श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 26
रासलीला: शरद पूर्णिमा की रात कृष्ण और गोपियों का दिव्य नृत्य
शरद पूर्णिमा की चाँदनी रात में कृष्ण की बाँसुरी सुनकर गोपियाँ सब कुछ छोड़कर दौड़ पड़ीं। कृष्ण ने हर गोपी के साथ नृत्य करने के लिए उतने ही रूप धारण कर लिए। पढ़ें रासलीला की पूरी कथा।

शरद पूर्णिमा की चाँदनी रात में जब कृष्ण ने बाँसुरी की तान छेड़ी, तो गोपियाँ अपनी सुध-बुध खोकर उसी ओर दौड़ पड़ीं। उसके बाद यमुना तट पर वह रासलीला हुई, जिसकी तुलना पृथ्वी पर कभी नहीं हो सकी।
शरद पूर्णिमा की रात और कृष्ण की बाँसुरी
शरद पूर्णिमा की रात थी। पूरी तरह खिले हुए चाँद की शीतल किरणें वृंदावन को और भी सुंदर बना रही थीं। यमुना नदी में दिख रही चाँद की परछाईं ने नदी को दिव्य सौंदर्य प्रदान कर दिया था। चाँदनी रात में पेड़ों की पत्तियों का रंग दूधिया हो गया था। कोमल वायु आहिस्ते से पेड़ों को धीरे-धीरे हिला रही थी। उनकी पत्तियाँ काँपती हुई बड़ी मधुर ध्वनि उत्पन्न कर रही थीं। सम्पूर्ण वातावरण ने अत्यंत मोहक स्वरूप धारण कर लिया था। ऐसे वातावरण में कृष्ण के हृदय में बाँसुरी की तान छेड़ने की तीव्र इच्छा होने लगी। कृष्ण ने अपनी बाँसुरी उठाकर उसकी मधुर स्वर लहरियाँ छेड़ दीं। उसके दिव्य स्वरों ने वृंदावन के प्रत्येक कोने को झंकृत कर दिया।
बाँसुरी की तान सुनकर दौड़ पड़ीं गोपियाँ
सभी गोपियाँ अपना काम छोड़कर उस मधुर तान को सुनने लगीं। उस समय कोई गोपी अपने बच्चों को सुला रही थी, कोई भोजन पका रही थी, तो कोई अपने पति की सेवा में रत थी। बाँसुरी की तान को सुनकर वे सभी अपनी सुध-बुध खो बैठीं और सारा संकोच त्यागकर उसी दिशा में दौड़ पड़ीं जहाँ से संगीत की ध्वनि आ रही थी। उस दिव्य संगीत ने उन्हें मानो सम्मोहन शक्ति से बाँध लिया था। उनके पतियों ने उन्हें रोकने की चेष्टा की, लेकिन वे सफल न हो सके। बाँसुरी की दिव्य शक्ति उन्हें बलपूर्वक अपनी ओर खींच रही थी। अपने चारों ओर गोपियों को अनुभव करके कृष्ण ने बाँसुरी की मधुर तान रोककर उन गोपियों की ओर देखते हुए कहा, ‘‘यह चाँदनी रात बहुत ही सुंदर है। ठंडी वायु वातावरण को और भी मोहक बना रही है। लेकिन तुम जैसी सुंदर स्त्रियों को ऐसे वातावरण में अपने घरों से नहीं निकलना चाहिए। तुम्हारे विषय में चिंता करके तुम्हारे पति परेशान होंगे।’’
गोपियों का समर्पण और यमुना तट पर खेल
कृष्ण के ऐसे वचन सुनकर गोपियाँ दुखी होकर बोलीं, ‘‘कृष्ण, हमारा प्रेम और समर्पण स्वीकार करो। हम जानती हैं कि हमारे रक्षक बनकर ही तुमने पृथ्वी पर जन्म लिया है। हमारा सर्वस्व तुम्हारा ही है। तुम्हारे प्रति हमारा समर्पण सिद्ध करने का हमें अवसर तो दो। हम अपनी इस परीक्षा में अवश्य सफल होंगी।’’ उनकी बात सुनकर कृष्ण मुस्कुराने लगे। फिर वे यमुना नदी के तट पर स्थित एक रमणीक स्थान पर जा पहुँचे और वहाँ गोपियों के साथ तरह-तरह के खेल खेलने लगे। कुछ समय बाद गोपियों ने गीत गाना शुरू कर दिया और कृष्ण उन गीतों की धुनों पर नृत्य करने लगे।
कृष्ण का अंतर्धान होना और गोपियों की खोज
अब तक गोपियों को अपने भाग्य पर गर्व हो रहा था। वे एक दिव्य पुरुष पर अपना आधिपत्य समझ कर स्वयं को भाग्यशाली अनुभव कर रही थीं। तभी कृष्ण उनके बीच से गायब हो गए। अब तो बार-बार कृष्ण का नाम लेते हुए वे गोपियाँ इधर-उधर भागने लगीं। उन्होंने कृष्ण को बहुत ढूँढ़ा, लेकिन वे उन्हें कहीं नहीं मिले। उन्होंने वन के प्रत्येक पेड़ से कृष्ण का पता पूछा, भला पेड़ उन्हें क्या बता पाते?
