श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 47

जरासंध की मौत: कृष्ण का तिनके से संकेत और भीम के हाथों अत्याचारी का अंत

अट्ठाइसवें दिन भीम और जरासंध का मल्लयुद्ध निर्णायक मोड़ पर पहुँचा। जरासंध के शरीर के टुकड़े बार-बार जुड़ते रहे, तब कृष्ण ने एक तिनके को चीरकर विपरीत दिशाओं में फेंककर भीम को संकेत दिया और अत्याचारी जरासंध मारा गया। पढ़ें पूरी कथा।

जरासंध की मौत: कृष्ण का तिनके से संकेत और भीम के हाथों अत्याचारी का अंत
जरासंध की मौत: कृष्ण का तिनके से संकेत और भीम के हाथों अत्याचारी का अंत — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

अट्ठाइसवें दिन भीम और जरासंध का भीषण मल्लयुद्ध फिर शुरू हुआ। भीम ने जरासंध को कई बार चीरा, पर उसके दोनों टुकड़े हर बार जुड़ते रहे। तब कृष्ण ने एक तिनके को चीरकर उसके टुकड़े विपरीत दिशाओं में फेंककर भीम को उपाय समझाया, और इस बार जरासंध का अंत हो गया।

अट्ठाइसवें दिन का भीषण संग्राम

अट्ठाइसवें दिन फिर से दोनों योद्धाओं में भीषण संग्राम शुरू हो गया। फिर गदा से गदा टकराने लगी। मुक्के पर मुक्के चलने लगे। दोनों योद्धा एक-दूसरे पर काबू पाने के लिए पूरा जोर लगाने लगे। तरह-तरह के पैंतरे बदलते हुए वे पूरे अखाड़े में घूमने लगे। मल्लयुद्ध का कोई पैंतरा ऐसा नहीं था, जो उन योद्धाओं को न आता हो। सभी लोग साँस रोके युद्ध के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे।

जरासंध के टुकड़ों का जुड़ जाना: भीम का आश्चर्य

युद्ध के बीच में ही जरासंध तेजी से भीम की ओर लपका, लेकिन भीम तेजी से एक ओर हट गया। जरासंध का संतुलन बिगड़ गया और वह गिर पड़ा। भीम ने उसके दोनों पैर पकड़ लिए और उसे हवा में घुमाकर पृथ्वी पर दे मारा। फिर जरासंध के एक पैर को अपने एक पैर से दबाकर व उसका दूसरा पैर अपने हाथों में लेकर भीम ने उसका शरीर दो भागों में चीर डाला। दोनों टुकड़े उसने एक-दूसरे से दूर फेंक दिए। लेकिन सबको घोर आश्चर्य हुआ जब दोनों टुकड़े परस्पर जुड़ गए। जरासंध ने जोर का ठहाका लगाया और एक बार फिर भीम पर झपटा।

थोड़ी देर तक कुश्ती करने के बाद भीम को एक बार फिर वैसा ही अवसर मिला। उसने फिर से जरासंध को दो भागों में चीर दिया। लेकिन इस बार भी वैसा ही हुआ। दोनों टुकड़े आपस में जुड़ गए। भीम ने बार-बार जरासंध के शरीर को चीरा, लेकिन हर बार उसका परिणाम वही निकला। अब तो भीम परेशान हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि बार-बार जरासंध को चीरने के बाद भी वह जुड़ क्यों जाता है।

कृष्ण का तिनके से संकेत और जरासंध का अंत

कृष्ण ने भीम को जरासंध को मारने का उपाय बताने का यह उपयुक्त अवसर समझा। उन्होंने एक तिनका उठाया और भीम को दिखाते हुए उसे दो भागों में चीर डाला। फिर वे टुकड़े उन्होंने विपरीत दिशाओं में फेंक दिए।

यह देखकर भीम समझ गया कि उसे क्या करना है। अगली बार जैसे ही उसे अवसर मिला, उसने जरासंध को फिर पटक कर उसे दो भागों में चीर डाला और इस बार वे टुकड़े विपरीत दिशाओं में फेंक दिए। इस बार वे दोनों टुकड़े नहीं जुड़े। जरासंध मारा जा चुका था।

