श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 39
जरासंध की विजय: प्रवर्षण पर्वत की आग और कृष्ण-बलराम की छलांग
कालयवन पर विजय के बाद द्वारका लौटते कृष्ण और बलराम का पीछा जरासंध की सेना ने किया। प्रवर्षण पर्वत पर आग लगा दी गई, पर दोनों भाई छलांग लगाकर सुरक्षित निकल गए और जरासंध इसे अपनी विजय समझकर अभिमानी हो गया। पढ़ें पूरी कथा।

कालयवन पर विजय के बाद द्वारका लौटते कृष्ण और बलराम का पीछा जरासंध की सेना ने किया। जरासंध ने प्रवर्षण पर्वत को घेरकर आग लगवा दी और दोनों भाइयों को मरा समझकर विजय का उत्सव मनाया, जबकि वे ऊँची छलांग भरकर बहुत दूर निकल चुके थे।
बलराम की थकान और द्वारका जाने का निर्णय
जब कृष्ण और बलराम अपनी विजय के बाद द्वारका लौट रहे थे, उनकी दृष्टि अपनी ओर बढ़ती जरासंध की सेना पर पड़ी। अब तक बलराम बुरी तरह थक चुके थे और थोड़े विश्राम की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे। वे कृष्ण से बोले, ‘‘मेरे विचार से हमें थोड़े दिनों के लिए विश्राम कर लेना चाहिए। हम सभी को द्वारका चलना चाहिए।’’
जरासंध का ताना और सेना का पीछा
कृष्ण ने भी बलराम की योजना को अपनी सहमति दे दी। अपने रथों की दिशा मोड़कर वे सब वहाँ से भागने लगे। यह देखकर जरासंध चिल्लाया, ‘‘देखो, यादवों के नायक किस तरह पीठ दिखाकर भाग रहे हैं। अरे, ऐसे नायकों को वीर कहते मुझे लज्जा आती है। ये किसी भी तरह स्वयं को वीर कहलाने के लायक नहीं हैं। लेकिन इस बार मैं इन्हें किसी भी स्थिति में नहीं छोड़ूँगा।’’ यह कहकर जरासंध ने अपनी सेना कृष्ण और बलराम के पीछे दौड़ा दी।
प्रवर्षण पर्वत पर आग: जरासंध का आदेश
मीलों तक कृष्ण और बलराम भागते चले गए। जरासंध और उसकी विशाल सेना उनके पीछे थी। तभी दोनों भाइयों की दृष्टि प्रवर्षण पर्वत पर पड़ी। वे दोनों उस पर चढ़ने लगे। जब जरासंध ने अपने शिकारों को भागते हुए देखा तो वह क्रोधित होकर अपने सैनिकों से बोला, ‘‘इस पर्वत को तुरंत चारों ओर से घेर कर आग लगा दो। दोनों यादव भाई जलकर राख हो जाएँगे।’’ सैनिकों ने तुरंत अपने राजा की आज्ञा का पालन किया।
आग की लपटों ने उस पर्वत को घेर लिया। लेकिन इससे एक नुकसान भी हुआ। आग की लपटों ने कृष्ण और बलराम को जरासंध के सैनिकों की दृष्टि से ओझल कर दिया। इसे उपयुक्त अवसर समझकर कृष्ण बलराम से बोले, ‘‘दाऊ, यह एक अच्छा अवसर है। हमें यहाँ से भाग निकलना चाहिए।’’
कृष्ण और बलराम की ऊँची छलांग
दोनों भाइयों ने उस पर्वत से ऊँची छलांग भरी और पर्वत के चारों ओर खड़ी जरासंध की सेना को पार करते हुए बहुत दूर जा खड़े हुए। यह सब कब और कैसे हुआ, जरासंध और उसके साथियों को पता तक नहीं चला।
जरासंध की भ्रांति और अभिमान
आग की ऊँची उठती लपटों को देखकर जरासंध ने यही सोचा कि कृष्ण और बलराम खत्म हो चुके हैं। वह बड़ा प्रसन्न हुआ, क्योंकि उसने यही सोचा कि उसने अपने दामाद कंस की मौत का बदला ले लिया है। वह सोच रहा था, ‘जिसने मुझे कई बार अपमानित किया, उसे मैंने आज काल का ग्रास बना दिया। अब जाकर मेरे हृदय को शांति मिली है।’
