श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 11

कुबेर के पुत्र: नलकुबेर और मणिग्रीव की शाप-मुक्ति की कथा

नारद मुनि के शाप से कुबेर के दोनों पुत्र नलकुबेर और मणिग्रीव गोकुल में अर्जुन के वृक्ष बन गए थे। बालकृष्ण ऊखल खींचते हुए उन वृक्षों के बीच से निकले और दोनों को शाप से मुक्त कर दिया। पढ़ें पूरी कथा।

कुबेर के पुत्र: नलकुबेर और मणिग्रीव की शाप-मुक्ति की कथा
कुबेर के पुत्र: नलकुबेर और मणिग्रीव की शाप-मुक्ति की कथा — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

ऊखल से बँधे कृष्ण पीठ पर ऊखल लादे चले जा रहे थे कि मार्ग में उन्हें दो अर्जुन के वृक्ष दिखाई दिए। कृष्ण ने उनके बीच से निकलने का निश्चय किया, क्योंकि वे जानते थे कि ये साधारण वृक्ष नहीं हैं, बल्कि वर्षों से शाप में बँधे कुबेर के दो पुत्र हैं।

अर्जुन के दो वृक्ष

मार्ग में कृष्ण को पास ही स्थित दो अर्जुन के वृक्ष दिखाई दिए। उन्होंने उन दोनों वृक्षों के बीच से होकर निकलने का निश्चय किया। वे दोनों वृक्ष वास्तव में धन के देवता कुबेर के दो पुत्र थे, जिनके नाम नलकुबेर और मणिग्रीव थे।

नारद मुनि का शाप

एक बार दोनों भाई अपनी पत्नियों के साथ वार्तालाप में व्यस्त थे। तभी वहाँ नारद मुनि आ पहुँचे, पर दोनों भाई बातचीत में इतने मग्न थे कि उनका ध्यान नारद की ओर गया ही नहीं।

कुबेरपुत्रों के इस व्यवहार से नारद ने स्वयं को अपमानित अनुभव किया और उन्हें क्रोध आ गया। उन्होंने दोनों भाइयों को शाप दिया कि वे गोकुल में अर्जुन के वृक्ष बनकर रहेंगे।

पत्नियों की विनती और शाप से मुक्ति का मार्ग

जब उनकी पत्नियों ने ऋषि का शाप सुना तो वे रोते हुए दया की भीख माँगने लगीं। उन्होंने कहा कि उनके पतियों का ऋषि का अपमान करने का कोई इरादा नहीं था और ऋषि से उन्हें क्षमा करने तथा शाप वापस लेने का आग्रह किया।

उनके बार-बार अनुरोध करने पर नारद मुनि पिघल गए। उन्होंने कहा कि शाप तो वापस नहीं लिया जा सकता, पर उसका प्रभाव कम किया जा सकता है। जब भगवान विष्णु श्रीकृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेंगे, तब वे इन दोनों को वृक्ष रूप से मुक्त कराएँगे।

कृष्ण की लीला और वृक्षों का उखड़ना

कृष्ण को यह सब स्मरण था, इसीलिए उन्होंने यह लीला रची थी। वे दोनों पेड़ों के बीच से इस तरह निकले कि ऊखल उनके बीच में फँस गया। फिर कृष्ण ने ऊखल को हलका सा झटका दिया। एक ही झटके में दोनों पेड़ उखड़ गए और अपने वास्तविक रूप में आ गए।

कृष्ण की स्तुति करते हुए दोनों बोले कि भगवन्, शाप से मुक्ति दिलाने के लिए आपका धन्यवाद, अब उन्हें अपने लोक लौटने की अनुमति दीजिए। कृष्ण ने सहर्ष अनुमति दे दी। दोनों कृष्ण के चरणों में प्रणाम करके कुबेर लोक चले गए। इस प्रकार कृष्ण की कृपा से कुबेरपुत्रों को वृक्ष रूप से मुक्ति मिल गई।

यशोदा और गोकुलवासियों का आश्चर्य

जोर की आवाज सुनकर यशोदा कई गोपों और गोपियों के साथ भागती हुई उस स्थान पर आईं। दोनों पेड़ों को पूरी तरह उखड़कर जमीन पर पड़ा देखकर वे चकित रह गईं। कृष्ण हँसते हुए उनकी शाखाओं से खेल रहे थे।

किसी को समझ नहीं आ रहा था कि इतने वर्षों से उस स्थान पर खड़े दो विशाल पेड़ों को कृष्ण जैसे छोटे बालक ने इतनी सरलता से कैसे उखाड़ दिया। लेकिन माँ यशोदा का ध्यान इस बात पर नहीं था। वे तो इसलिए भगवान को धन्यवाद दे रही थीं कि उनके पुत्र कृष्ण को कोई चोट नहीं आई थी।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि साधु-संतों और बड़ों का आदर करना चाहिए। कुबेर के दोनों पुत्र बातचीत में इतने खोए थे कि नारद मुनि के आने पर ध्यान ही नहीं दिया, और इसी असावधानी का उन्हें दंड मिला।

दूसरी सीख यह है कि ईश्वर शाप और दंड के भीतर भी मुक्ति का मार्ग रखते हैं। नारद का शाप वापस नहीं हो सकता था, पर उसमें श्रीकृष्ण के हाथों मुक्ति का मार्ग पहले से जुड़ा था।

तीसरी सीख यशोदा की ममता में है। विशाल वृक्षों के गिरने का रहस्य उन्हें नहीं सूझा, उन्हें केवल अपने पुत्र की कुशलता की चिंता थी। माँ के लिए संतान की सुरक्षा ही सबसे बड़ा चमत्कार है।

कथा का सार

कुबेर के पुत्रों की शाप-मुक्ति की यह कथा श्रीकृष्ण की उस लीला को पूर्ण करती है जिसमें वे ऊखल से बँधकर भी भक्तों का उद्धार कर गए। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।