श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 45
कृष्ण व रुक्मिणी का विवाह: रुक्मी का दंड, जरासंध की पराजय और द्वारका में विवाह
रुक्मिणी को लेकर कृष्ण के निकल जाने पर जरासंध क्रोध से भर उठा, पर बलराम की सेना के आगे उसे लौटना पड़ा। रुक्मी ने कृष्ण का पीछा किया, लेकिन रुक्मिणी की प्रार्थना पर कृष्ण ने उसके प्राण नहीं लिए। अंत में द्वारका में कृष्ण-रुक्मिणी का धूमधाम से विवाह हुआ। पढ़ें पूरी कथा।

रुक्मिणी को लेकर कृष्ण के निकल जाने की खबर सुनकर जरासंध ने राजाओं को उनका पीछा करने का आदेश दिया, पर बलराम की सेना के आगे उसे और शिशुपाल को लौटना पड़ा। रुक्मी ने कृष्ण से युद्ध किया, किंतु रुक्मिणी के वचन की याद दिलाने पर कृष्ण ने उसके प्राण नहीं लिए, और द्वारका पहुँचकर रुक्मिणी के साथ धूमधाम से विवाह किया।
जरासंध का क्रोध और बलराम की चेतावनी
कृष्ण के रुक्मिणी को लेकर निकल जाने का समाचार सुनकर जरासंध के क्रोध का अंत न रहा। वह राजाओं पर चीखा, ‘‘क्या मैंने तुम लोगों को सिर्फ उछल-कूद करने के लिए अपने पास रखा है? तुरंत उस ग्वाले का पीछा करो। मैं रुक्मिणी को किसी भी हालत में वापस चाहता हूँ।’’
उस समय तक बलराम भी वहाँ आ पहुँचे थे। वे कृष्ण से बोले, ‘‘भाई, जरासंध के आदमी तुम्हारा पीछा कर रहे हैं। बेहतर है कि तुम तेजी से आगे निकल जाओ।’’
बलराम की सेना और जरासंध की फौज का घमासान युद्ध
कृष्ण रुक्मिणी को लेकर आगे निकल गए। बलराम की सेना का जरासंध, शिशुपाल और रुक्मी की फौज के साथ संग्राम छिड़ गया। रुक्मी को अपनी बहन को वापस लाने की बड़ी फिक्र थी। उसने अपना रथ कृष्ण के रथ के पीछे ही दौड़ा दिया।
बलराम ने रुक्मी को रोकने की चेष्टा नहीं की। वे जानते थे कि रुक्मिणी के अपने रथ में रहते हुए भी कृष्ण सरलता से रुक्मी को परास्त कर देंगे। उन्होंने जरासंध का ही मुकाबला करने का फैसला किया। दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध शुरू हो गया। थोड़ी ही देर में जरासंध को समझ आ गया कि वह युद्ध में जीत नहीं सकेगा। तब वह शिशुपाल से बोला, ‘‘बेहतर यही है कि हम लौट चलें। बलराम की सेना हम पर भारी पड़ रही है। इसे पराजित करना हमारे लिए संभव नहीं है। अब तुम रुक्मिणी को प्राप्त नहीं कर सकोगे।’’
शिशुपाल का अफसोस और जरासंध-शिशुपाल की वापसी
रुक्मिणी के अपने हाथ से निकल जाने का शिशुपाल को बड़ा अफसोस था। उसे पता था कि रुक्मिणी जैसी सुंदर लड़की उसे फिर कभी नहीं मिलेगी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसकी अपनी पत्नी को ही कोई उठा ले गया हो। जरासंध ने उसे यह कहते हुए सांत्वना दी, ‘‘शिशुपाल, तुम इतना दुख मत करो। इस समय वे हम पर भारी पड़ रहे हैं। हमारे लिए उचित यही होगा कि हम पीछे हट जाएँ। जब भाग्य हमारा साथ दे रहा होगा, तब हम उन्हें सरलता से पराजित कर देंगे।’’
अपने मन में कटु स्मृति लिये जरासंध, शिशुपाल और उनके सहयोगी अपनी राजधानियों को लौट गए।
रुक्मी का पीछा और कृष्ण से युद्ध
इस बीच रुक्मी कृष्ण के रथ के निकट पहुँच चुका था। यह सोचकर उसे अत्यधिक क्रोध आ रहा था कि आखिर कृष्ण ने उसकी बहन का हरण करने का दुस्साहस कैसे कर लिया। जब उसका रथ कृष्ण के रथ से थोड़ी ही दूरी पर रह गया, तब वह चीखता हुआ कृष्ण से बोला, ‘‘कृष्ण, अपना रथ तुरंत रोको!’’
