श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 36

कुबलयापीड की मौत: कंस के मदमस्त हाथी का कृष्ण-बलराम के हाथों अंत

धनुर्यज्ञ के दिन कंस ने महल के द्वार पर शराब पिलाकर मदमस्त किए गए हाथी कुबलयापीड को खड़ा कर रखा था। कृष्ण और बलराम ने उसे खूब खिझाया, उसकी पूँछ और सूँड पकड़कर पटका और उसी के दाँतों से उसका अंत कर दिया। पढ़ें पूरी कथा।

कुबलयापीड की मौत: कंस के मदमस्त हाथी का कृष्ण-बलराम के हाथों अंत
कुबलयापीड की मौत: कंस के मदमस्त हाथी का कृष्ण-बलराम के हाथों अंत — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

धनुर्यज्ञ के दिन मथुरा उत्सव में डूबा था और कंस के महल के द्वार पर मदमस्त हाथी कुबलयापीड कृष्ण-बलराम की प्रतीक्षा कर रहा था। पर्वत जैसे उस हाथी के सामने दोनों भाई ऐसे मुस्कुरा रहे थे जैसे किसी बच्चे का खेल देख रहे हों।

धनुर्यज्ञ का दिन और मथुरा में उत्सव

अंततः धनुर्यज्ञ के लिए निश्चित दिन आ ही पहुँचा। उस दिन सड़कों की सजावट आम के पत्तों और तरह-तरह के पुष्पों से की गई थी। मथुरा में चारों ओर उत्सव का वातावरण था। लोग नए कपड़े पहने हुए राजा कंस के महल की ओर जा रहे थे, जहाँ उस दिन भाँति-भाँति के रंगारंग कार्यक्रम होने थे। इन्हीं कार्यक्रमों में से एक कुश्ती भी था।

महल के द्वार पर पर्वताकार हाथी कुबलयापीड

जब कृष्ण और बलराम महल के द्वार पर पहुँचे तो उन्होंने वहाँ पर्वताकार गजराज कुबलयापीड को खड़ा हुआ पाया। कुबलयापीड क्रोधी स्वभाव का एक जंगली हाथी था जिसे कंस के आदेश पर वहाँ तैनात किया गया था। वहाँ लाने से पहले उसे जमकर शराब पिलाई गई थी जिससे वह और भी मदमस्त हो गया था। उसके दाँत बहुत लम्बे थे और शरीर का रंग काजल की तरह काला था। मदिरा के नशे में होने के कारण वह उस समय इधर से उधर झूमता हुआ घूम रहा था। महावत बड़ी कठिनता से उस पर नियंत्रण कर पा रहा था।

हाथी का आक्रमण और दोनों भाइयों की मुस्कान

जैसे ही कृष्ण और बलराम महल के दरवाजे पर आए, कुबलयापीड पर सवार महावत सतर्क हो गया। दोनों भाइयों को मार डालने के उद्देश्य से उसने अंकुश मारकर हाथी को उनकी ओर बढ़ाया। मदमस्त हाथी चिंघाड़ता हुआ उनकी ओर चल पड़ा। ऐसा लगा जैसे कोई काला पहाड़ दोनों भाइयों की ओर बढ़ चला हो। कृष्ण और बलराम एक-दूसरे की ओर देखकर इस तरह मुस्कुराए जैसे बच्चों की नादानी देखकर किसी समझदार व्यक्ति को हँसी आती है।

कृष्ण-बलराम ने हाथी को खिझाया

जैसे ही कुबलयापीड उनके पास आया, वे दोनों उछलकर दूर हो गए। कुबलयापीड उनमें से किसी को नहीं पकड़ सका। इससे उसकी खीझ और बढ़ गई। वह कृष्ण के पीछे झपटा। लेकिन वे उसकी पकड़ में भला कहाँ आने वाले थे? उछल-उछल कर उन्होंने उसे खिझाना शुरू कर दिया। लाख कोशिशें करने के बाद भी जब कुबलयापीड उन्हें पकड़ पाने में असफल रहा तो उन्हें छोड़कर बलराम के पीछे लग गया।

