श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 48

कृष्ण और शिशुपाल: राजसूय यज्ञ में अपमान, बुआ को दिया वचन और सुदर्शन चक्र

राजसूय यज्ञ में कृष्ण को सर्वप्रथम सम्मान मिलने पर शिशुपाल क्रोध से भर उठा और उन्हें अपशब्द कहने लगा। कृष्ण अपनी बुआ को दिए वचन के कारण उसके सौ अपराध क्षमा करने को बँधे थे। जब सीमा पूरी हुई, तो सुदर्शन चक्र ने शिशुपाल का अंत कर दिया। पढ़ें पूरी कथा।

कृष्ण और शिशुपाल: राजसूय यज्ञ में अपमान, बुआ को दिया वचन और सुदर्शन चक्र
कृष्ण और शिशुपाल: राजसूय यज्ञ में अपमान, बुआ को दिया वचन और सुदर्शन चक्र — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

जरासंध की मृत्यु के बाद शिशुपाल ने युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार कर ली, पर राजसूय यज्ञ में कृष्ण को सर्वप्रथम सम्मान मिलते देख वह क्रोध से भर उठा। कृष्ण अपनी बुआ को दिए वचन के कारण सौ अपराध क्षमा करने को बँधे थे, और जब वह सीमा पूरी हुई तो उन्होंने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का अंत कर दिया।

शिशुपाल को जरासंध की मृत्यु की सूचना

इस बीच शिशुपाल के गुप्तचरों ने उसे सूचना दी, ‘‘स्वामी, सम्राट जरासंध अब नहीं रहे। पांडव भीम ने मल्लयुद्ध में उनकी जीवनलीला समाप्त कर दी है।’’

यह समाचार सुनकर शिशुपाल का हृदय पीड़ा से भर उठा। गुप्तचर ने आगे बताया, ‘‘यद्यपि यह कार्य भीम का था, लेकिन इसके लिए वास्तविक रूप से कृष्ण ही उत्तरदायी था। उसी ने जरासंध की मृत्यु का रहस्य भीम को बताया।’’

‘‘भीम ने सम्राट जरासंध को मार डाला। अर्थात् मेरी माँ की बहन के बेटे ने ही उनकी हत्या कर दी! लेकिन भीम की जरासंध से भला क्या शत्रुता थी?’’ शिशुपाल ने पूछा।

तब गुप्तचर ने उसे पूरी बात कह सुनाई। शिशुपाल पूरे मामले पर गम्भीरता से विचार करने लगा। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की सूचना भी उसे मिल गई थी। उसने सोचा, ‘आने वाला समय युधिष्ठिर का ही है। वह एक शक्तिशाली सम्राट सिद्ध होगा। मेरे लिए उचित यही होगा कि मैं युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार कर लूँ। इस प्रकार मैं अपने सिंहासन पर बना रहूँगा।’

भीम का चेदि आगमन और राजसूय यज्ञ की तैयारी

युधिष्ठिर की ओर से दिग्विजय पर निकला भीम जब चेदि पहुँचा तो शिशुपाल ने स्वयं नगर के बाहर आकर उसका स्वागत किया। चेदि में अपने स्वागत-सत्कार से भीम को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह वहाँ ऐसी अपेक्षा नहीं कर रहा था। भीम ने चेदि में एक माह तक निवास भी किया।

भारतवर्ष के सभी राज्यों से अपनी अधीनता स्वीकार करवा के सभी पांडव भाई इंद्रप्रस्थ लौट आए। कुछ राज्य सहमति से ही उनके अधीन आ गए थे तो कुछ को उन्होंने अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया था। युधिष्ठिर ने पुरोहितों के परामर्श के अनुसार राजसूय यज्ञ के लिए एक दिन निश्चित कर लिया। यज्ञ की जोर-शोर से तैयारियाँ भी शुरू हो गईं। भारत के सभी राजाओं और ऋषियों को इस यज्ञ में आमंत्रित किया गया था। शिशुपाल भी इस यज्ञ में पहुँचा था। पुरोहितों के दिशानिर्देशन में युधिष्ठिर ने धार्मिक कर्मकांड आरम्भ किए। राजसूय यज्ञ की धार्मिक क्रियाविधि बहुत जटिल थी। यह कई दिनों तक चलती थी। एक दिन सोमरस तैयार किया गया जो इस प्रकार के आयोजनों में अनिवार्य था।

