श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 37
कंस की मृत्यु: कृष्ण ने किया अत्याचारी कंस का अंत और माता-पिता को कराया मुक्त
कंस के चारों पहलवान चाणूर, मुष्टिक, कूट और शल कृष्ण-बलराम के हाथों मारे गए, और क्रोधित कंस मंच पर कृष्ण के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुआ। इसके बाद कृष्ण ने वासुदेव, देवकी और उग्रसेन को कारागार से मुक्त कराया। पढ़ें कंस की मृत्यु की पूरी कथा।

कुबलयापीड के मारे जाने के बाद कंस की अंतिम आशा उसके चार पहलवान ही थे, पर वे भी अखाड़े में कृष्ण और बलराम के सामने टिक नहीं सके। इसके बाद अत्याचारी कंस का अंत हुआ और वासुदेव, देवकी तथा उग्रसेन कारागार से मुक्त हुए।
कंस का भय और अखाड़े में पहलवानों की तैयारी
कंस को कृष्ण और बलराम के हाथों कुबलयापीड और उसके महावत के मारे जाने का पता चल गया था। अब तो वह बहुत भयभीत हुआ। अब उसकी अंतिम आशा उसके पहलवान ही थे। उसे उम्मीद थी कि वे कृष्ण और बलराम को मारकर उसका जीवन बचा लेंगे। अखाड़े में तिल रखने की भी जगह नहीं थी। कुश्ती का आयोजन देखने के लिए लोग दूर-दूर से आए हुए थे। कंस के चार जाने-माने पहलवान चाणूर, मुष्टिक, कूट और शल पहले से ही अखाड़े में मौजूद थे। वे अभी किसी को भी कुश्ती के लिए चुनौती नहीं दे रहे थे, क्योंकि कंस ने उनका लक्ष्य पहले ही उन्हें बता दिया था। वे चारों बड़े ही शक्तिशाली थे और कंस को उन पर अटूट विश्वास था। कृष्ण और बलराम के वहाँ पहुँचने से पहले कंस ने उन चारों को अपने पास बुलाकर फिर कहा, ‘‘ध्यान रहे, आज वे दोनों भाई बचने नहीं चाहिए। मैं तुम चारों को मालामाल कर दूँगा। इतना धन दूँगा कि तुम्हारी सात पीढ़ियाँ बैठकर खाएँगी।’’ कंस की बात सुनकर उन चारों ने उसे कृष्ण और बलराम को मार डालने का भरोसा दिलाया।
अखाड़े में कृष्ण-बलराम का आगमन
थोड़ी ही देर में कृष्ण और बलराम अखाड़े में आ पहुँचे। सबसे पहले उन्होंने वहीं बैठे अपने पिता नंद और चाचा अक्रूर को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया। दोनों भाइयों को देखते ही वहाँ मौजूद सारे लोगों ने करतल ध्वनि करके उनका स्वागत किया। यह सब देखकर कंस का हृदय जल रहा था।
चाणूर की ललकार और कृष्ण का उत्तर
तभी चाणूर ने कृष्ण और बलराम को कुश्ती के लिए ललकारा। तब कृष्ण बोले, ‘‘हम कुश्ती लड़ने को पूरी तरह तैयार हैं। लेकिन एक बात तुम्हें भी स्मरण रखनी चाहिए। हम आखिर बच्चे ही हैं। हमें पराजित करके तुम किसी प्रकार के यश के भागी नहीं बनोगे।’’ चाणूर बोला, ‘‘हम जानते हैं कि तुम कोई साधारण बालक नहीं हो। अभी-अभी तुमने शक्तिशाली हाथी कुबलयापीड को मारा है। अब आकर मेरे विरुद्ध अपनी ताकत दिखाओ। बलराम को मुष्टिक से लड़ने दो।’’
कृष्ण-चाणूर और बलराम-मुष्टिक का मल्लयुद्ध
