श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 24

कृष्ण और ब्राह्मण स्त्रियाँ: यज्ञ के भोजन की कथा

भूखे गोपों को यज्ञ करते ब्राह्मणों ने खाली हाथ लौटा दिया, पर उनकी पत्नियाँ सब कुछ भूलकर कृष्ण को अपने हाथों से भोजन कराने दौड़ पड़ीं। पढ़ें श्रद्धा और भक्ति की यह सुंदर कथा।

कृष्ण और ब्राह्मण स्त्रियाँ: यज्ञ के भोजन की कथा
कृष्ण और ब्राह्मण स्त्रियाँ: यज्ञ के भोजन की कथा — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

एक दिन चरागाह में घूमते हुए कृष्ण, बलराम और गोपों को तेज भूख लगी। यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों ने उन्हें भोजन नहीं दिया, लेकिन उन्हीं ब्राह्मणों की पत्नियों की भक्ति ने कृष्ण को भोजन कराने का सौभाग्य पा लिया।

भूखे गोप और कृष्ण की सलाह

एक दिन कृष्ण और बलराम हमेशा की तरह गोपों और गौओं के साथ चरागाह में घूम रहे थे। दोपहर तक उनको तेज भूख लग आई। अपना भोजन तो वे काफी देर पहले ही कर चुके थे। अब वे जंगल में फलदार पेड़ों को तलाशने लगे, लेकिन जंगल के उस हिस्से में फलों का कोई पेड़ नहीं था। भूख के मारे गोपों की हालत खराब हो रही थी। उन्होंने अपनी स्थिति के विषय में कृष्ण को बताया। कृष्ण ने पास में ही कुछ ब्राह्मण परिवारों को यज्ञ करते हुए देखा था। वे उनसे बोले, “यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर कुछ ब्राह्मण यज्ञ कर रहे हैं। तुम लोग उनसे जाकर कहो कि कृष्ण और बलराम ने तुम्हें भेजा है। वे लोग निश्चय ही तुम्हें भोजन प्रदान करेंगे।”

ब्राह्मणों ने गोपों को खाली हाथ लौटाया

गोप तुरंत उस स्थान की ओर चल पड़े जहाँ यज्ञ हो रहा था। वहाँ विभिन्न देवताओं को स्मरण करके हवनकुंड में आहुतियाँ डाली जा रही थीं। एक गोप ब्राह्मणों के पास जाकर बोला, “कृष्ण और बलराम ने हमें आप लोगों के पास कुछ भोजन पाने के लिये भेजा है। हम लोग इस समय बहुत भूखे हैं। कृपया हमें थोड़ा भोजन देने की कृपा करें जिससे हम अपना पेट भर सकें।” लेकिन ब्राह्मणों ने उन्हें भला-बुरा कहते हुए खाली हाथ ही वहाँ से भगा दिया। गोप कृष्ण और बलराम के पास लौट आए और उन्हें वह सब बता दिया जो ब्राह्मणों के आश्रम में हुआ था। ब्राह्मणों के व्यवहार से गोपों को बहुत आघात पहुँचा था।

ब्राह्मण स्त्रियों की श्रद्धा और कृष्ण दर्शन की इच्छा

उनकी पूरी बात सुनकर कृष्ण ने उनसे कहा, “इस बार तुम लोग ब्राह्मणों की पत्नियों के पास जाओ। वे लोग तुम्हें कुछ न कुछ खाने को अवश्य देंगी।” यज्ञ पूर्ण होने के बाद ब्राह्मण स्त्रियाँ अपने पतियों को भोजन कराने की तैयारी कर रही थीं। वे तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान बना रही थीं। जब गोपों ने उनके पास आकर यह बताया कि कृष्ण और बलराम ने उन्हें अपना पेट भरने के लिए उनके पास भेजा है तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वे अपने पतियों, बच्चों और यहाँ तक कि खुद को भी भूल गईं। उनके मन में श्रीकृष्ण के दर्शन करने और उन्हें खुद अपने हाथों से भोजन कराने की तीव्र इच्छा हो आई। उस समय तक साँवले-सलोने कृष्ण की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी। वे सुनहरी रेशमी धोती पहनने वाले और बालों में मोरपंख लगाने वाले बालक कृष्ण को देखकर अपना जीवन धन्य करना चाहती थीं। वे प्रत्यक्ष में श्रीकृष्ण की पूजा करना चाहती थीं। अपने मन में तो वे ब्राह्मण स्त्रियाँ श्रीकृष्ण की उपासना करती ही थीं।

पतियों के मना करने पर भी कृष्ण के पास चल पड़ीं स्त्रियाँ

ब्राह्मण स्त्रियों ने गोपों से उस स्थान का पता पूछ लिया जहाँ उस समय कृष्ण और बलराम विराजमान थे। फिर वे तेजी से घरों से निकलकर उस स्थान की ओर चल पड़ीं। गोप भी उनके साथ ही चल दिए। यह सब देखकर ब्राह्मण बहुत नाराज हुए। उन्होंने अपनी पत्नियों को कृष्ण के पास जाने से मना किया, लेकिन पत्नियों ने उनकी बात अनसुनी कर दी। वे गोपों के साथ उसी मार्ग पर आगे बढ़ती रहीं।

