श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 33
मथुरा गमन: कृष्ण-बलराम का वृंदावन से प्रस्थान और अक्रूर को विष्णु के दर्शन
कृष्ण और बलराम अक्रूर के साथ रथ पर मथुरा चल पड़े, और गोपियाँ आँसू बहाती रह गईं। मार्ग में यमुना के जल में अक्रूर को शेषनाग पर लेटे भगवान विष्णु के दर्शन हुए। पढ़ें पूरी कथा।

अगली सुबह कृष्ण और बलराम अक्रूर के साथ रथ पर मथुरा के लिए चल पड़े, और अपने प्यारे कृष्ण को जाते देख गोपियाँ आँसू बहाती रह गईं। मार्ग में यमुना के जल में अक्रूर को भगवान की वह लीला दिखी, जिसने उनके रोम-रोम को भक्ति से भर दिया।
बैलगाड़ियों के साथ मथुरा जाने की तैयारी
अगली सुबह सजी-धजी बैलगाड़ियाँ नंद के घर के सामने आ खड़ी हुईं। सारी गाड़ियाँ मक्खन, घी और दूध से ठसाठस लदी हुई थीं। अक्रूर ने नंद और यशोदा को उनके स्वागत-सत्कार के लिए धन्यवाद दिया और फिर कृष्ण और बलराम के साथ रथ पर सवार हो गए।
गोपियों का विरह और कृष्ण का आश्वासन
तभी गोपियाँ भागती हुई वहाँ आ पहुँचीं। उनकी आँखों से आँसुओं की धार बह रही थी। उनके प्यारे कृष्ण जा जो रहे थे। व्यथा के कारण उनका हृदय फटा जा रहा था। सभी लोग उन्हें ढाढ़स बँधाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके आँसू तो रुक ही नहीं रहे थे। उन्होंने रोते हुए कृष्ण से वृंदावन छोड़कर न जाने का अनुरोध किया। तब कृष्ण ने स्वयं उन्हें समझाते हुए कहा, “तुम लोग रोओ मत। मैं एक बहुत ही आवश्यक कार्य से मथुरा जा रहा हूँ। मुझे जाने दो।”
गाँव के बाहर कृष्ण की आज्ञा से रुकीं गोपियाँ
फिर अक्रूर के संकेत पर सारथि ने रथ आगे बढ़ाया। उस रथ के पीछे नंद और अन्य पुरुष भी चल पड़े। गोपियाँ भी उन सब के पीछे आँखों से आँसू बहाती हुई चल पड़ीं। गाँव के बाहर आ जाने के बाद कृष्ण ने सारी गोपियों से वहीं रुक जाने को कहा। गोपियाँ अपने प्रिय कृष्ण की आज्ञा की अवहेलना तो कर नहीं सकती थीं, सो वे आँसू बहाती हुई वहीं खड़ी रह गईं।
यमुना तट पर विश्राम
उसके बाद रथ और बैलगाड़ियाँ धीमी गति से मथुरा की ओर चल पड़ीं। मार्ग में वे लोग यमुना नदी के तट पर थोड़े विश्राम के लिए रुके। कृष्ण और बलराम ने यमुना के शीतल जल में अपने हाथ-पैर धोए। इसके बाद वे दोनों फिर रथ पर जा बैठे।
यमुना के जल में अक्रूर को दिखे कृष्ण और बलराम
फिर अक्रूर ने दोनों भाइयों से कहा, “आप लोग आराम से रथ में बैठिए। मैं कुछ थका हुआ अनुभव कर रहा हूँ। मैं अभी नदी में स्नान करके आता हूँ।” अक्रूर नदी में जा उतरे। जैसे ही उन्होंने नदी में डुबकी मारी, उन्हें नदी के तल में स्थित एक चट्टान के ऊपर कृष्ण और बलराम बैठे हुए दिखाई दिए। उन्हें वहाँ देखकर अक्रूर आश्चर्य में पड़ गए। वह तो उन्हें बाहर रथ पर बैठा हुआ छोड़कर आए थे। फिर अक्रूर ने अपना सिर बाहर निकाला तो दोनों भाई उन्हें रथ पर बैठे हुए दिखे। अक्रूर सोचने लगे, ‘वे दोनों तो रथ पर बैठे हैं। फिर वे पानी के अंदर कैसे हो सकते हैं?’ अक्रूर ने दुबारा पानी के अंदर डुबकी मारी तो कृष्ण और बलराम फिर उसी चट्टान पर बैठे दिख रहे थे। अक्रूर ने फिर बाहर देखा तो उन्हें रथ पर ही बैठा पाया। अक्रूर एक बार फिर डुबकी मारने से खुद को नहीं रोक सके।
शेषनाग पर विष्णु के दर्शन और अक्रूर की स्तुति