यज्ञ में सर्वप्रथम सम्मान: सहदेव का प्रस्ताव और कृष्ण की जय

फिर राजपुरोहित ने युधिष्ठिर से कहा, ‘‘राजन, अब आपको निर्णय करना है कि महान पुरुषों के इस समूह में आप सर्वप्रथम किसका सम्मान करना चाहेंगे?’’

पुरोहित की बात सुनकर युधिष्ठिर गम्भीर विचार में पड़ गए। वे तुरंत ये निर्णय नहीं कर सके कि यह सम्मान वे किसको दें। तभी सबसे छोटे पांडव सहदेव खड़े होकर बोले, ‘‘मेरे विचार से श्रीकृष्ण ही यह सम्मान पाने के योग्य हैं।’’

सभी राजाओं ने सहदेव की बात का समर्थन किया। तब युधिष्ठिर ने कृष्ण को ही सर्वप्रथम सम्मान प्रदान किए जाने की घोषणा की। फिर रीतियों के अनुसार युधिष्ठिर ने कृष्ण के चरण धोए और धोने में प्रयुक्त हुए उस जल को अपने भाइयों और द्रौपदी के मस्तक पर छिड़का। वहाँ उपस्थित सभी राजा और सामान्य जन ‘श्रीकृष्ण की जय हो’ का नारा लगा रहे थे।

शिशुपाल का क्रोध और कृष्ण की निंदा

यह सब देखकर कृष्ण से वैरभाव रखने वाले शिशुपाल को बहुत क्रोध आ रहा था। उसे यह सहन नहीं हो रहा था कि उसका सबसे बड़ा शत्रु इस प्रकार सम्मान प्राप्त करे। आखिर वह अपने स्थान पर खड़ा हो गया और उच्च स्वर में बोला, ‘‘मैं कहता हूँ यह नाटक बंद करो! क्या राजाओं और ऋषियों की इस सभा में कोई और राजा या ऋषि इस योग्य नहीं था कि उसे यह सम्मान दिया जाता? इतने सारे मनीषियों की उपस्थिति में इस ग्वाले को यह सम्मान दिया जा रहा है। मैं कहता हूँ यह ग्वाला लेशमात्र भी इस सम्मान के योग्य नहीं है।’’

वहाँ उपस्थित सभी लोग शिशुपाल की इस प्रकार की बातें सुनकर सन्न रह गए। शिशुपाल कहता जा रहा था, ‘‘गुणवान नरेशों की हत्या करने या कराने वाले इस कृष्ण को यह सम्मान कैसे दिया जा सकता है? अपने भाई के साथ यह ग्वाला विभिन्न प्रकार की अधार्मिक गतिविधियों में लिप्त रहता है। यह अपने लोगों के साथ ऐसे द्वीप में रहता है जहाँ न ब्राह्मण हैं और न ही वेदों का पठन-पाठन है। मुझे समझ नहीं आ रहा है कि धर्मराज कहलाने वाले युधिष्ठिर ने इस अयोग्य व्यक्ति को सर्वोच्च सम्मान देने की बात स्वीकार कैसे कर ली।’’

युधिष्ठिर सोच रहे थे, ‘श्रीकृष्ण इस विक्षिप्त व्यक्ति को रोक क्यों नहीं रहे?’

