श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 38
जरासंध की प्रतिज्ञा: कंस की विधवाओं का दुख, मथुरा पर आक्रमण और कृष्ण-बलराम की विजय
कंस की मृत्यु के बाद उसकी विधवाएँ अपने पिता जरासंध के पास पहुँचीं और जरासंध ने यादवों को समाप्त करने की प्रतिज्ञा कर ली। मथुरा पर चढ़ाई हुई, पर दिव्य रथ और कवच पाकर कृष्ण-बलराम ने उसकी विशाल सेना को परास्त कर दिया। पढ़ें पूरी कथा।

कंस की मौत के बाद उसकी दोनों विधवाओं ने अपने पिता मगध नरेश जरासंध के पास जाकर अपना दुख सुनाया। क्रोधित जरासंध ने पृथ्वी को कृष्ण, बलराम और यादवों से रहित करने की प्रतिज्ञा की और मथुरा पर चढ़ाई कर दी, पर दिव्य रथ और कवच पाकर कृष्ण-बलराम ने उसकी विशाल सेना को खदेड़ दिया।
कंस की विधवाओं का जरासंध के पास जाना
कंस की मौत के बाद उग्रसेन मथुरा पर शासन करने लगे थे। मथुरा की प्रजा अपने शासक से पूरी तरह संतुष्ट थी। लेकिन कंस की दो विधवाएँ बड़ी दुखी थीं। उन्होंने अपने पिता जरासंध के पास जाकर उसके सामने अपना दुखड़ा रोने का निश्चय किया।
मगध नरेश जरासंध को अपनी पुत्रियों को विधवाओं के रूप में देखकर बड़ा क्रोध आया। उसने उनसे पूछा कि आखिर उनके पति की मौत कैसे हुई। तब बड़ी बेटी आस्ति ने बताया, ‘‘कृष्ण ने हमारे पति को मार डाला।’’ फिर उसने पूरी कहानी कह सुनाई। छोटी बेटी प्राप्ति ने कहा, ‘‘पिताजी, अब उग्रसेन मथुरा राज्य के शासक बन गए हैं। लेकिन शासन की वास्तविक बागडोर कृष्ण और बलराम के हाथ में ही है।’’
जरासंध की प्रतिज्ञा और मथुरा की घेराबंदी
जब जरासंध ने यह सुना तो उसे बड़ा क्रोध आया। उसने अपने सेना प्रमुख को आदेश दिया, ‘‘सभी अधीनस्थ राजाओं को तत्काल अपनी सेनाएँ तैयार करने का आदेश दो। मैं इस धरा को कृष्ण, बलराम और पूरे यादव समाज से रहित कर दूँगा।’’
शीघ्र ही जरासंध की विशाल सेना ने मथुरा की ओर प्रस्थान किया। एक सुबह बलराम कृष्ण के पास आकर बोले, ‘‘जरासंध की सेना ने हमारे नगर को घेर लिया है। हमें कुछ करना चाहिए।’’
कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘दाऊ, मुझे तो पहले से पता था कि यह होना है। हमें नगर से बाहर निकलकर उसे उसके जीवन का पाठ पढ़ाना चाहिए।’’
आकाश से उतरे दिव्य रथ और कृष्ण की रणनीति
जब दोनों भाई जरासंध की सेना का निरीक्षण कर रहे थे, तब आकाश से दो रथ भूमि पर उतरे। वे रथ दिव्य अस्त्रों से भरे हुए थे। उनमें कृष्ण और बलराम के लिए दो दिव्य कवच भी थे। कृष्ण और बलराम ने शीघ्रतापूर्वक अपने कवच पहने और जरासंध की विशाल सेना का सामना करने के लिए तैयार हो गए। जब वे अपनी छोटी सी सेना के साथ बाहर निकल रहे थे, उस समय कृष्ण सोच रहे थे, ‘मैं जरासंध की सेना को समाप्त कर दूँगा, लेकिन उसे छोड़ दूँगा। जब वह अपने और भी साथियों को लेकर दोबारा आएगा, तब मैं उसे मार डालूँगा। इस प्रकार मैं उसके सभी सहयोगियों के साथ उसे मार सकूँगा। तब ही पृथ्वी पापियों से रहित होगी।’
शीघ्र ही कृष्ण और जरासंध की सेनाएँ युद्धभूमि में आमने-सामने आ गईं।
जरासंध की ललकार और कृष्ण का शंखनाद
जरासंध कृष्ण पर शब्दबाण चलाता हुआ बोला, ‘‘बच्चों, एक बार मैं तुम लोगों को फिर सोचने का मौका देता हूँ। क्या तुम लोग वास्तव में मुझसे अर्थात् महाराजाधिराज जरासंध से मुकाबला करना चाहते हो? तुम दोनों अभी बहुत छोटे हो। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम्हें मरने की इतनी जल्दी क्यों है। अरे, घर जाओ, अपनी मैया की गोद में लेटो। मैं वचन देता हूँ कि अगर तुम अपनी मैया के पास लौट गए तो मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा।’’
कृष्ण ने जरासंध की इस बात पर जरा सी भी उत्तेजना नहीं दिखाई, बोले, ‘‘जो वीर होते हैं, वे अपनी वीरता रणभूमि में दिखाते हैं। भाषण में वीरता दिखाने वाले वीर नहीं होते। इसलिए बातों में समय नष्ट मत करो।’’ यह कहते हुए मधुसूदन कृष्ण ने अपना शंख फूँक दिया। यह युद्ध का उद्घोष था।
रणभूमि में कृष्ण-बलराम का पराक्रम