इस बार का दृश्य देख कर तो उनके रोएँ ही खड़े हो गए। हजार फनों वाला शेषनाग यमुना के तलहटी में कुंडली मारकर बैठा हुआ था। उस पर भगवान विष्णु लेटे हुए थे। अक्रूर फटी आँखों से भगवान की लीला देख रहे थे। भक्तिभाव से अक्रूर का रोम-रोम भजन कर उठा। अपने हाथ जोड़े अक्रूर भगवान विष्णु की स्तुति कर रहे थे, “हे परमेश्वर, लोग आपकी भाँति-भाँति से उपासना करते हैं। लेकिन जिस तरह पहाड़ों से निकलती हुई नदी का अंतिम लक्ष्य समुद्र ही है, वैसे ही आपसे मिलना सभी प्राणियों का अंतिम लक्ष्य है। मुझे वरदान दें कि मैं सदा अच्छे कर्म करूँ। मैं सच्चे मार्ग से कभी न हटूँ।”
भगवान का वरदान और कृष्ण का मुस्कुराता प्रश्न
भगवान विष्णु अक्रूर को यह वरदान देकर अंतर्धान हो गए। जब अक्रूर पानी से बाहर निकले तो उन्होंने पहले की भाँति कृष्ण और बलराम को रथ पर ही बैठे पाया। हक्के-बक्के धीरे-धीरे चलते हुए वह अपने रथ के पास जा पहुँचे। कृष्ण ने मुस्कुराते हुए पूछा, “क्या बात है? आप इतने चकित क्यों लग रहे हैं? क्या आपने पानी के अंदर कुछ देख लिया है?”
अक्रूर का उत्तर और मथुरा की ओर प्रस्थान
अक्रूर ने उत्तर दिया, “आपको देखने के बाद जग में देखने लायक कुछ बाकी बचता ही नहीं है।” अक्रूर का जवाब सुनकर कृष्ण हँसने लगे। वे तो सर्वज्ञ थे। ऐसा भला संसार में क्या था, जो उन्हें ज्ञात नहीं था?
फिर कृष्ण और बलराम के साथ अक्रूर पुनः मथुरा की ओर चल पड़े। वे समझ गए थे कि कंस का जीवन अब समाप्त होने ही वाला है।
भक्ति से जुड़ा संदेश: भगवान हर रूप में भक्त के साथ
इस कथा में भक्ति के दो सुंदर रंग दिखते हैं। एक ओर गोपियाँ हैं, जिनका प्रेम इतना गहरा है कि कृष्ण के जाने की बात से ही उनका हृदय फटा जा रहा है। फिर भी वे कृष्ण की आज्ञा का मान रखकर गाँव के बाहर रुक जाती हैं। सच्चे प्रेम में अपनी पीड़ा से ऊपर प्रिय की आज्ञा होती है।
दूसरी ओर अक्रूर हैं, जिन्हें यमुना के जल में भगवान के दिव्य रूप के दर्शन हुए। उनकी स्तुति में भक्ति का मर्म छिपा है कि लोग भाँति-भाँति से उपासना करते हैं, पर सबका अंतिम लक्ष्य एक ही परमेश्वर तक पहुँचना है। और अक्रूर ने भगवान से धन-वैभव नहीं माँगा, बस यह वरदान माँगा कि वे सदा अच्छे कर्म करें और सच्चे मार्ग से कभी न हटें।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि सच्चा प्रेम और भक्ति प्रिय की आज्ञा का सम्मान करना सिखाती है। गोपियों का हृदय व्यथा से भरा था, फिर भी कृष्ण के कहने पर वे वहीं रुक गईं।
दूसरी सीख यह है कि ईश्वर से माँगने योग्य सबसे बड़ा वरदान सद्कर्म और सच्चे मार्ग पर बने रहना है। अक्रूर ने यही वरदान माँगा।
तीसरी सीख यह है कि विभिन्न मार्गों से की गई उपासना का लक्ष्य एक ही परमेश्वर है। अक्रूर की स्तुति में नदी और समुद्र का सुंदर उदाहरण इसी बात को समझाता है।
चौथी सीख यह है कि भगवान की लीला को समझ पाना सबके लिए आसान नहीं, पर भक्त का भक्तिभाव उसे वह दर्शन करा देता है। अक्रूर ने जल के भीतर और रथ पर एक साथ कृष्ण-बलराम को देखा और भगवान की दिव्यता का अनुभव किया।
कथा का सार
मथुरा गमन की इस यात्रा में गोपियों के विरह ने प्रेम की गहराई दिखाई और अक्रूर को हुए दर्शन ने भक्ति की महिमा। यह कथा सिखाती है कि भगवान का दर्शन करने के बाद संसार में कुछ और देखने की इच्छा नहीं रहती। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।