श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 57

कृष्ण और दानव मुर का वध: प्राग्ज्योतिषपुर की कथा

नरकासुर की नगरी में कृष्ण ने सारी बाधाएँ पार कीं और पाँच सिरों वाले दानव मुर का अंत किया। पढ़ें पूरी कथा।

कृष्ण और दानव मुर का वध: प्राग्ज्योतिषपुर की कथा
कृष्ण और दानव मुर का वध: प्राग्ज्योतिषपुर की कथा — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

नरकासुर के अत्याचार से देवता भी त्रस्त थे। उसकी नगरी प्राग्ज्योतिषपुर इतनी सुरक्षित मानी जाती थी कि उसे जीतना देवताओं के लिए भी असंभव लगता था। फिर भी श्रीकृष्ण सत्यभामा को साथ लेकर गरुड़ पर सवार होकर वहाँ पहुँचे और एक-एक करके सारी बाधाओं को पार कर गए।

इंद्र की चेतावनी

कृष्ण ने सत्यभामा को गरुड़ पर आगे बैठाया और स्वयं उनके पीछे बैठे। चलते समय इंद्र ने उन्हें सावधान किया कि प्राग्ज्योतिषपुर को जीतना देवताओं के लिए भी कठिन है। यह नगर पर्वतों, जल, अग्नि और वायु की दीवारों से घिरा है, और नरकासुर के महल के द्वार पर पाँच सिरों वाला दानव मुर पहरा देता है।

इंद्र की बात सुनकर कृष्ण केवल मुस्कुराए। उनके संकेत पर गरुड़ आकाश में ऊँचा उठा और नगर की ओर बढ़ चला।

पर्वत, जल और अग्नि की दीवारें

प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचते ही गरुड़ की चोंच एक कठोर चट्टान से टकराई। चारों ओर ऐसे पर्वत खड़े थे जिन्हें पार करना किसी के लिए संभव नहीं था। कृष्ण ने अपनी गदा के एक ही प्रहार से उन पर्वतों को चूर-चूर कर दिया।

इसके बाद उन पर मायावी अस्त्रों की वर्षा होने लगी, जिन्हें कृष्ण ने दिव्य बाणों से निष्फल कर दिया। आगे जल की दीवार मिली, जिसे उन्होंने आग्नेयास्त्र से नष्ट किया। फिर अग्नि की दीवार आई, जिसे वरुणास्त्र से शांत कर दिया। इस तरह सारी बाधाएँ लाँघकर वे नरकासुर की राजधानी पहुँच गए।

सोते हुए मुर को शंखनाद से जगाना

महल के बाहर दानव मुर गहरी नींद में सो रहा था। कृष्ण ने सोचा कि सोते हुए शत्रु पर प्रहार करना उचित नहीं, इसलिए पहले उसे जगाना चाहिए। उन्होंने अपना विजयशंख बजाया।

शंख की गूँज से मुर चौंककर उठ बैठा। आकाश में गरुड़ पर सवार कृष्ण को देखकर उसने ललकारा कि नरकासुर तक पहुँचने से पहले उसे उसका सामना करना होगा।

कृष्ण और मुर का युद्ध

मुर ने अपना चमकता त्रिशूल कृष्ण पर फेंका। यह वार इतना प्रचंड था कि बड़े-बड़े राजा और देवता भी इसका सामना नहीं कर पाते थे। पर कृष्ण ने एक दिव्य बाण से उस त्रिशूल को बीच रास्ते में ही तीन टुकड़ों में काट दिया। क्रोध से काँपते मुर के पाँचों मुखों को कृष्ण ने बाणों से भर दिया, जिससे उसका बोलना भी बंद हो गया।

फिर मुर ने गदा घुमाकर फेंकी। कृष्ण ने गदा का उत्तर गदा से दिया। दोनों के टकराने से भयंकर विस्फोट हुआ और मुर की गदा टुकड़े-टुकड़े हो गई। उस वज्र जैसी ध्वनि से नरकासुर की भी नींद टूट गई। खिड़की से बाहर झाँककर उसने मुर को कृष्ण से लड़ते देखा और आश्चर्य में पड़ गया।

सुदर्शन चक्र से मुर का अंत

अंत में मुर ने अपनी पूरी शक्ति जुटाकर फिर आक्रमण किया। सत्यभामा को निश्चिंत रखने के लिए कृष्ण ने एक बाँह उनके कंधों पर रखी और दूसरे हाथ की उँगली उठाई, जिस पर सुदर्शन चक्र घूमने लगा। उँगली के इशारे से चक्र चला और पल भर में मुर के पाँचों सिर धड़ से अलग हो गए।

अपने पिता का यह अंत देखकर मुर के पाँच पुत्रों ने गदाएँ और तलवारें लेकर कृष्ण पर धावा बोला, पर कृष्ण ने उन सभी को भी शीघ्र ही परलोक पहुँचा दिया। इसी कथा के कारण कृष्ण का एक नाम मुरारी भी प्रसिद्ध हुआ।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि अधर्म चाहे कितनी भी ऊँची दीवारों के पीछे सुरक्षित लगे, धर्म और सत्य के सामने वह टिक नहीं पाता। दूसरी सीख कृष्ण के आचरण में है: वे शक्तिशाली होकर भी शांत रहे और शत्रु को सोते हुए नहीं मारा। शक्ति के साथ मर्यादा का यह संतुलन ही सच्ची वीरता है।

तीसरी बात यह कि कृष्ण ने सत्यभामा को अपने साथ रखा और युद्ध के बीच भी उन्हें आश्वस्त किया। यह सिखाता है कि संकट में अपनों को साथ रखना और उनका भरोसा बनाए रखना भी नेतृत्व का हिस्सा है।

कथा का सार

मुर वध की यह कथा नरकासुर पर कृष्ण की विजय की भूमिका है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।