श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 8

कृष्ण और बलराम: गोकुल में दो भाइयों का साथ और गाड़ी पलटने की लीला

वासुदेव ने बलराम को सुरक्षा के लिए गोकुल में नंद के संरक्षण में छोड़ दिया और दोनों भाई साथ पलने लगे। एक दिन बालकृष्ण ने बैलगाड़ी पर लात मारी और गाड़ी उछलकर दूर जा गिरी। पढ़ें पूरी कथा।

कृष्ण और बलराम: गोकुल में दो भाइयों का साथ और गाड़ी पलटने की लीला
कृष्ण और बलराम: गोकुल में दो भाइयों का साथ और गाड़ी पलटने की लीला — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

कृष्ण पर लगातार मंडराते खतरों से वासुदेव भयभीत हो गए और उन्हें अपने दूसरे पुत्र बलराम के प्राणों की भी चिंता सताने लगी। इसलिए उन्होंने बलराम को भी गोकुल में नंद के संरक्षण में छोड़ने का निश्चय किया, जहाँ दोनों भाई साथ-साथ पलने-बढ़ने लगे।

वासुदेव की चिंता और बलराम का गोकुल आना

जैसा पहले वर्णन किया जा चुका है, बलराम वासुदेव की सातवीं संतान थे, जिन्होंने वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ से जन्म लिया था। आठ संतानों के जन्म के बाद देवकी और वासुदेव को कारावास से मुक्ति मिल गई थी।

कृष्ण पर लगातार मंडरा रहे खतरे से वासुदेव भयभीत थे। उन्हें लग रहा था कि उनके दूसरे पुत्र बलराम के प्राण भी संकट में हैं। इसलिए उन्होंने बलराम को मथुरा से दूर नंद के संरक्षण में छोड़ने का निश्चय किया। उनका विचार था कि गोकुल में रहकर बलराम अधिक सुरक्षित भी रहेंगे और अपने छोटे भाई के निकट भी रहेंगे।

वासुदेव और नंद का संवाद

वासुदेव ने नंद के पास जाकर कहा कि यह उनका बड़ा पुत्र बलराम है, जो वास्तव में उनका और देवकी का सातवाँ पुत्र है, पर ईश्वर की कृपा से रोहिणी के गर्भ में पहुँचकर कंस के हाथों मरने से बच गया। उन्हें भय था कि यदि कंस को यह पता चल गया तो वह इसे नहीं छोड़ेगा, इसलिए उन्होंने नंद से इसे भी अपने साथ रख लेने का आग्रह किया।

नंद ने कहा कि मित्र के काम आकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता होगी। उन्होंने वासुदेव को चिंता न करने को कहा और आश्वासन दिया कि वे बलराम का पालन-पोषण अपने पुत्र के समान ही करेंगे। फिर वासुदेव बलराम को गोकुल में छोड़कर मथुरा लौट गए, और दोनों भाई नंद और यशोदा के संरक्षण में साथ-साथ पलने-बढ़ने लगे।

बैलगाड़ी के नीचे सोए कृष्ण

एक दिन नंद ने कुछ ब्राह्मणों को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया था। उस दिन कृष्ण ने अचानक रोना शुरू कर दिया। यशोदा को लगा कि वे भूखे हैं, इसलिए उन्होंने दूध पिलाकर उन्हें एक बैलगाड़ी के नीचे सुला दिया। वह गाड़ी घी और मक्खन से लदी थी। कृष्ण को सुलाकर यशोदा अपने काम में लग गईं।

थोड़ी देर बाद कृष्ण की नींद खुल गई। उन्होंने रोकर माँ को बुलाना चाहा, पर यशोदा काम में जुटी थीं और उनके रोने की आवाज नहीं सुन सकीं। कृष्ण को लगा कि यशोदा उनकी उपेक्षा कर रही हैं। क्रोध में उन्होंने गाड़ी पर एक लात मारी और गाड़ी उछलकर काफी दूर जा गिरी।

गाड़ी पलटने पर सबका आश्चर्य

गाड़ी गिरने की आवाज सुनकर नंद, यशोदा और सभी ब्राह्मण भागते हुए घर से बाहर आए। कृष्ण का शरीर घी और मक्खन से सना देखकर वे चकित रह गए, जबकि कृष्ण उन सबको देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। गाड़ी थोड़ी दूर उलटी पड़ी थी।

वहीं खेल रहे एक बच्चे ने यशोदा से कहा कि उसने कृष्ण को गाड़ी पर लात मारते देखा था और गाड़ी उछलकर वहाँ जा गिरी। यह सुनकर सब हैरान रह गए कि इतने छोटे बच्चे के लात मारने से गाड़ी कैसे पलट सकती है। पर इस बात पर विश्वास करने के अलावा उनके पास कोई और चारा भी नहीं था।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख मित्रता और विश्वास की है। वासुदेव ने अपने पुत्र की सुरक्षा का भार नंद पर सौंपा और नंद ने उसे अपने पुत्र के समान अपनाने का वचन दिया। सच्चे मित्र पर किया गया विश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

दूसरी सीख यह है कि भाइयों का साथ सबसे बड़ी शक्ति है। कृष्ण और बलराम का एक साथ पलना-बढ़ना आगे की उनकी हर लीला का आधार बना।

तीसरी सीख यह है कि जो बात सामान्य बुद्धि से समझ न आए, वह भी ईश्वर की लीला हो सकती है। गोकुलवासी भी इस घटना को समझ नहीं सके, पर उन्होंने यह स्वीकार किया कि कृष्ण साधारण बालक नहीं हैं।

कथा का सार

कृष्ण और बलराम का गोकुल में साथ रहना उनकी आगे की बाल-लीलाओं की भूमिका है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।