श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 59

कृष्ण लीला का समापन: महाभारत, यादवों का अंत, बलराम की चिरसमाधि और श्रीकृष्ण का बैकुंठ गमन

महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया और धर्म की विजय के बाद द्वारका लौट आए। अभिमानी यादव प्रभास में आपस में लड़कर समाप्त हो गए, बलराम ने चिरसमाधि ले ली और कृष्ण वन में ध्यान में बैठे। एक शिकारी का तीर उनके पैर में लगा और वे अपने धाम बैकुंठ चले गए। पढ़ें कृष्ण लीला के समापन की पूरी कथा।

कृष्ण लीला का समापन: महाभारत, यादवों का अंत, बलराम की चिरसमाधि और श्रीकृष्ण का बैकुंठ गमन
कृष्ण लीला का समापन: महाभारत, यादवों का अंत, बलराम की चिरसमाधि और श्रीकृष्ण का बैकुंठ गमन — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

पांडवों के मित्र श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया और धर्म की विजय के बाद द्वारका लौट आए। जब अभिमान में चूर यादव आपस में लड़कर समाप्त हो गए और बलराम ने चिरसमाधि ले ली, तब अवतार का उद्देश्य पूरा मानकर कृष्ण ने भी अपनी लीला समेट ली और बैकुंठ धाम चले गए, पर वे आज भी कण-कण में विद्यमान हैं।

पांडवों के मित्र कृष्ण और अर्जुन को गीता का उपदेश

कृष्ण पांडवों के नजदीकी मित्र थे। सभी कार्यों में वे पांडवों की सहायता करते थे। पांडवों और कौरवों के बीच ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी, कि उनके बीच युद्ध अपरिहार्य हो गया था। फिर उनके बीच महाभारत का युद्ध हुआ जो कि अट्ठारह दिनों तक चला और अपने आप में बहुत ही भीषण प्रकृति का युद्ध था। युद्ध के प्रारम्भ में कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। अपने रथ पर सवार अर्जुन जब युद्ध के लिए आए तो उनका रथ कृष्ण चला रहे थे। अर्जुन ने कौरवों की सेना में जब अपने ही भाइयों, गुरु, पितामह और मामा को देखा तो उनका हृदय डूबने लगा। वे अपने ही बंधु-बांधवों पर अस्त्र नहीं चलाना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि भूमि प्राप्त करने के लिए वे अपने ही परिवार को मारें। अर्जुन ने अपना धनुष और बाण एक ओर रख दिए और कृष्ण के सम्मुख युद्ध करने सम्बंधी अपनी असमर्थता व्यक्त करी। अर्जुन को दुखी देखकर कृष्ण ने उन्हें कर्मयोग का उपदेश देने का निर्णय किया। कृष्ण द्वारा दिए गए उपदेश को भगवद्गीता अर्थात् ईश्वर का गीत कहते हैं।

गीता का उपदेश सुनकर अर्जुन के मन के सभी संदेह दूर हो गए। उनके हृदय से दुख का भाव तिरोहित हो गया। वे युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हो गए और एक सच्चे योद्धा की तरह व्यवहार करने लगे।

महाभारत का निर्णय और युधिष्ठिर का राज्याभिषेक

अट्ठारह दिनों के घमासान युद्ध के बाद महाभारत का निर्णय हुआ। कौरवों की पराजय और पांडवों की विजय के साथ यह युद्ध समाप्त हुआ। कौरवों के साथ उनके सभी सहयोगी भी मारे गए। इस युद्ध के परिणामस्वरूप भारतभूमि से वीरों का सफाया हो गया। युद्ध के बाद कौरव राजकुमार दुर्योधन भीम के हाथों गदायुद्ध में मारा गया। इसके बाद कृष्ण युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का नरेश बनाकर द्वारका लौट गए।

यादवों का अभिमान और प्रभास में विनाश

कृष्ण यादवों के साथ द्वारका में कई वर्षों तक रहे। लेकिन धीरे-धीरे यादव अभिमानी और दुष्ट प्रकृति के हो गए। उन्होंने साधुओं का अपमान शुरू कर दिया। वे समझने लगे थे कि शक्ति में उनके समान कोई नहीं है। कोई भी उन्हें रोकने का साहस नहीं कर सकता।