इस विजय ने जरासंध को अभिमानी बना दिया। अब वह स्वयं को ही पृथ्वी का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति समझने लगा है।
भक्ति से जुड़ा संदेश: प्रभु की लीला और भक्त की सुरक्षा
इस कथा में भक्ति का पहला संदेश यह है कि संसार की आँखों से जो दिखता है, वही सत्य नहीं होता। जरासंध को लगा कि कृष्ण और बलराम भाग रहे हैं और आग में समाप्त हो गए, पर वास्तव में प्रभु की योजना कुछ और ही थी। भगवान की लीला को समझना सबके वश की बात नहीं, और भक्त वही है जो बिना समझे भी उन पर विश्वास रखता है।
कथा यह भी सिखाती है कि निंदा और उपहास से विचलित हुए बिना अपने मार्ग पर स्थिर रहना चाहिए। जरासंध ने कृष्ण-बलराम को कायर कहा और स्वयं को वीर बताया, पर कृष्ण ने उसका उत्तर शब्दों से नहीं दिया। जो अपने इष्ट और अपने उद्देश्य पर टिका रहता है, उसे संसार की बातें विचलित नहीं कर पातीं।
जरासंध की यह तथाकथित विजय वास्तव में उसके अहंकार की वृद्धि थी। भक्ति का मार्ग सिखाता है कि सफलता का अभिमान सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि जो स्वयं को पृथ्वी का सबसे शक्तिशाली मान लेता है, वह प्रभु की सत्ता को भूल जाता है। भक्त हर उपलब्धि को प्रभु की कृपा मानकर विनम्र बना रहता है।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि जो दिखाई देता है, वही अंतिम सत्य नहीं होता। जरासंध ने जलती लपटों को देखकर कृष्ण-बलराम की मृत्यु मान ली, जबकि वे सुरक्षित बहुत दूर पहुँच चुके थे।
दूसरी सीख यह है कि विपरीत परिस्थिति में घबराने के बजाय सही अवसर की पहचान करनी चाहिए। आग की लपटों ने जब दोनों भाइयों को सैनिकों की दृष्टि से ओझल कर दिया, तो कृष्ण ने उसे उपयुक्त अवसर समझकर तुरंत निर्णय लिया।
तीसरी सीख यह है कि थकान में विश्राम की आवश्यकता को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, समझदारी है। बलराम ने विश्राम का सुझाव दिया और कृष्ण ने उसे सहर्ष माना।
चौथी सीख यह है कि बिना पूरी जानकारी के अपनी विजय का उत्सव मनाना और अभिमान में डूब जाना अंततः हानि पहुँचाता है। जरासंध ने केवल लपटें देखकर स्वयं को सबसे शक्तिशाली मान लिया।
पाँचवीं सीख यह है कि क्रोध और बदले की भावना मन को कभी स्थायी शांति नहीं देती। जरासंध को लगा कि उसके हृदय को शांति मिल गई है, पर वह शांति भ्रम पर टिकी थी।
कथा का सार
प्रवर्षण पर्वत की आग में जरासंध ने कृष्ण और बलराम की मृत्यु मान ली और अपनी विजय पर अभिमान से भर उठा, जबकि वे दोनों सुरक्षित निकल चुके थे। यह कथा सिखाती है कि प्रभु अपने भक्तों की रक्षा के मार्ग स्वयं बना लेते हैं और अहंकार में डूबे व्यक्ति की विजय अक्सर उसका भ्रम ही होती है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।