मगध की प्रजा की प्रसन्नता और कृष्ण का धर्मोपदेश

जब मगध के लोगों को अत्याचारी जरासंध के मारे जाने का पता चला तो वे बहुत प्रसन्न हुए। फिर कृष्ण जरासंध के पुत्र को मगध के राजसिंहासन पर आसीन करते हुए बोले, ‘‘अब तुम मगध की बागडोर अपने हाथों में लो। धर्मराज युधिष्ठिर को अपना सम्राट स्वीकार करो और उनके निर्देशों के अनुसार शासन करो। तुम्हें पूरी तरह धर्म के अनुसार शासनकार्य चलाना चाहिए और मगध की प्रजा का पुत्रवत् पालन-पोषण करना चाहिए। यही तुम्हारा कर्तव्य है।’’

इंद्रप्रस्थ वापसी और युधिष्ठिर की प्रसन्नता

यह कार्य करके कृष्ण, भीम और अर्जुन इंद्रप्रस्थ को लौट गए। वहाँ यह समाचार ज्ञात होने पर युधिष्ठिर भी अत्यंत प्रसन्न हुए।

भक्ति से जुड़ा संदेश: प्रभु का संकेत और भक्त का समर्पित कर्म

इस कथा में भक्ति का सबसे सुंदर संदेश उस क्षण में है जब भीम परेशान हैं और कृष्ण बिना एक शब्द कहे केवल एक तिनका चीरकर उन्हें मार्ग दिखा देते हैं। भक्त जब अपनी पूरी शक्ति लगाने के बाद भी राह न पा रहा हो, तब प्रभु का एक संकेत ही समाधान बन जाता है। जो अपने कर्म में डटा रहता है और ईश्वर की ओर देखता है, उसे मार्गदर्शन अवश्य मिलता है।

भीम ने कृष्ण का संकेत समझा और उसे अपने कर्म से पूरा किया। भक्ति केवल प्रार्थना नहीं, ईश्वर के संकेत को समझकर उसे जीवन में उतारना भी है। भगवान मार्ग दिखाते हैं, पर कर्म भक्त को ही करना पड़ता है, और जब दोनों का मेल होता है तब असंभव दिखने वाला कार्य भी सिद्ध हो जाता है।

कृष्ण का आचरण यह भी सिखाता है कि अत्याचारी का अंत ही अंतिम उद्देश्य नहीं होता, धर्म की स्थापना भी आवश्यक है। उन्होंने जरासंध के पुत्र को राजसिंहासन देकर कहा कि धर्म के अनुसार शासन करो और प्रजा का पुत्रवत् पालन करो। भगवान का न्याय दंड के साथ कल्याण और सुधार का अवसर भी देता है। साथ ही, इस कथा में कृष्ण का स्वयं राज्य न लेकर युधिष्ठिर को सम्राट स्वीकार करने की बात कहना निःस्वार्थ भाव का भी उदाहरण है।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि अत्याचार और अहंकार का अंत निश्चित है, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न दिखे। जरासंध की मृत्यु से मगध की प्रजा ने राहत की साँस ली।

दूसरी सीख यह है कि कठिन समय में धैर्य बनाए रखना चाहिए और सही संकेत की प्रतीक्षा करनी चाहिए। भीम बार-बार असफल होने पर परेशान हुए, पर संग्राम छोड़ा नहीं और कृष्ण के संकेत से समाधान पाया।

तीसरी सीख यह है कि बुद्धिमान मार्गदर्शक कई बार बिना कहे ही समाधान दिखा देता है। कृष्ण ने केवल एक तिनके से भीम को वह उपाय समझा दिया जो शक्ति से नहीं निकल पा रहा था।

चौथी सीख यह है कि शक्ति के साथ विवेक का होना आवश्यक है। भीम के बल और कृष्ण की युक्ति दोनों के मेल से ही जरासंध का अंत संभव हुआ।

पाँचवीं सीख यह है कि शासक का कर्तव्य प्रजा का पुत्रवत् पालन करना और धर्म के अनुसार शासन चलाना है। कृष्ण ने जरासंध के पुत्र को यही कर्तव्य याद दिलाया।

कथा का सार

तिनके के संकेत से भीम ने जरासंध के शरीर के टुकड़ों को विपरीत दिशाओं में फेंककर उसका अंत किया, और कृष्ण ने मगध की बागडोर धर्म के निर्देशों के साथ जरासंध के पुत्र को सौंप दी। यह कथा सिखाती है कि भक्त का समर्पित कर्म और प्रभु का मार्गदर्शन मिलकर बड़े से बड़े अत्याचार का अंत करते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।