एक दिन यादव प्रभास नाम के एक पवित्र स्थान पर गए। वहाँ पर उन्होंने जमकर शराब पी और मौजमस्ती शुरू कर दी। यहाँ-वहाँ घूमकर उन्होंने उपद्रव मचाना शुरू कर दिया। वे आपस में झगड़ने भी लगे। उनका झगड़ा इतना बढ़ा कि उन्होंने अपनी तलवारें म्यान से खींच लीं। वे एक-दूसरे के खून के प्यासे होने लगे। कृष्ण यह सब देख रहे थे। उन्होंने सोचा, ‘इन यादवों का नाश हो जाना ही अब उचित होगा। यदि ये जीवित रहे तो सम्पूर्ण विश्व को अपने पैरों से दलित करेंगे। पूरे समाज के लिए ये मुसीबत हो जाएँगे। ये इतने शक्तिशाली हो चुके हैं कि इनका विनाश करना किसी के लिए भी लगभग असंभव हो गया है। ये स्वयं ही एक-दूसरे को मार सकते हैं।’

बलराम की चिरसमाधि और लीला समेटने का निश्चय

बाद में बलराम भी यादवों के विषय में चर्चा करने कृष्ण के पास पहुँचे। बलराम ने कहा, ‘‘यादवों की दशा देखकर मैं बहुत दुखी हूँ। अपनी आँखों से यह सब होते मैं नहीं देख सकता। अब मेरे मन में इस भौतिक संसार में रहने की इच्छा पूरी तरह समाप्त हो गई है। कल मैं सूर्योदय के समय यह संसार छोड़ दूँगा और अपने धाम पहुँच जाऊँगा।’’ अगली सुबह अपने योगबल के प्रभाव से बलराम ने चिरसमाधि ले ली।

यह सत्य है कि सभी यादव कृष्ण के ही सगे-सम्बंधी थे। उनके बीच ही रहकर कृष्ण बड़े हुए थे। परंतु भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण को अब अपनी लीला समेटनी थी। वे सत्य से अपने नेत्र नहीं मूँद सकते थे। पृथ्वी पर अवतार लेने का उनका एकमात्र उद्देश्य शांति तथा धर्म की रक्षा करना था। उन्हें तो सदैव धर्म का ही पक्ष लेना था। धर्म की रक्षा के लिए पथ से भटक गए यादवों का विनाश होना भी आवश्यक था। इसलिए परस्पर झगड़ते हुए यादवों की रक्षा का कृष्ण ने कोई प्रयत्न भी नहीं किया। कुछ ही दिनों में सारे यादवों ने एक-दूसरे को मार डाला।

वन में ध्यान, शिकारी का तीर और बैकुंठ गमन

कृष्ण के अवतार का उद्देश्य अब पूरा हो चुका था। अधर्म की पराजय हो चुकी थी और धर्म पूर्ण रूप से विजयी हुआ था। इन परिस्थितियों में कृष्ण ने भी इस संसार को त्यागने का निश्चय किया। वे घने वन में चले गए और एक वृक्ष की छाया में बैठ गए। शीघ्र ही वे गहरे ध्यान में चले गए। संसार की उन्हें कोई सुधबुध न रही।

संयोग से उसी समय वहाँ से एक शिकारी गुजरा। कृष्ण के पैर में एक आँख का चित्र बना हुआ था। शिकारी ने उनका पैर दूर से देखा और उसे हिरन की आँख समझ बैठा। उसने अपना तीर उन पर चला दिया। वह तीर कृष्ण के पैर में प्रवेश कर गया। शिकारी भागता हुआ उस स्थान तक पहुँचा। वह तो यही सोच रहा था कि हिरन वहाँ मरा पड़ा होगा। लेकिन कृष्ण को घायल अवस्था में देखकर वह आश्चर्य और दुख के सागर में डूब गया। विषाद से उसका हृदय डूबने लगा। कृष्ण के पैरों पर पड़कर वह क्षमायाचना करने लगा। कृष्ण ने उसे ढाढ़स बँधाया और इस संसार को छोड़कर चले गए। कृष्ण अपने धाम बैकुंठ चले गए।

कृष्ण आज भी कण-कण में विद्यमान हैं

लेकिन वास्तविकता तो यह है कि कृष्ण सदा हमारे बीच में हैं। वे सर्वव्यापी हैं। विश्व के कण-कण में वे विद्यमान हैं। वैदिक साहित्य के माध्यम से कृष्ण आज भी हमें उपदेश देते हैं। जीवन में हम कैसे आचरण करें और धर्म के अनुसार कैसे कार्य करें, आज भी हमें कृष्ण ये सिखाते हैं। उनके द्वारा कही गई भगवद्गीता विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