रुक्मी की ललकार सुनकर कृष्ण अभी अपना धनुष और बाण उठा ही रहे थे कि तभी रुक्मी का एक बाण उनके कवच से आ टकराया। लेकिन कृष्ण को इससे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा। कृष्ण ने एक के बाद एक कई तीर छोड़े, जिससे रुक्मी के रथ के घोड़े मर गए। फिर बाणों की वर्षा करके उन्होंने उसके रथ को भी चकनाचूर कर दिया।
रुक्मी ने रथ के मलबे के पीछे छिपकर अपना धनुष उठाया। लेकिन तभी कृष्ण का एक बाण आया और उसने उस धनुष के दो टुकड़े कर दिए। क्रोध से पागल हो रहे रुक्मी ने झपटकर अपनी तलवार उठाई और कृष्ण की ओर दौड़ा। कृष्ण ने एक और तीर छोड़ा। अब रुक्मी के हाथ में मात्र उसकी तलवार की मूठ रह गई। तब रुक्मी ने कृष्ण की ओर वह मूठ ही फेंक मारी, लेकिन एक तीर से उन्होंने उसे भी तोड़ दिया। अब तो रुक्मी ठगा सा खड़ा रह गया।
रुक्मिणी का वचन और रुक्मी का दंड
कृष्ण हाथ में तलवार लेकर अपने रथ से कूद पड़े। वे रुक्मी का सिर उसके धड़ से अलग करने ही जा रहे थे कि तभी रुक्मिणी भागती हुई आई और उनके पैरों पर गिरकर बोली, ‘‘श्रीकृष्ण, अपना वचन स्मरण कीजिए। रुक्मी मेरा भाई है। आप इसके प्राण न लीजिए। भले ही कोई और दंड दे दीजिए।’’
रुक्मिणी की बात सुनकर कृष्ण ने एक क्षण विचार किया। फिर उन्होंने रुक्मी के सिर के आधे बालों और आधी मूँछ को मूँड़ दिया। एक योद्धा के लिए यह स्थिति मृत्यु से भी बदतर थी।
बलराम का समझाना और द्वारका में कृष्ण-रुक्मिणी का विवाह
उस समय तक बलराम भी वहाँ पहुँच गए थे। कृष्ण द्वारा रुक्मी की जो हालत बनाई गई थी, उसे देखते हुए वे बोले, ‘‘कृष्ण, तुमने जो कुछ किया है, वह ठीक नहीं है। वीर पुरुषों का इस प्रकार अपमान करना हमारे जैसे वीरों को शोभा नहीं देता। माना कि रुक्मी ने हमारे साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार किया, लेकिन है तो ये वीर ही।’’
फिर बलराम रुक्मिणी से बोले, ‘‘तुम दुखी मत होओ। रुक्मी को अपने कर्मों की ही सजा मिली है। उसने वही पाया है जो उसने बोया था।’’
फिर उन्होंने रुक्मी को वहाँ से जाने दिया। रुक्मी इस अपमानित हालत में अपने नगर को नहीं लौट सकता था। इसलिए उसने एक नया नगर बसा लिया और वहीं रहने लगा।
फिर कृष्ण रुक्मिणी के साथ तेजी से द्वारका की ओर बढ़ चले। कुछ दिनों बाद कृष्ण ने रुक्मिणी के साथ धूमधाम से विवाह कर लिया।
भक्ति से जुड़ा संदेश: भक्त की पुकार और प्रभु का निभाया वचन
इस कथा का सबसे भावपूर्ण क्षण वह है जब रुक्मिणी अपने भाई के प्राण बचाने के लिए कृष्ण के चरणों में गिर जाती है। जिस भाई ने उसकी इच्छा के विरुद्ध उसका विवाह कराना चाहा, उसके लिए भी उसके मन में क्रोध नहीं, करुणा है। सच्ची भक्ति हृदय को कोमल बनाती है, और भक्त अपने विरोधियों का भी अहित नहीं चाहता। यही भाव भक्ति को केवल पूजा से ऊपर उठाकर जीवन का स्वभाव बना देता है।
कृष्ण ने रुक्मिणी का वचन निभाया और रुक्मी के प्राण नहीं लिए। भगवान अपने भक्त की भावनाओं का मान रखते हैं, और भक्त की प्रार्थना उनके हाथ में उठी तलवार को भी रोक देती है। जो भक्त पूर्ण विश्वास से प्रभु की शरण में रहता है, उसके संकल्प की रक्षा प्रभु स्वयं करते हैं।
बलराम के शब्द कि रुक्मी ने वही पाया जो उसने बोया था, कर्म के सिद्धांत की याद दिलाते हैं। भक्ति का मार्ग हमें यह भी सिखाता है कि अहंकार और द्वेष का फल अंततः कष्ट ही देता है, जबकि प्रेम, विनम्रता और ईश्वर पर विश्वास जीवन को सही दिशा देते हैं।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि जो ईश्वर की शरण में है, उसे बड़ी से बड़ी सेना भी पराजित नहीं कर सकती। जरासंध, शिशुपाल और रुक्मी की संयुक्त शक्ति के आगे भी कृष्ण और बलराम विजयी रहे।
दूसरी सीख यह है कि अपने विरोधियों के प्रति भी दया और करुणा का भाव रखना चाहिए। रुक्मिणी ने भाई के अपराध के बावजूद उसके प्राणों की रक्षा के लिए कृष्ण से प्रार्थना की।
तीसरी सीख यह है कि दिया हुआ वचन निभाना सच्चे महापुरुष की पहचान है। कृष्ण ने रुक्मिणी को दिया वचन याद रखा और क्रोध के क्षण में भी उसका मान रखा।
चौथी सीख यह है कि जैसा हम बोते हैं, वैसा ही काटते हैं। रुक्मी के द्वेष और अहंकार का परिणाम उसके अपमान के रूप में सामने आया, जैसा बलराम ने स्वयं कहा।
पाँचवीं सीख यह है कि हार के बाद भी धैर्य और सही समय की प्रतीक्षा आवश्यक है, पर वह प्रतीक्षा द्वेष में नहीं, विवेक में होनी चाहिए। जरासंध ने पीछे हटने का निर्णय सोच-समझकर लिया, जबकि रुक्मी क्रोध में अंधा होकर अपमानित हुआ।
कथा का सार
जरासंध और शिशुपाल की पराजय, रुक्मी के अपमान और रुक्मिणी के प्रार्थना भरे वचन के बाद श्रीकृष्ण ने द्वारका पहुँचकर रुक्मिणी से धूमधाम से विवाह किया। यह कथा सिखाती है कि जब भक्त का मन एक ही ईश्वर में टिक जाता है, तो प्रभु उसके संकल्प को पूरा करते हैं और उसके वचन की लाज रखते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।