कृष्ण चाणूर से भिड़ गए, जबकि बलराम ने मुष्टिक से दो-दो हाथ करने शुरू कर दिए। पल भर में ही चाणूर को समझ आ गया कि कृष्ण को ललकार कर उसने अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती कर दी है। कृष्ण को गिराने की इच्छा से उसने पूरी शक्ति से उनकी छाती पर प्रहार किया, लेकिन इससे कृष्ण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अब चाणूर ने उनकी छाती पर अपनी लात जमानी चाही, लेकिन कृष्ण ने वही पैर पकड़कर उसे हवा में उठा लिया और जमीन पर दे मारा। चाणूर का मस्तक फट गया और उसकी मौत हो गई।
चारों पहलवानों का अंत और कंस का क्रोध
अब तक बलराम ने भी मुष्टिक को मृत्यु का ग्रास बना दिया था। जब शल और कूट ने चाणूर और मुष्टिक की यह हालत देखी तो वे दोनों दाँत पीसते हुए उन पर झपटे। लेकिन शीघ्र ही वे दोनों भी यमराज के पास चले गए। चारों पहलवानों की मौत होते ही भीड़ में मौजूद गोप खुशी से नाचने-गाने लगे। वे उछल-उछलकर दोनों भाइयों की जय-जयकार करने लगे। उन्होंने कंस की कोई परवाह न करते हुए नगाड़े पीटने शुरू कर दिए। अपने अंतिम अस्त्र के असफल होते ही कंस के गुस्से का पार न रहा। जब उसने गोपों को कृष्ण और बलराम की जय बोलते हुए देखा तो वह हाथ मलता हुआ चिल्लाया, ‘‘यह हल्ला तुरंत बंद करो!’’ फिर वह अपने सैनिकों को आदेश देता हुआ बोला, ‘‘नंद और दूसरे गोपों को तुरंत कैद कर लो! वासुदेव और देवकी को मार डालो! बूढ़े उग्रसेन को भी खत्म कर दो! आज मेरे सारे शत्रु समाप्त हो जाएँगे।’’
कृष्ण के हाथों कंस की मृत्यु
जब कृष्ण ने कंस का यह अनर्गल प्रलाप सुना तो उन्हें बड़ा क्रोध आया। वे कूदकर उस मंच पर चढ़ गए, जहाँ कंस अपने सिंहासन पर बैठा हुआ था। कृष्ण के मंच पर आते ही कंस सूखे पत्ते की तरह काँपने लगा। उसने कृष्ण का मुकाबला करने के लिए अपनी तलवार निकाली। लेकिन कृष्ण ने उसे वार करने का कोई अवसर दिए बिना उसे उसके बाल पकड़कर सिंहासन से नीचे घसीट लिया। फिर उन्होंने उसे उठाकर जमीन पर पटक दिया। कृष्ण उसकी छाती पर चढ़ गए। कंस ने उठने की चेष्टा की, लेकिन वह हिल तक नहीं सका। कृष्ण ने उसे पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया।
कंस के आठ भाइयों का अंत और नागरिकों का अभिवादन
कंस के आठ छोटे भाई थे। जब उन्होंने अपने बड़े भाई की यह हालत देखी तो वे सब एक साथ कृष्ण और बलराम पर झपट पड़े। लेकिन दोनों भाइयों ने उन सबको भी मार डाला। उन सबके मरते ही वहाँ उपस्थित सभी लोग खुशी से उछलने लगे। सबने अत्याचारी कंस से राहत दिलाने वाले कृष्ण और बलराम पर पुष्पों और चावल के दानों की वर्षा करनी शुरू कर दी। कृष्ण और बलराम ने हाथ हिलाकर सभी नागरिकों का अभिवादन स्वीकार किया।
वासुदेव, देवकी और उग्रसेन की मुक्ति
कंस को मारने के बाद कृष्ण और बलराम कारागार पहुँचे जहाँ उन्होंने वासुदेव और देवकी को स्वतंत्र किया। फिर उन्होंने उनके चरणस्पर्श करके उनका आशीर्वाद लिया। अपने पुत्रों को देखकर उनके हर्ष का पार न रहा। वे बार-बार उन्हें अपने आलिंगन में भरकर चूमते रहे। फिर दोनों भाइयों ने उग्रसेन को मुक्त किया और उन्हें फिर से मथुरा का शासक बनाया।