भक्ति से जुड़ा संदेश: धर्म की रक्षा, क्षमा और प्रभु की सर्वव्यापकता

इस कथा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भगवान का हर कार्य धर्म की रक्षा के लिए होता है। कृष्ण यादवों के सगे-सम्बंधी थे और उन्हीं के बीच पले-बढ़े थे, फिर भी जब यादव अभिमान और अधर्म के पथ पर चले, तो प्रभु ने धर्म का पक्ष लिया। भक्त के लिए यह सीख है कि प्रभु को प्रिय वही है जो धर्म के मार्ग पर चलता है, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो।

गीता का उपदेश सुनते ही अर्जुन के सभी संदेह दूर हो गए और हृदय का दुख तिरोहित हो गया। जब मन किसी उलझन में डूबे, तब प्रभु की वाणी ही सबसे बड़ा सहारा बनती है। जो भक्त श्रद्धा से गीता का स्मरण करता है, उसे अर्जुन की तरह अपने कर्तव्य का मार्ग साफ़ दिखने लगता है।

कथा का सबसे मार्मिक क्षण वह है जब शिकारी ने भूल से कृष्ण के पैर में तीर चला दिया और फिर दुख और विषाद से भरकर उनके चरणों में गिर पड़ा। श्रीकृष्ण ने उसे दोष नहीं दिया, बल्कि ढाढ़स बँधाया। यह भगवान की असीम करुणा है कि जिसने अनजाने में कष्ट दिया, उसे भी प्रभु क्षमा और सांत्वना देकर विदा हुए।

कृष्ण का बैकुंठ गमन अंत नहीं, लीला का समापन है। शास्त्र कहते हैं और कथा भी बताती है कि कृष्ण सदा हमारे बीच हैं, कण-कण में विद्यमान हैं। जो भक्त उन्हें हर जगह देखता है, उसके लिए प्रभु कभी दूर नहीं जाते। गीता और वैदिक साहित्य के माध्यम से वे आज भी हमें जीने का मार्ग दिखाते हैं।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि जब मन दुविधा में फँसे, तब कर्म का मार्ग अपनाना चाहिए। अर्जुन अपने ही परिवार पर बाण चलाने से हिचक गए थे, पर गीता का उपदेश सुनकर वे पूरी तरह तैयार हो गए।

दूसरी सीख यह है कि शक्ति का अभिमान विनाश का कारण बनता है। यादव यह समझने लगे थे कि शक्ति में उनके समान कोई नहीं है, और अंत में वे आपस में ही लड़कर समाप्त हो गए।

तीसरी सीख यह है कि साधु-संतों का अपमान और नशे में उपद्रव अधर्म की ओर ले जाते हैं। यादवों ने साधुओं का अपमान शुरू किया और प्रभास में शराब पीकर झगड़ा किया, जिसका परिणाम उनका विनाश हुआ।

चौथी सीख यह है कि धर्म सबसे ऊपर है, चाहे अपने ही लोग अधर्म के पथ पर क्यों न हों। कृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए भटके हुए यादवों की रक्षा का प्रयत्न नहीं किया।

पाँचवीं सीख यह है कि जिसने अनजाने में भूल की हो, उसके प्रति क्षमा और करुणा रखनी चाहिए। शिकारी के क्षमा माँगने पर कृष्ण ने उसे ढाढ़स बँधाया।

छठी सीख यह है कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं और उनकी वाणी सदा हमारे साथ है। भगवद्गीता विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है और आज भी हमें सिखाती है कि जीवन में कैसे आचरण करें और धर्म के अनुसार कैसे कार्य करें।

कथा का सार

महाभारत में धर्म की विजय के बाद श्रीकृष्ण ने यादवों के विनाश को देखा, बलराम की चिरसमाधि के बाद वन में ध्यान लगाया और शिकारी के तीर के साथ अपने धाम बैकुंठ चले गए। पर कथा का अंतिम सत्य यही है कि कृष्ण सर्वव्यापी हैं, कण-कण में विद्यमान हैं और भगवद्गीता के माध्यम से आज भी हमें धर्म का मार्ग दिखाते हैं। श्रीकृष्ण की और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।