शिशुपाल का जन्म, आकाशवाणी और कृष्ण का वचन

वास्तव में कृष्ण अपने वचन से बँधे हुए थे, जो उन्होंने शिशुपाल की माता अर्थात् अपनी बुआ को दिया था।

शिशुपाल चेदि नरेश दमघोष का पुत्र था। जब शिशुपाल अपनी माँ के गर्भ में आया तो राजा दमघोष और उनकी रानी अत्यंत प्रसन्न हुए। कितने ही देवी-देवताओं की उपासना करने और व्रत-उपवास करने के बाद संतान प्राप्त करने की उनकी अभिलाषा पूरी हो रही थी। लेकिन जब बालक का जन्म हुआ तो उनकी आशाओं पर पानी फिर गया। रानी ने जिस पुत्र को जन्म दिया उसके चार हाथ और तीन आँखें थीं। अपने शिशु को देखकर राजा दमघोष और उनकी पत्नी घबरा गए। वे बड़े दुखी हुए।

राजा दमघोष और रानी अपने पुत्र को अशुभ समझकर त्यागने ही जा रहे थे कि तभी आकाशवाणी हुई, ‘‘इस बालक की मृत्यु एक महान विभूति के हाथों होगी।’’

‘‘वह महान विभूति कौन होगा?’’ रानी ने आकाशवाणी से ही पूछा, ‘‘मुझे इसका ज्ञान कैसे होगा?’’

आकाशवाणी ने कहा, ‘‘जिसकी गोद में बच्चे को रखते ही उसकी तीसरी आँख और अतिरिक्त बाँहें गायब हो जाएँ, समझ लेना कि वही तुम्हारे पुत्र का वध करने वाला होगा।’’

इस घटना के कुछ दिनों बाद कृष्ण और बलराम नवजात शिशु को देखने के लिए चेदि गए, क्योंकि चेदि की रानी उनकी बुआ थीं। रानी अपने शिशु को कृष्ण की गोद में रखने ही जा रही थी कि तभी उसकी तीसरी आँख गायब हो गई। अपने पुत्र के मुख को सामान्य हुआ देखकर रानी बड़ी प्रसन्न हुई। उसने शिशु को कृष्ण की गोद में रख दिया। उसी क्षण उसकी अतिरिक्त बाँहें भी गिर गईं।

कुछ क्षणों के लिए रानी प्रसन्न हो उठी। लेकिन फिर उसे याद आ गया कि आकाशवाणी ने बच्चे का क्या भविष्य बताया था। वह याद करते ही उसका पूरा शरीर काँपने लगा। वह काँपते स्वरों में कृष्ण से बोली, ‘‘कृष्ण, क्या तुम ही मेरे बच्चे को मारोगे? हे भगवान, मैं क्या करूँ? मैंने तो ये कभी सोचा ही नहीं था।’’

फिर वह हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण से बोली, ‘‘मुझे वचन दो कि तुम मेरे पुत्र के अपराध क्षमा कर दोगे।’’

कृष्ण ने उत्तर दिया, ‘‘आपकी खातिर मैं उसके सौ अपराधों को क्षमा कर दूँगा। अब दुख त्यागकर प्रसन्न हो जाइए।’’

सौ अपराध पूरे होने पर सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का अंत

यही कारण था कि युधिष्ठिर के यज्ञ में कृष्ण ने शिशुपाल को अभी तक मारा नहीं था। वे उन सभी अपशब्दों को गिन रहे थे, जिनका प्रयोग शिशुपाल उनके लिए कर रहा था। लेकिन पांडव अपने प्रिय और आराध्य श्रीकृष्ण का यह अपमान बर्दाश्त नहीं कर सके। अपनी तलवारें म्यान से खींचकर वे शिशुपाल की ओर दौड़े।

यह देखकर शिशुपाल चिल्लाया, ‘‘अरे क्षत्रियों, मुझे तुम्हारे क्षत्रिय होने पर संदेह होता है। एक ग्वाले के लिए तुमने अपनी तलवारें निकाल ली हैं! धिक्कार है तुम्हारे क्षत्रिय होने पर!’’

