श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 35
कंस के लिए अपशकुन: धनुष टूटने की खबर से बेचैन हुआ कंस
कृष्ण के कारनामे सुन-सुनकर कंस की निराशा और क्रोध बढ़ता गया, और धनुर्यज्ञ का धनुष टूटने की खबर ने उसके पैरों तले की जमीन खिसका दी। भय से उसकी पूरी रात करवटें बदलते बीती। पढ़ें पूरी कथा।

मथुरा में कृष्ण और बलराम के कारनामों की खबरें कंस तक पहुँच रही थीं, और हर खबर के साथ उसकी निराशा और क्रोध बढ़ता जा रहा था। धनुर्यज्ञ का धनुष टूटने का समाचार सुनकर तो उसके पैरों तले की जमीन ही निकल गई।
कृष्ण-बलराम के कारनामे सुनकर कंस की निराशा और क्रोध
अपने महल में बैठा हुआ कंस दोनों भाइयों के कारनामे सुनकर परेशान हो रहा था। प्रत्येक समाचार के साथ उसकी निराशा और क्रोध बढ़ता जा रहा था। उसे पता चल चुका था कि किस तरह कृष्ण ने उसके धोबी की पिटाई की और उसे गम्भीर चोट आई। उसे यह भी पता चल चुका था कि उसकी अपनी सेविका ने उसके सबसे प्रबल शत्रुओं को चंदन का लेप लगाया। उसके नगर के ही एक दर्जी ने उसके भय की परवाह न करते हुए कृष्ण और उनके साथियों के लिए कपड़े बनाए। सबसे गहरा आघात तो उसे तब लगा जब उसे यह पता चला कि धनुर्यज्ञ के लिए रखा हुआ धनुष कृष्ण ने तमाम सेवकों के मौजूद रहते तोड़ दिया है।
धनुष टूटने का समाचार और कंस की बेचैन रात
धनुष के टूटने का समाचार सुनकर तो कंस के पैरों तले की जमीन ही निकल गई थी। उसकी घबराहट अब बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। उसे हर दिशा से मृत्यु अपनी ओर आती प्रतीत हो रही थी। खाना, पीना, संगीत, नृत्य, उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। रात में जब वह सोने के लिए बिस्तर पर लेटा तो उसे नींद नहीं आई। उसकी पूरी रात करवटें बदलते हुए निकल गई। रात भर वह बिस्तर पर लेटा हुआ कृष्ण और बलराम को मारने के उपाय ही सोचता रहा।
भक्ति से जुड़ा संदेश: निर्भय भक्त और भयभीत शत्रु
इस कथा में भय और भक्ति का अंतर साफ दिखता है। एक ओर राजा कंस है, जिसके पास महल, सेवक, सेना और सारा वैभव है, फिर भी वह भय से बेचैन है। दूसरी ओर उसी के नगर का दर्जी है, जिसने कंस के भय की परवाह किए बिना कृष्ण और उनके साथियों की सेवा की।
जिसके हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम और श्रद्धा है, वह निर्भय होकर सेवा कर पाता है। और जो ईश्वर से बैर रखता है, उसे सारे सुख-साधन होते हुए भी चैन नहीं मिलता। सच्ची शांति भगवान की शरण में ही मिलती है।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि बैर और अहंकार मन की शांति छीन लेते हैं। कंस को खाना, पीना, संगीत और नृत्य कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था, और रात भर उसे नींद नहीं आई।
दूसरी सीख यह है कि अधर्म के मार्ग पर चलने वाले को सारे साधन होते हुए भी सच्चा सुख नहीं मिलता। कंस के पास राज्य, सेवक और वैभव था, फिर भी उसे हर दिशा से मृत्यु अपनी ओर आती दिखाई दे रही थी।
तीसरी सीख यह है कि सच्चाई और सेवा के काम में भय को आड़े नहीं आने देना चाहिए। दर्जी ने कंस के भय की परवाह न करते हुए कृष्ण और उनके साथियों के लिए कपड़े बनाए।
चौथी सीख यह है कि जो ईश्वर की शक्ति को पहचानकर भी उनसे बैर रखता है, वह स्वयं अपनी बेचैनी बढ़ाता है। कंस ने रात भर कृष्ण और बलराम को मारने के उपाय सोचे, पर शांति उसके हाथ नहीं आई।
कथा का सार
कंस के लिए अपशकुन की यह रात उसके भय और बेचैनी की कथा है, जो बताती है कि अहंकारी का मन कभी शांत नहीं रहता। यह कथा सिखाती है कि ईश्वर से बैर में कोई सुख नहीं, और उनकी शरण में ही निर्भयता मिलती है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।