ी कमी दूर हो गई थी। अब वह बड़ी ही सुंदर लग रही थी। त्रिवक्र अब कृष्ण के गुण गाने लगी। वह समझ गई कि कोई अलौकिक शक्ति का स्वामी ही उसका कूबड़ दूर कर सकता है, क्योंकि सांसारिक वैद्य तो ऐसा कर पाने में सफल हो नहीं सके थे। फिर वह कृष्ण के वस्त्र का एक सिरा पकड़कर उनसे अपने घर चलने के लिए कहने लगी। तब कृष्ण उससे मुस्कुराते हुए बोले, “मैं तुम्हारे घर अवश्य आऊँगा, लेकिन वह कार्य समाप्त होने के बाद, जिसे करने के लिए मैं वृंदावन से मथुरा आया हूँ।”
धनुर्यज्ञ स्थल पर कृष्ण ने तोड़ा विशाल धनुष
यह कहते हुए कृष्ण अपने मित्रों के साथ आगे बढ़ गए। अंत में कृष्ण और बलराम उस स्थान पर जा पहुँचे जहाँ धनुर्यज्ञ होना था। वहाँ एक विशाल धनुष रखा हुआ था। उस विशाल और भारी धनुष को सहजता से उठा पाना पहलवानों के लिए भी सम्भव नहीं था। वहाँ तैनात द्वारपालों ने कृष्ण और बलराम को रोकने का प्रयास किया। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि दोनों भाइयों को रोकना उनके बस की बात नहीं थी।
कृष्ण और बलराम निश्चिंतता के साथ चलते हुए उस धनुष के समीप जा पहुँचे। देखते ही देखते कृष्ण ने अपने बाएँ हाथ से बड़ी आसानी के साथ वह धनुष उठा लिया। उन्होंने उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और उसे इस प्रकार खींचा कि वह धनुष तेज आवाज के साथ टूट गया। वह आवाज सुनकर बहुत से सैनिक भागते हुए वहाँ आए। लेकिन कृष्ण और बलराम ने टूटे हुए धनुष के टुकड़े उठाकर उन्हें पीटना शुरू कर दिया। कृष्ण और बलराम ने उन सैनिकों की हालत खराब कर दी और वे अपने हथियार तक वहीं छोड़कर भाग खड़े हुए।
भक्ति से जुड़ा संदेश: प्रेम से की गई छोटी सेवा भी भगवान स्वीकार करते हैं
इस कथा में भक्ति का सुंदर संदेश है। दर्जी ने अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर गोपों के कपड़े नाप के बना दिए। माली सुदामा ने फूल, पान के पत्ते और चंदन से दोनों भाइयों की पूजा की। त्रिवक्र ने प्रेम से चंदन का लेप लगाया। इनमें से किसी की सेवा बहुत बड़ी नहीं थी, पर हर सेवा के पीछे प्रेम और श्रद्धा थी, और कृष्ण ने हर एक पर कृपा की।
कृष्ण ने अक्रूर और त्रिवक्र से कहा कि वे उनके घर अवश्य आएँगे, पर पहले उस कार्य को पूरा करेंगे जिसके लिए वे मथुरा आए हैं। भक्त को भगवान के वचन पर विश्वास रखना चाहिए, क्योंकि उनका हर वचन उचित समय पर पूरा होता है।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि अभिमान और दूसरों का अपमान करने वाले को अंत में कष्ट ही मिलता है। कंस के अभिमानी धोबी ने कृष्ण का तिरस्कार किया और उसे उसकी ढीठता का फल भुगतना पड़ा।
दूसरी सीख यह है कि सेवा-भाव और प्रेम से किया गया काम भगवान को अवश्य प्रसन्न करता है। दर्जी और सुदामा माली की सेवा से प्रसन्न होकर कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया।
तीसरी सीख यह है कि भगवान की कृपा जब मिलती है तो वह बड़ी से बड़ी कमी भी दूर कर देती है। सांसारिक वैद्य जो काम नहीं कर पाए, वह कृष्ण के एक स्पर्श से हो गया और त्रिवक्र का कूबड़ ठीक हो गया।
चौथी सीख यह है कि जो अपने लक्ष्य पर दृढ़ रहता है, वह रास्ते के आकर्षणों में नहीं उलझता। कृष्ण ने सबसे यही कहा कि पहले वे उस कार्य को पूरा करेंगे जिसके लिए मथुरा आए हैं, और फिर घर आएँगे।
कथा का सार
मथुरा में कृष्ण ने भक्तों पर कृपा बरसाई, अभिमानी को सबक सिखाया और धनुष तोड़कर कंस को अपने आगमन का संकेत दे दिया। यह कथा सिखाती है कि प्रेम और श्रद्धा से की गई छोटी सेवा भी भगवान को प्रिय होती है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।