श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 41

कृष्ण और रुक्मिणी: रुक्मिणी के हृदय में कृष्ण और जरासंध की प्रतिशोध-तैयारी

कंस के वध का समाचार विदर्भ पहुँचा, तो रुक्मी ने कृष्ण को ग्वाला कहा, पर रुक्मिणी ने साफ कहा कि कृष्ण मथुरा के राजवंश से हैं। उसी दिन से कृष्ण रुक्मिणी के हृदय के नायक बन गए, जबकि जरासंध प्रतिशोध की नई तैयारी में जुट गया। पढ़ें पूरी कथा।

कृष्ण और रुक्मिणी: रुक्मिणी के हृदय में कृष्ण और जरासंध की प्रतिशोध-तैयारी
कृष्ण और रुक्मिणी: रुक्मिणी के हृदय में कृष्ण और जरासंध की प्रतिशोध-तैयारी — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

कंस की मृत्यु का समाचार जब विदर्भ पहुँचा तो वहाँ कृष्ण की चर्चा होने लगी। रुक्मी जहाँ कृष्ण को ग्वाला कहता रहा, वहीं उसकी बहन रुक्मिणी के हृदय में साँवले-सलोने कृष्ण बस गए।

उग्रसेन फिर राजा बने और रुक्मी की हैरानी

कंस की मौत के बाद कृष्ण और बलराम ने उसके पिता उग्रसेन अर्थात् अपने नाना को दोबारा मथुरा का शासक बना दिया। जिस मैदान में कृष्ण ने कंस और उसके पहलवानों को मौत के घाट उतारा था, वहाँ विदर्भ का राजकुमार रुक्मी भी उपस्थित था। बालक कृष्ण के हाथों इतने बलशाली और कुशल योद्धाओं को मारे जाते देखकर उसे घोर आश्चर्य हुआ।

रुक्मी ने विदर्भ पहुँचकर सुनाया समाचार

यह समाचार अपने पिता और परिवार के सदस्यों को सुनाने के लिए रुक्मी तेजी से विदर्भ लौट गया। वहाँ उसने अपने पिता भीष्मक को सारा समाचार कह सुनाया। सारी बात सुनकर उसके परिजनों को भी बड़ा आश्चर्य हुआ। रुक्मी ने अपने पिता से कहा, ‘‘मैं समझता हूँ कि कृष्ण ही वासुदेव और देवकी का आठवाँ पुत्र है। कंस ने वासुदेव और देवकी को अपनी कैद में रखा था, इसके बाद भी वह कृष्ण और बलराम के जन्म को रोक नहीं सका। उसने जन्म लिया और ग्वालों के बीच रहकर पला-बढ़ा।’’

रुक्मिणी का साफ दृष्टिकोण: कृष्ण ग्वाले नहीं, राजवंश के हैं

रुक्मी की बहन रुक्मिणी साफ-साफ बात कहने वाली लड़की थी। वह अपना दृष्टिकोण सबके सामने रखती हुई बोली, ‘‘कृष्ण कोई ग्वाले नहीं हैं। वे मथुरा के राजवंश से संबंध रखते हैं।’’ इस पर रुक्मी क्रोधित होकर बोला, ‘‘रुक्मिणी, उस ग्वाले ने मेरे मित्र को मार डाला और तुम कह रही हो कि वह राजवंश से संबंध रखता है।’’

रुक्मिणी बोली, ‘‘भैया, तुम कभी स्वीकार नहीं करोगे कि कंस राजा बनने लायक नहीं था। वह एक निरंकुश शासक था और अपनी प्रजा पर अत्याचार करता था। मथुरा की जनता उसके शासनकाल में सुखी नहीं थी। उसने अपने पिता को कारावास में डालकर राज्य पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया था।’’

मथुरा का राजा कौन और कृष्ण अब कहाँ हैं?

भीष्मक बोले, ‘‘मुझे लगता है कि अब कृष्ण मथुरा का राजा बनेगा।’’

‘‘नहीं पिताजी,’’ रुक्मी बीच में बोला, ‘‘उसने राजा बनने से इंकार कर दिया है। उसने उग्रसेन को ही दोबारा राजा बना दिया है।’’

‘‘अब कृष्ण कहाँ हैं?’’ रुक्मिणी ने पूछा, ‘‘क्या वे फिर से वृंदावन में रहने के लिए नंद के साथ चले गए?’’

