श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 44

कृष्ण का विदर्भ जाना: पार्वती मंदिर में रुक्मिणी की प्रार्थना और श्रीकृष्ण का रथ

जरासंध की सेना विदर्भ की ओर बढ़ी तो बलराम भी सेना लेकर कृष्ण के पीछे चल पड़े। देवी पार्वती के मंदिर में रुक्मिणी ने कृष्ण को ही पति रूप में माँगा और मंदिर से लौटते समय श्रीकृष्ण ने उसे अपने रथ पर बैठा लिया। पढ़ें पूरी कथा।

कृष्ण का विदर्भ जाना: पार्वती मंदिर में रुक्मिणी की प्रार्थना और श्रीकृष्ण का रथ
कृष्ण का विदर्भ जाना: पार्वती मंदिर में रुक्मिणी की प्रार्थना और श्रीकृष्ण का रथ — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

जरासंध ने अपने सहयोगी राजाओं को विदर्भ की ओर चलने का आदेश दिया तो बलराम चिंतित होकर सेना के साथ कृष्ण के पीछे चल पड़े। विदर्भ में रुक्मिणी ने देवी पार्वती के मंदिर में श्रीकृष्ण को ही पति रूप में माँगा, और मंदिर से बाहर आते ही कृष्ण ने उसे अपने रथ पर बैठाकर वहाँ से प्रस्थान कर लिया।

बलराम को जासूस की सूचना: जरासंध की सेना विदर्भ की ओर

दूसरी ओर बलराम के एक जासूस ने उनके पास आकर बताया, ‘‘स्वामी, जरासंध ने एक बैठक करके अपने अधीनस्थ राजाओं और सहयोगियों को विदर्भ की ओर चलने का आदेश दिया है। उसकी आज्ञा है कि वे सभी मिलकर रुक्मी और उसके परिवार की देखभाल करें। उसे लगता है कि हम उस मामले में हस्तक्षेप करने का प्रयास करेंगे।’’

यह समाचार सुनकर बलराम चिंतित हो गए क्योंकि कृष्ण अकेले ही विदर्भ की ओर प्रस्थान कर चुके थे। उन्होंने तुरंत अपने सेना प्रमुख को बुलवाया और उसे सेना तैयार करने का आदेश दिया। बलराम ने भी तत्काल ही विदर्भ की ओर प्रस्थान करने का निश्चय कर लिया था।

विदर्भ में रुक्मिणी की प्रतीक्षा और सुनंद की वापसी

उधर विदर्भ में रुक्मिणी की चिंता बढ़ती जा रही थी। वह बड़ी उत्सुकता से सुनंद के द्वारका से लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी। वह जानना चाहती थी कि कृष्ण ने उसके संदेश का क्या उत्तर दिया है। अपने महल की खिड़की पर बैठी वह सुनंद के वापस आने की प्रतीक्षा कर रही थी। आखिरकार उसकी दृष्टि द्वारका के मार्ग से लौटते सुनंद पर पड़ी। वह उस समय राजमहल में प्रवेश कर रहा था। रुक्मिणी ने तत्काल अपनी सभी सेविकाओं को छुट्टी दे दी और सुनंद के अपने पास आने की प्रतीक्षा करने लगी।

जल्दी ही सुनंद उसके पास आ गया। उसने बताया, ‘‘रुक्मिणी, तुम्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। सब कुछ हमारी योजना के अनुसार चल रहा है। कृष्ण विदर्भ की सीमा तक पहुँच चुके हैं। बलराम भी अपनी सेना लेकर उनके पीछे आ रहे हैं।’’