नंद की विदाई और वृंदावन वापसी
बाद में कृष्ण और बलराम ने नंद से वासुदेव और देवकी के साथ जाने की अनुमति माँगी। भरी आँखों के साथ नंद ने उन्हें अनुमति दे दी। वासुदेव ने नंद को हृदय से लगाते हुए कहा, ‘‘नंद, तुमने जो किया है, वह कदाचित् कोई सगा भाई भी नहीं करता। मेरे पास तुम्हें धन्यवाद देने के लिए शब्द नहीं हैं। मुझे गर्व है कि भगवान ने मुझे तुम्हारे जैसा मित्र दिया।’’
अपने मित्र और पुत्रों से विदा लेकर नंद अपने साथियों के साथ वृंदावन चले गए। नंद जानते थे कि कृष्ण और बलराम के बचपन के दिन अब समाप्त हो चुके हैं। कृष्ण एक राजपुत्र थे और उनका वास्तविक स्थान मथुरा के महलों में ही था। कृष्ण और बलराम अब अपने वास्तविक माता-पिता के साथ रहने लगे।
भक्ति से जुड़ा संदेश: बड़ों के चरणों में विनम्रता और भक्त पर भगवान की कृपा
इस कथा में भक्ति और संस्कार का सुंदर संदेश है। अखाड़े में पहुँचते ही कृष्ण और बलराम ने सबसे पहले नंद और अक्रूर को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया। और कंस के वध के बाद भी वे सबसे पहले कारागार पहुँचे और वासुदेव-देवकी के चरणस्पर्श किए। भगवान स्वयं बड़ों का सम्मान करके यह सिखाते हैं कि शक्ति और विजय के क्षण में भी विनम्रता नहीं छोड़नी चाहिए।
वृंदावन के गोपों ने भी कंस की परवाह न करते हुए कृष्ण-बलराम की जय-जयकार की। जिसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम होता है, वह सत्य का साथ देने से भय नहीं करता। और नंद का भरी आँखों से कृष्ण को विदा करना वात्सल्य भक्ति का भाव है, जिसमें प्रेम का सबसे बड़ा रूप प्रिय के हित में अपने मन को समझा लेना है।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि अत्याचार और अहंकार का अंत अवश्य होता है। कंस ने अपने बल, पहलवानों और सैनिकों पर भरोसा किया, पर अंत में उसका सारा बल व्यर्थ गया।
दूसरी सीख यह है कि धन और लोभ के सहारे किया गया अधर्म टिकता नहीं। कंस ने पहलवानों को सात पीढ़ियों का धन देने का लालच दिया, पर वे कृष्ण-बलराम के सामने टिक नहीं सके।
तीसरी सीख यह है कि बड़ों का आशीर्वाद सबसे पहले लेना चाहिए, चाहे हम कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों। कृष्ण और बलराम ने अखाड़े में आते ही नंद और अक्रूर का आशीर्वाद लिया।
चौथी सीख यह है कि सच्ची मित्रता और निःस्वार्थ सेवा का मूल्य सबसे बड़ा है। वासुदेव ने नंद से कहा कि जो उन्होंने किया वह कदाचित् कोई सगा भाई भी नहीं करता।
पाँचवीं सीख यह है कि जब अन्याय का अंत होता है तो सच्चे और पीड़ित लोगों को मुक्ति और सुख मिलता है। कारागार से वासुदेव, देवकी और उग्रसेन की मुक्ति इसी बात का प्रमाण है।
कथा का सार
कंस की मृत्यु के साथ मथुरा को अत्याचार से मुक्ति मिली, और वासुदेव, देवकी तथा उग्रसेन अपने सुख को लौटे। यह कथा सिखाती है कि धर्म की विजय निश्चित है और भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।