‘‘नहीं, अभी वह ग्वाला मथुरा में रुका हुआ है,’’ रुक्मी हँसता हुआ बोला, ‘‘वह वहीं रहकर धर्मशास्त्रों और शासनोपयोगी विद्याओं का ज्ञान प्राप्त करेगा।’’

जरासंध का दुख और प्रतिशोध की तैयारी

‘‘कंस के मारे जाने पर जरासंध की क्या प्रतिक्रिया थी?’’ भीष्मक ने पूछा।

‘‘अपनी पुत्रियों को सफेद कपड़ों में देखकर महाराज जरासंध के दुख का पार नहीं है। वे अपने दामाद की मौत का प्रतिशोध लेने के लिए कमर कस चुके हैं। इस कार्य के लिए उन्होंने मुझसे और अपने अन्य सभी सहयोगियों से सहायता माँगी है। मैं अभी जाकर देखता हूँ कि हमारी सेना युद्ध के लिए तैयार है या नहीं।’’ यह कहते हुए रुक्मी कमरे से बाहर निकल गया।

रुक्मिणी के हृदय के नायक बने साँवले-सलोने कृष्ण

रुक्मिणी अब भी कृष्ण के बारे में ही सोच रही थी। साँवले-सलोने कृष्ण रुक्मिणी के हृदय के नायक बन गए थे। वह सोच रही थी, ‘मैं श्रीकृष्ण के बारे में ज्यादा से ज्यादा जान लेना चाहती हूँ। लेकिन कैसे?’

विवाह की चर्चा रुकी और जरासंध की सत्रह पराजयें

दूसरी ओर राजा भीष्मक और रानी दूसरे कमरे में जाकर रुक्मिणी और कृष्ण के विवाह के सम्बंध में चर्चा कर रहे थे। लेकिन उनकी विवाह सम्बंधी चर्चा आगे नहीं बढ़ी। बहुत दिनों तक मामला वहीं रुका रहा। इस बीच जरासंध ने अपने साथियों की मदद से अपने दामाद कंस की मौत का प्रतिशोध कृष्ण और बलराम से लेने के बार-बार प्रयास किए। लेकिन हर बार उसे मुँह की खानी पड़ी। हर बार वह अपनी ओर से पूरी तैयारी करके जाता, लेकिन अंत में उसे पराजय का मुख देखना पड़ता। लगातार सत्रह पराजयों के कारण राजाओं के बीच जरासंध की छवि भी लगातार गिरती जा रही थी। इस बार जरासंध ने अगले युद्ध के लिए जमकर तैयारी करने का निश्चय किया। वह तैयारी में पूरी तरह जुट गया। इस बार वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था।

भक्ति से जुड़ा संदेश: कृष्ण की कथा सुनने से जागता है प्रेम

इस कथा में रुक्मिणी की भक्ति का आरंभ दिखता है। रुक्मिणी ने कृष्ण को देखा नहीं था, केवल उनके बारे में सुना था। फिर भी उनकी कथा सुनते ही कृष्ण उसके हृदय के नायक बन गए और वह उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहने लगी। भक्ति की शुरुआत प्रायः भगवान की लीलाओं और गुणों को सुनने से ही होती है।

रुक्मिणी ने अपने भाई के सामने भी निर्भय होकर सच कहा कि कृष्ण ग्वाले नहीं, राजवंश के हैं और कंस प्रजा पर अत्याचार करने वाला शासक था। जिसके मन में भगवान का प्रेम होता है, वह सत्य कहने से डरता नहीं।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि सत्य बात को निर्भय होकर और शालीनता से कहना चाहिए। रुक्मिणी ने भाई के क्रोध के सामने भी साफ कहा कि कंस अत्याचारी शासक था।

दूसरी सीख यह है कि किसी के विषय में राय बनाने से पहले उसके कर्म और गुण देखने चाहिए। रुक्मी कृष्ण को केवल ग्वाला कहता रहा, जबकि रुक्मिणी ने उनके कर्मों और वंश को पहचाना।

तीसरी सीख यह है कि भगवान की कथा और गुणों का श्रवण हृदय में भक्ति जगाता है। कृष्ण की वीरता और लीला की बातें सुनकर रुक्मिणी का मन उन्हीं में रम गया।

चौथी सीख यह है कि बार-बार पराजित होने पर भी जो अपना अहंकार नहीं छोड़ता, उसकी स्थिति और गिरती जाती है। जरासंध सत्रह बार हारा, पर प्रतिशोध की आग में फिर भी युद्ध की तैयारी करता रहा।

पाँचवीं सीख यह है कि अच्छे कार्यों के लिए धैर्य रखना चाहिए। रुक्मिणी और कृष्ण के विवाह की चर्चा बहुत दिनों तक रुकी रही, पर रुक्मिणी का मन कृष्ण से जुड़ा रहा।

कथा का सार

कृष्ण और रुक्मिणी की यह कथा रुक्मिणी के हृदय में कृष्ण-प्रेम के जागने की शुरुआत है, जबकि दूसरी ओर जरासंध प्रतिशोध की आग में जल रहा है। यह कथा सिखाती है कि भगवान की कथा सुनने से भक्ति जागती है और सत्य बोलने का साहस मिलता है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।