राजा भीष्मक द्वारा कृष्ण और बलराम का स्वागत

शीघ्र ही कृष्ण के आगमन की सूचना राजा भीष्मक के पास पहुँच गई। उन्होंने सेवकों को अतिथिगृह को सजाने का आदेश दिया। उनके लिए सभी प्रकार की सुविधाओं का प्रबंध कर दिया गया। फिर वह अपने साथियों के साथ कृष्ण के स्वागत-सत्कार के लिए महल के द्वार तक जा पहुँचे। उस समय तक बलराम भी विदर्भ पहुँच गए थे। राजा भीष्मक ने दोनों भाइयों का स्वागत-सत्कार किया और उन्हें अतिथिगृह में ले गए। मार्ग में कृष्ण की दृष्टि देवी पार्वती के उस मंदिर पर पड़ी, जिसकी चर्चा रुक्मिणी ने अपने पत्र में की थी। अतिथिगृह की ओर जाते हुए कृष्ण विदर्भ नगर की शोभा भी देख रहे थे।

देवी पार्वती के मंदिर में रुक्मिणी की प्रार्थना

उधर महल में राजकुमारी रुक्मिणी विवाह के पहले मंदिर जाने की तैयारी कर रही थी। अपनी सेविकाओं के साथ रुक्मिणी रथ पर सवार होकर मंदिर के लिए चल पड़ी। मार्ग में उसकी दृष्टि अपने प्रियतम कृष्ण को ही ढूँढ़ रही थी। जब वह मंदिर पहुँची तो उसने बहुत से योद्धाओं को अपने रथों पर सवार देखा जो वास्तव में जरासंध की सेना के सेनानी थे। रुक्मिणी तो कृष्ण के दर्शन के लिए व्याकुल थी। वह सोच रही थी, ‘मुझे इन सब लोगों के बीच श्रीकृष्ण कहीं नहीं दिख रहे हैं। लोग कहते हैं कि वे साँवले हैं, पीले वस्त्र पहनते हैं और उनके मुकुट में मोरपंख रहता है। मेरे प्रियतम, तुम कहाँ हो?’ वहाँ उपस्थित सभी नरेश रुक्मिणी की अप्रतिम सुंदरता देखकर मंत्रमुग्ध थे। सब यही चाह रहे थे कि रुक्मिणी उनकी पत्नी बन जाए।

मंदिर के अंदर रुक्मिणी ने देवी के चरण धोए और पुष्प अर्पित किए। उसने देवी के सामने अपना हृदय खोलकर रख दिया। वह प्रार्थना करती हुई बोली, ‘‘देवी, कृष्ण मेरे पति बनें। श्रीकृष्ण ही मेरे पति बनें। मेरा विवाह मात्र श्रीकृष्ण से हो।’’ पूजा करने के बाद रुक्मिणी मंदिर से बाहर आई। एक बार फिर मंदिर के बाहर मौजूद सभी लोगों की आँखें उसी पर केंद्रित हो गईं। लेकिन रुक्मिणी का ध्यान किसी की ओर नहीं था। वह तो अपने ही विचारों में खोई हुई चली जा रही थी। उस समय भी वह अपने सर्वस्व कृष्ण का ही ध्यान कर रही थी।

मंदिर के बाहर कृष्ण का मिलन और साँवली बिजली-सा रथ

तभी किसी ने पीछे से रुक्मिणी का हाथ पकड़ लिया। रुक्मिणी भौंचक्की रह गई। उसे समझ नहीं आया कि इस तरह सार्वजनिक रूप से उसे छूने का साहस कौन कर सकता है। उसने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि वह साँवले रंग का एक युवक था। वह बड़ी मधुर आवाज में बोला, ‘‘रुक्मिणी, पहचानो मुझे। मैं कृष्ण हूँ। मैं ही हूँ, जिसका तुम अभी तक इंतजार कर रही थीं।’’ रुक्मिणी को लगा जैसे वह स्वप्न देख रही हो। कृष्ण, जिनके वह सपने देखती थी, आज उसके इतने निकट उपस्थित थे! वे कितने सुंदर और आकर्षक थे! उनकी आवाज कितनी प्यारी थी! वह अपने प्रियतम को निहारती ही रह गई।