कृष्णमय हुईं गोपियाँ और कृष्ण का पुनः प्रकट होना
सभी गोपियों के रोम-रोम में कृष्ण समा गए थे। उनके मन में कृष्ण के लिए इतना तीव्र आकर्षण उत्पन्न हो गया था कि वे स्वयं को ही कृष्ण समझने लगी थीं। कोई गोपी गोवर्धन पर्वत धारण करने का अभिनय करने लगी, तो कोई इस प्रकार व्यवहार करने लगी जैसे उसी ने कालिया नाग को नाथा हो। इस प्रकार कृष्णलीला करती हुई सारी गोपियाँ झूम रही थीं। अदृश्य कृष्ण गोपियों की मनोदशा भली भाँति समझ रहे थे। वे पुनः प्रकट हुए और एक पेड़ के नीचे बैठकर बाँसुरी बजाने लगे।
सच्चे प्रेम पर गोपी का प्रश्न और कृष्ण का उत्तर
अपने स्वामी को सामने देखकर गोपियों के हर्ष की सीमा न रही। एक बार फिर उन्होंने उन्हें घेर लिया। एक गोपी कृष्ण से पूछ बैठी, ‘‘हमारे दिलों पर राज करने वाले, एक बात तो बताओ। कुछ लोग उन्हें प्रेम करते हैं जो उनसे प्यार करते हैं, कुछ लोग उनसे भी प्रेम करते हैं जो उनसे प्यार नहीं करते और कुछ लोग किसी से प्रेम नहीं करते। इन सबमें किसका व्यवहार सबसे उत्तम है?’’ कृष्ण बोले, ‘‘जो लोग अपने प्रेम के बदले दूसरे से भी प्रेम की आशा करें, वे स्वार्थी होते हैं। सच्चा प्रेम तो वही है जो बदले में कुछ न माँगे। माँ जब अपने बच्चे से प्रेम करती है तो बदले में कुछ नहीं चाहती। वह तो बस प्यार देती है। ऐसा ही प्रेम सर्वोत्कृष्ट होता है। इस संसार में बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो किसी से प्रेम नहीं करते। ऐसे लोगों को भी उत्तम नहीं कहा जा सकता। गोपियों, मेरी गिनती इनमें से किसी भी वर्ग में नहीं की जा सकती। जब मैं अंतर्धान होता हूँ, तो मैं ऐसा तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए ही करता हूँ। जब मैं तुम्हें नहीं दिख रहा था तो तुम्हारे प्रेम ने वैसे ही सारे अवरोध तोड़ दिए थे, जैसे नदी अपने किनारे तोड़कर उफनने लगती हो। तुम्हारी यह दशा देखकर मेरा हृदय गद्गद् हो गया था।’’
कृष्ण के अनेक रूप और दिव्य रासलीला
सभी गोपियों के मन में कृष्ण के साथ नृत्य करने की तीव्र आकांक्षा उत्पन्न हो रही थी। कृष्ण तो अंतर्यामी थे। वे गोपियों के मन की बात जान गए। प्रत्येक गोपी की मनोकामना पूरी करने के लिए उन्होंने उतने ही स्वरूप धारण कर लिए, जितनी वहाँ गोपियाँ थीं। वन में चारों ओर दिव्य नृत्य की झंकार सुनाई देने लगी। केंद्र में वास्तविक कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाते हुए विद्यमान थे। यही कृष्ण की रासलीला थी जिसकी तुलना हो पाना असंभव है। यह एक ऐसा अनुपम दृश्य था जो पृथ्वी पर फिर कभी नहीं देखा गया। गोपियों के साथ कृष्ण को स्वर्ग से देवताओं ने भी आश्चर्य और प्रसन्नता के साथ देखा।
रात बीती, यमुना में स्नान और गोपियों की वापसी
गोपियों का हृदय उस समय आनंद से आच्छादित था। उनका मन कर रहा था कि यह नृत्य कभी समाप्त ही न हो। इसी प्रकार नाचते हुए कब रात गुजर गई, कुछ पता ही नहीं चला। फिर कृष्ण और गोपियों ने यमुना नदी के ठंडे जल में स्नान किया। उसके बाद गोपियाँ अनिच्छापूर्वक अपने घरों को चली गईं।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि सच्चा प्रेम वही है जो बदले में कुछ न माँगे। कृष्ण ने माँ के प्रेम का उदाहरण देकर बताया कि निःस्वार्थ प्रेम ही सर्वोत्कृष्ट होता है।
दूसरी सीख यह है कि ईश्वर पर अधिकार जताने का भाव नहीं, विनम्र समर्पण होना चाहिए। जब गोपियों को अपने भाग्य पर गर्व हुआ, तभी कृष्ण अंतर्धान हो गए, और विरह में उनका प्रेम और गहरा हो गया।
तीसरी सीख यह है कि सच्ची भक्ति में मन पूरी तरह ईश्वर में लीन हो जाता है। गोपियाँ कृष्ण के प्रेम में इतनी डूब गईं कि स्वयं को ही कृष्ण समझने लगीं।
कथा का सार
शरद पूर्णिमा की रात कृष्ण की रासलीला ने गोपियों के निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण को अमर कर दिया। यह कथा सिखाती है कि सच्चा प्रेम बदले में कुछ नहीं माँगता और भक्ति विनम्र समर्पण से ही गहरी होती है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।