कृष्ण के दर्शन और अपने हाथों से भोजन

जल्दी ही वे उस पेड़ तक जा पहुँचीं, जिसकी छाया में कृष्ण और बलराम बैठे हुए थे। कृष्ण का सौंदर्य तो उनकी कल्पना से भी परे था। उस दिव्य सौंदर्य को यदि कोई एक बार देख लेता तो देखता ही रह जाता था। ब्राह्मण स्त्रियों ने दोनों भाइयों को अपने हाथों से भोजन कराना शुरू किया। जैसे-जैसे कृष्ण उनके दिए कौर खाते, उन्हें ऐसा अनुभव होता जैसे उनके मनोमस्तिष्क में दिव्य शांति प्रविष्ट करती जा रही हो। उनके मन में अपने परिवार के पास लौटकर जाने की इच्छा पूरी तरह समाप्त हो गई। कृष्ण के पैरों पर गिरकर वे बोलीं, “हमें अपने चरणों में ही रहने की जगह दे दीजिए। हमारा जीवन धन्य हो जाएगा। अब हम वापस नहीं जाना चाहतीं। भला आपके दर्शन करके भवसागर में कौन लौटना चाहेगा?”

कृष्ण का उपदेश: घर में रहकर भी हो सकती है भक्ति

उनकी बात सुनकर कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले, “मैं जानता हूँ कि आप लोगों की श्रद्धाभक्ति ही आपको यहाँ खींच लाई है। आप लोगों के मन में मेरे लिए जो प्रेम है, वह शुद्ध और पवित्र है। मेरे दर्शन तो आप लोगों ने कर ही लिए हैं। अब आपको अपने पतियों के पास लौट जाना चाहिए। भक्ति के लिए घर-परिवार छोड़ना आवश्यक नहीं है। अपने घर में रहकर भी ईश्वर की भक्ति की जा सकती। आप लोगों के पतियों ने जो यज्ञ किया है, उसका फल उन्हें तब तक नहीं मिलेगा जब तक आप लोग उनके साथ नहीं होंगी।”

कृष्ण की बात सुनकर एक ब्राह्मण स्त्री ने कहा, “हे कृष्ण, अब हमें वापस जाने को मत कहिए। हम सब कुछ छोड़कर आपके पास चली आई हैं। अब हम सब आपकी ही शरण में हैं। वैसे भी अब हमारे पति हमें स्वीकार नहीं करेंगे।” कृष्ण हँसकर बोले, “कोई भी तुम्हें अस्वीकार नहीं करेगा। यह मेरा आश्वासन है।”

ब्राह्मणों का पछतावा

फिर वे ब्राह्मण स्त्रियाँ अपने आश्रम को लौट गईं। आश्चर्य कि कृष्ण के पास जाने के संदर्भ में उनके पतियों ने उनसे एक शब्द भी नहीं कहा। वे पहले की तरह अपने यज्ञ में जुटे रहे। ब्राह्मणों को गोपों को बिना कुछ खिलाए-पिलाए वापस भेज देने का बड़ा पछतावा हो रहा था। इससे भी ज्यादा दुख उन्हें इस बात का था कि उन्होंने गोपों के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया था। वे एक-दूसरे से कह रहे थे, “हमारा ज्ञान बेकार है। हमने स्वयं श्रीकृष्ण के साथियों का अपमान किया। हमसे अच्छी तो हमारी पत्नियाँ हैं, जिन्होंने ज्ञान न होने के बाद भी श्रीकृष्ण के दर्शन कर लिये। श्रीकृष्ण के प्रति उनका प्रेम अतुलनीय है। हम धन्य हैं कि हमें ऐसी पत्नियाँ मिलीं।” इस प्रकार वे ब्राह्मण अपने किए पर पछतावा प्रकट कर रहे थे।

गोपियों के प्रेम से और स्वादिष्ट हुए पकवान

दूसरी ओर कृष्ण और बलराम गोपों के साथ ब्राह्मणों की पत्नियों द्वारा लाए गए स्वादिष्ट पकवानों का आनंद उठा रहे थे। गोपियों के प्रेम की सुगंध ने उन पकवानों को और भी स्वादिष्ट बना दिया था।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि भक्ति के लिए घर-परिवार छोड़ना आवश्यक नहीं है। कृष्ण ने स्वयं ब्राह्मण स्त्रियों से कहा कि अपने घर में रहकर भी ईश्वर की भक्ति की जा सकती है।

दूसरी सीख यह है कि ज्ञान का अभिमान व्यर्थ है। यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों ने भूखे गोपों का अपमान किया और बाद में पछताए, जबकि उनकी पत्नियों ने बिना शास्त्र-ज्ञान के, केवल प्रेम और श्रद्धा से कृष्ण को पा लिया।

तीसरी सीख यह है कि प्रेम से परोसा गया भोजन सबसे स्वादिष्ट होता है। गोपियों के प्रेम की सुगंध ने पकवानों को और भी स्वादिष्ट बना दिया था।

कथा का सार

ब्राह्मण स्त्रियों की निश्छल भक्ति ने कृष्ण को भोजन कराने का सौभाग्य पाया और उनके पतियों को भी अपनी भूल का एहसास कराया। यह कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति घर में रहकर, प्रेम और विनम्रता से भी की जा सकती है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।