अगले ही क्षण कृष्ण ने रुक्मिणी को अपने रथ पर बैठा लिया। रुक्मिणी के रथ पर आते ही कृष्ण ने तेजी से रथ आगे को हाँका। वहीं पर मौजूद राजा यह देखते ही चिल्लाए, ‘‘अरे, यह तो कृष्ण है! इसे रोको। यह जाने न पाए!’’ लेकिन कृष्ण का रथ धूल उड़ाता हुआ दूर निकल गया। राजाओं को ऐसा लगा जैसे साँवली बिजली कौंधी हो और दूर चली गई हो।

भक्ति से जुड़ा संदेश: सच्ची प्रार्थना और प्रभु का स्वयं आना

इस कथा में भक्ति का सबसे सुंदर क्षण वह है जब रुक्मिणी मंदिर में देवी के सामने अपना हृदय खोलकर रख देती है। उसकी प्रार्थना में कोई दिखावा नहीं है, केवल एक ही माँग है कि श्रीकृष्ण ही उसके पति बनें। भक्ति का सार यही है कि भक्त की माँग, उसका ध्यान और उसका सर्वस्व एक ही इष्ट में समा जाए। ऐसी एकनिष्ठ प्रार्थना को ही भक्ति मार्ग में सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है।

कथा यह भी दिखाती है कि भक्त जब सच्चे मन से प्रभु को पुकारता है तो प्रभु स्वयं उसके पास चले आते हैं। जिस क्षण रुक्मिणी मंदिर से बाहर आई, उसी क्षण कृष्ण उसके निकट थे। रुक्मिणी चारों ओर राजाओं की भीड़ और उनकी निगाहों के बीच भी केवल कृष्ण का ध्यान कर रही थी। जो भक्त संसार के आकर्षणों के बीच भी अपना मन ईश्वर में टिकाए रखता है, उसे प्रभु का दर्शन अवश्य मिलता है।

बलराम का सेना लेकर कृष्ण के पीछे चल पड़ना और सुनंद का रुक्मिणी को आश्वासन देना यह भी सिखाता है कि भक्ति के मार्ग पर अकेलापन नहीं होता। भगवान के भक्त की सहायता के लिए परिवार, सच्चे सेवक और शुभचिंतक सब साथ खड़े हो जाते हैं। भक्त का काम है अपने विश्वास को अडिग रखना, शेष सब प्रभु की लीला से सध जाता है।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि जीवन की सबसे बड़ी चाह को ईश्वर के चरणों में सच्चे मन से रखना चाहिए। रुक्मिणी ने देवी के सामने अपना हृदय खोलकर रखा और उसका संकल्प पूरा होने की ओर बढ़ा।

दूसरी सीख यह है कि संसार की भीड़ और आकर्षणों के बीच भी मन को अपने लक्ष्य पर स्थिर रखना चाहिए। रुक्मिणी की सुंदरता पर सभी नरेश मोहित थे, पर उसका ध्यान किसी की ओर नहीं था।

तीसरी सीख यह है कि प्रतीक्षा और विश्वास के बाद ईश्वर की कृपा अवश्य मिलती है। रुक्मिणी चिंता में थी, पर सुनंद के आश्वासन और अपने विश्वास के सहारे उसने धैर्य रखा।

चौथी सीख यह है कि संकट की घड़ी में अपनों का साथ बहुत बड़ा सहारा होता है। जैसे बलराम ने कृष्ण को अकेला जानकर तुरंत सेना तैयार की, वैसे ही सच्चे सहयोगी कठिन समय में आगे बढ़कर साथ देते हैं।

कथा का सार

देवी पार्वती के मंदिर में रुक्मिणी की सच्ची प्रार्थना और श्रीकृष्ण के रथ का साँवली बिजली की तरह दूर निकल जाना इस कथा का भावपूर्ण पड़ाव है। यह कथा सिखाती है कि जब भक्त का मन एक ही ईश्वर में टिक जाता है तो प्रभु स्वयं उसकी पुकार का उत्तर देने आ जाते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।