तभी कृष्ण अपने आसन से खड़े हो गए। उनके हाथों में सुदर्शन चक्र प्रकट हो गया। वे वहाँ उपस्थित सभी व्यक्तियों से उच्च स्वर में बोले, ‘‘कोई भी शिशुपाल को मारने का प्रयास न करे। इसकी मृत्यु मेरे ही हाथों से लिखी है। अपनी बुआ को दिए वचन के अनुसार मुझे शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा करने थे। यही कारण है कि मैं अभी तक इसे नहीं मार रहा था। परंतु अब इसका जीवन समाप्त होने का समय आ गया है।’’

कृष्ण के ये वचन सुनकर शिशुपाल भय से काँपने लगा। अगले ही क्षण कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र छोड़ दिया जिसने शिशुपाल का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। इस प्रकार कृष्ण ने धरती से एक और दुष्ट व्यक्ति का बोझ कम कर दिया।

भक्ति से जुड़ा संदेश: प्रभु का वचन, क्षमा और न्याय

इस कथा में भक्ति का सबसे गहरा संदेश कृष्ण के वचन-पालन में है। बुआ को दिया हुआ वचन उन्होंने भरी सभा में भी निभाया, जबकि शिशुपाल उनका अपमान करता रहा और युधिष्ठिर तक सोच में पड़ गए कि कृष्ण उसे रोक क्यों नहीं रहे। प्रभु अपने वचन को सबसे ऊपर रखते हैं, और जो भक्त भी अपने वचन और मर्यादा का पालन करता है, वह प्रभु के स्वभाव के निकट पहुँचता है।

कृष्ण की सहनशीलता भी भक्त के लिए आदर्श है। वे अपशब्दों को चुपचाप गिनते रहे, उत्तर नहीं दिया, और सभा की मर्यादा भंग नहीं होने दी। जब पांडव तलवारें लेकर दौड़े, तब भी उन्होंने कहा कि कोई शिशुपाल को मारने का प्रयास न करे। यह धैर्य सिखाता है कि क्रोध का उत्तर तुरंत क्रोध से नहीं, विवेक और समय की प्रतीक्षा से देना चाहिए।

पांडवों की भक्ति भी इस कथा में झलकती है। वे कृष्ण को अपना प्रिय और आराध्य मानते थे और उनके अपमान को सहन नहीं कर सके। सच्चे भक्त के लिए अपने इष्ट का सम्मान सबसे ऊपर होता है। साथ ही कथा यह भी याद दिलाती है कि ईर्ष्या और अहंकार से भरा मन सम्मान के योग्य को भी अपमानित करने लगता है, और अंत में वही उसके पतन का कारण बनता है।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि दिया हुआ वचन हर परिस्थिति में निभाना चाहिए। कृष्ण ने बुआ को दिए वचन के कारण शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा किए।

दूसरी सीख यह है कि क्षमा और सहनशीलता कमजोरी नहीं, महानता का लक्षण है, पर हर सीमा के बाद न्याय आवश्यक हो जाता है। जब वचन की सीमा पूरी हुई तो कृष्ण ने कर्तव्य निभाया।

तीसरी सीख यह है कि ईर्ष्या मनुष्य को अंधा बना देती है। शिशुपाल को कृष्ण का सम्मान सहन नहीं हुआ और वह भरी सभा में उन्हें अपशब्द कहने लगा।

चौथी सीख यह है कि जिस व्यक्ति का आचरण सत्य और सम्मान के योग्य हो, उसे चुनना ही सही निर्णय है। सहदेव ने सबसे पहले कृष्ण का नाम सुझाया और सभी राजाओं ने समर्थन किया।

पाँचवीं सीख यह है कि अपमानजनक शब्दों का ढेर किसी का मूल्य कम नहीं करता, बल्कि बोलने वाले के स्वभाव को ही प्रकट करता है। कृष्ण शांत रहे और शिशुपाल के अपने शब्द उसके अंत का कारण बन गए।

कथा का सार

राजसूय यज्ञ में कृष्ण को सम्मान मिलते देख शिशुपाल ने अपमान की सीमा पार कर दी, और बुआ को दिए वचन के सौ अपराध पूरे होते ही सुदर्शन चक्र ने उसका अंत कर दिया। यह कथा सिखाती है कि प्रभु वचन के पक्के, क्षमाशील और न्यायप्रिय हैं, और अहंकार तथा द्वेष में डूबा मनुष्य अपने ही कर्मों से अपना पतन बुला लेता है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।