जरासंध ने कृष्ण और बलराम की सेना पर आक्रमण कर दिया। थोड़ी ही देर में सम्पूर्ण रणभूमि खून से रंग गई। कृष्ण अपने धनुष से इतनी तेजी से बाण छोड़ रहे थे कि जरासंध की सेना में कोई भी उनका मुकाबला नहीं कर पा रहा था।
उसकी सेना की हालत वैसी ही हो रही थी, जैसी घनघोर वर्षा में किसी कमजोर छाते के नीचे खड़े व्यक्ति की होती है। बलराम भी अपने हल से शत्रुओं का संहार कर रहे थे। जरासंध के योद्धा दोनों भाइयों की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख पा रहे थे। जल्दी ही जरासंध की सेना के वीर ऐसे भागने लगे, जैसे शेर के सामने पड़ने पर हिरन भागते हैं। कृष्ण के धनुष की टंकार उन्हें शेर की दहाड़ जैसी लग रही थी। रणभूमि जरासंध के सैनिकों से खाली हो गई।
जरासंध का अपमान और सत्रह बार का आक्रमण
इस बीच बलराम ने जरासंध को कैद कर लिया। वे उसे जंजीरों में जकड़ने ही जा रहे थे तभी कृष्ण वहाँ पहुँच गए और बोले, ‘‘भैया, इसे छोड़ दो। यह हमारे किसी काम का नहीं है। युद्ध में हारकर जब यह मगध पहुँचेगा तो अपने लोगों को अपनी पराजय की गाथा सुनाएगा। यह इसके लिए मृत्यु या कारागार से कहीं ज्यादा अपमानजनक होगा।’’
अपमानित जरासंध अपनी राजधानी गिरीवराज लौट गया। उसने यादवों को परास्त करने का संकल्प कर लिया था। जरासंध ने यादवों को परास्त करने के लिये सत्रह बार आक्रमण किया, लेकिन हर बार कृष्ण और बलराम के हाथों उसे मुँह की खानी पड़ी।
भक्ति से जुड़ा संदेश: धर्म के रक्षक पर प्रभु की कृपा
इस कथा में भक्ति का एक सुंदर संदेश उस क्षण में छिपा है जब संकट की घड़ी में आकाश से दिव्य रथ और दिव्य कवच उतरते हैं। जब कृष्ण और बलराम की छोटी सी सेना के सामने विशाल सेना खड़ी थी, तब भी उन्हें भय नहीं था। भक्ति का भाव सिखाता है कि जो धर्म के मार्ग पर चलता है और ईश्वर में विश्वास रखता है, उसकी सहायता के लिए दैवी शक्ति किसी न किसी रूप में अवश्य आती है।
कृष्ण की शांति भी भक्त के लिए आदर्श है। जरासंध की ललकार और अपमान भरे शब्दों पर भी वे उत्तेजित नहीं हुए, और बस इतना कहा कि वीरता रणभूमि में दिखाई जाती है, भाषण में नहीं। ईश्वर की शरण में रहने वाला मन बड़े से बड़े शोर के बीच भी स्थिर रहता है।
जरासंध का अहंकार इस कथा में उसके पतन का कारण बनता है। वह स्वयं को महाराजाधिराज कहकर कृष्ण-बलराम को बच्चा बताता है, पर परिणाम उसके विपरीत आता है। भक्ति का मार्ग हमें विनम्रता सिखाता है, क्योंकि शक्ति और पद का अहंकार ईश्वर के सामने टिक नहीं पाता। कृष्ण ने उसे मारा नहीं, बल्कि अपमान की उस अग्नि में छोड़ दिया जो पराजय के बाद अहंकारी को सबसे अधिक जलाती है।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि अहंकार और क्रोध में लिए गए निर्णय विनाश की ओर ले जाते हैं। जरासंध ने अपने क्रोध में सेनाएँ तो जुटा लीं, पर उसे हर बार पराजय ही मिली।
दूसरी सीख यह है कि बड़ी से बड़ी सेना भी धर्म और ईश्वर की शरण के आगे नहीं टिक सकती। कृष्ण और बलराम की छोटी सेना के सामने जरासंध की विशाल सेना हिरन की तरह भागने लगी।
तीसरी सीख यह है कि कठिन समय में भी शांत और धैर्यवान बने रहना चाहिए। कृष्ण ने जरासंध की ललकार का उत्तर बातों से नहीं, अपने कर्म से दिया।
चौथी सीख यह है कि सही रणनीति और दूरदर्शिता सफलता की कुंजी है। कृष्ण ने जरासंध को तुरंत मारने के बजाय उसके पूरे गुट के विनाश की योजना सोची, ताकि पृथ्वी पापियों से रहित हो सके।
पाँचवीं सीख यह है कि कभी-कभी अपमान और पराजय का बोध मृत्यु या कारागार से भी कठिन दंड होता है। कृष्ण ने जरासंध को इसीलिए मुक्त कर दिया, ताकि वह अपनी हार की गाथा स्वयं सबको सुनाए।
कथा का सार
कंस की विधवाओं के दुख से उपजी जरासंध की प्रतिज्ञा मथुरा पर आक्रमण में बदली, पर कृष्ण और बलराम के पराक्रम और दैवी सहायता के आगे उसकी विशाल सेना टिक न सकी। यह कथा सिखाती है कि अहंकार का अंत निश्चित है और जो ईश्वर की शरण में रहकर धर्म के पथ पर चलता है, उसकी रक्षा स्वयं प्रभु करते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।