कृष्ण ने पकड़ी हाथी की पूँछ

कृष्ण का मन थोड़ा खेल करने का हुआ। उन्होंने लपक कर हाथी की पूँछ पकड़ ली और उसे पीछे खींचना शुरू कर दिया। कुबलयापीड क्रोध और पीड़ा से जोर-जोर से चिंघाड़ने लगा। उसने कृष्ण की पकड़ से खुद को छुड़ाने के लिए पूरी ताकत लगा दी, लेकिन सफल नहीं हो सका। कृष्ण एक हाथ से उसकी पूँछ इस प्रकार पकड़े हुए थे जैसे बच्चे मिट्टी का हाथी पकड़ लेते हैं। उसकी पूँछ पकड़े हुए ही कृष्ण ने उसे कई कदम पीछे घसीट लिया।

कुबलयापीड का अंत और लोगों की जय-जयकार

फिर सहसा उसके सामने जाकर उन्होंने उसकी सूँड पकड़ ली और उसे हवा में उछालकर धरती पर पटक दिया। कुबलयापीड का महावत दूर जा गिरा। उसे गहरी चोट लगी थी। कुबलयापीड भी मुश्किल से खड़ा हो पाया। तभी कृष्ण और बलराम ने उसके दोनों दाँत उखाड़ लिए और उन्हीं से पीट-पीटकर उसे मौत के घाट उतार दिया। महावत को भी उन्होंने नहीं छोड़ा। यह सब देखकर लोग कृष्ण और बलराम की जय-जयकार करने लगे।

भक्ति से जुड़ा संदेश: भगवान के लिए बड़े से बड़ा संकट भी खेल

इस कथा में भक्ति का सुंदर संदेश है। काले पहाड़ जैसा विशाल हाथी सामने आ रहा था, फिर भी कृष्ण और बलराम के मुख पर भय की जगह मुस्कान थी। जिसके साथ भगवान हैं, उसके लिए बड़े से बड़ा संकट भी बच्चों के खेल जैसा हो जाता है।

भक्त का स्वभाव भी यही होना चाहिए कि वह संकट देखकर घबराए नहीं, बल्कि यह भरोसा रखे कि भगवान उसके साथ हैं। अंत में जब लोगों ने कृष्ण और बलराम की जय-जयकार की, तो वह इस बात का प्रतीक था कि सच्चाई और धर्म की विजय पर सबका हृदय आनंद से भर उठता है।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि नशा और मद विवेक को छीन लेते हैं। कुबलयापीड को शराब पिलाई गई थी, जिससे वह और भी मदमस्त हो गया था, और महावत भी उस पर बड़ी कठिनता से नियंत्रण कर पा रहा था।

दूसरी सीख यह है कि अधर्म की योजना में साथ देने वाला भी उसी अधर्म का फल भोगता है। कंस के आदेश पर तैनात हाथी और उस पर सवार महावत, दोनों को अपनी भूमिका का परिणाम मिला।

तीसरी सीख यह है कि ईश्वर पर भरोसा रखने वाले का मन संकट में भी निर्भय और शांत रहता है। कृष्ण और बलराम पर्वत जैसे हाथी को देखकर भी मुस्कुराते रहे।

चौथी सीख यह है कि बल का अभिमान व्यर्थ है, क्योंकि ईश्वर की शक्ति के सामने बड़े से बड़ा बल भी टिक नहीं पाता। इतना विशाल हाथी भी कृष्ण की पकड़ से खुद को नहीं छुड़ा सका।

कथा का सार

कुबलयापीड की मौत के साथ कंस की महल के द्वार पर बिछाई गई पहली चाल भी विफल हो गई और लोग कृष्ण-बलराम की जय-जयकार करने लगे। यह कथा सिखाती है कि जिसके साथ भगवान हैं, उसे बड़े से बड़े संकट से भी भय नहीं करना चाहिए। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।