श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 25

गोवर्धन धारण: कृष्ण ने उँगली पर उठाया पर्वत और तोड़ा इंद्र का घमंड

वृंदावन के लोग इंद्र के लिए यज्ञ की तैयारी कर रहे थे, तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत और गौओं की पूजा का सुझाव दिया। क्रोधित इंद्र ने प्रलय जैसी वर्षा कर दी, और कृष्ण ने सात दिन तक पर्वत को अपनी उँगली पर उठाए रखा। पढ़ें पूरी कथा।

गोवर्धन धारण: कृष्ण ने उँगली पर उठाया पर्वत और तोड़ा इंद्र का घमंड
गोवर्धन धारण: कृष्ण ने उँगली पर उठाया पर्वत और तोड़ा इंद्र का घमंड — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

वृंदावन में इंद्र के यज्ञ की तैयारियाँ चल रही थीं, तब कृष्ण ने पूछा कि जो हमारे जीवन के काम आता है, उसकी पूजा क्यों न की जाए। इसी सवाल से गोवर्धन धारण की वह कथा शुरू हुई, जिसमें कृष्ण ने सात दिन तक पर्वत उठाकर पूरे गाँव की रक्षा की।

वृंदावन में इंद्र के यज्ञ की तैयारी

एक दिन कृष्ण ने देखा कि वृंदावन में विशेष प्रकार की तैयारियाँ चल रही हैं। कृष्ण ने अपने पिता के पास जाकर पूछा, ‘‘बापू, गाँव में इतनी तैयारी किस बात की हो रही है? क्या गाँव में कोई समारोह होना है?’’ नंद ने कृष्ण को बताया कि गाँव में एक यज्ञ आयोजित होना है। जब कृष्ण ने यज्ञ के विषय में अपने पिता से पूछा तो उन्होंने बताया, ‘‘यह यज्ञ वर्षा के स्वामी देवराज इंद्र के लिए होगा। हम यह यज्ञ इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए करते हैं। हम कई वर्षों से यह यज्ञ करते चले आ रहे हैं।’’

कृष्ण के तर्क: कर्म और गोवर्धन की पूजा

इस पर कृष्ण ने कहा, ‘‘मनुष्य को अपने कर्मों का ही फल प्राप्त होता है। यदि उसने अच्छे कर्म किए होते हैं तो उसे अच्छा फल मिलता है और अगर उसके कर्म बुरे होते हैं तो उसका फल भी बुरा होता है। उसकी समृद्धि भी उसके कर्मों पर ही निर्भर होती है। ऐसी स्थिति में इंद्र की उपासना का क्या मतलब रह जाता है? हमें ऐसी चीज की पूजा करनी चाहिए जो हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में हमारे काम आती हो। हम लोग वैश्य हैं, इसलिए हमें खेतों, गौओं और व्यापार की पूजा करनी चाहिए। बहुत समय से हम लोग गौओं को पालने के काम में लगे हुए हैं। इस कारण हमें अपनी गौओं और गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मणों ने जो वस्तुएँ इंद्र की पूजा के लिए एकत्र की हैं, उनसे हमें दूसरा यज्ञ करना चाहिए, क्योंकि इंद्र की पूजा करने का तो कोई लाभ ही नहीं है।’’

गोवर्धन पर्वत की पूजा और परिक्रमा

कृष्ण ने अपने तर्कों से पिता नंद और अन्य प्रमुख ग्रामवासियों को सहमत कर लिया। इसके बाद सभी ग्रामवासी और पुजारी गाँव के निकट ही स्थित गोवर्धन पर्वत पहुँचे और उसकी पूजा शुरू कर दी। पूजा करने के उपरांत उन्होंने यज्ञ किया। ब्राह्मणों को भोजन कराया गया और उन्हें दान दिया गया। फिर नंद के नेतृत्व में वृंदावन के निवासियों ने गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगाई। उनके साथ चलते हुए कृष्ण सोच रहे थे, ‘मुझे वृंदावनवासियों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि जो कुछ भी वे कर रहे हैं, वह पूरी तरह ठीक है। तभी वे अपने निश्चय पर दृढ़ रह सकेंगे। इस कार्य के लिए मुझे दूसरा रूप ग्रहण करना पड़ेगा।’

कृष्ण बने गोवर्धन: पूजा स्वीकार करने प्रकट हुए

यह सोचकर कृष्ण गोवर्धन के ऊपर मनुष्य रूप में प्रकट हुए और ग्रामवासियों से बोले, ‘‘मैं गोवर्धन हूँ। मैं तुम्हारी पूजा स्वीकार करने आया हूँ।’’ गोवर्धन पर्वत को साक्षात अपने सामने देखकर वृंदावन के निवासी दंग रह गए। फिर कृष्ण ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा, ‘‘देखो, गोवर्धन ने हमारी पूजा स्वीकार कर ली है। हम सब अत्यंत भाग्यशाली हैं कि देवता ने स्वयं प्रकट होकर हमारी पूजा स्वीकार की।’’ कृष्ण की बात से सभी लोग प्रभावित हुए और उन्होंने गोवर्धन से आशीष लेना शुरू किया।

इंद्र का क्रोध और वृंदावन पर प्रलय जैसी वर्षा

जब देवराज इंद्र को पता चला कि उनके स्थान पर एक पर्वत की पूजा की जा रही है, तो उन्होंने अपमानित अनुभव किया। उन्होंने वृंदावन के लोगों को सबक सिखाने का निश्चय किया। उनका क्रोध इतना तीव्र था कि वे सम्पूर्ण वृंदावन को तबाह कर देना चाहते थे। जिन बादलों और तूफानों को उन्होंने प्रलय के लिए सम्भाल कर रखा हुआ था, उन सबको उन्होंने वृंदावन पर टूट पड़ने का आदेश दिया।

अब तो वृंदावन पर धुआँधार वर्षा होने लगी। काले मेघों के अनंत दलों ने वृंदावन को आच्छादित कर लिया था। उन मेघों का गर्जन फौलादी हृदयों को भी कँपा देने के लिए पर्याप्त था। उस भयानक वर्षा में लोगों के घर डूबने लगे। अब सब लोग बाहर निकल कर कृष्ण से मदद की गुहार करने लगे। कृष्ण उन सबको राहत देते हुए बोले, ‘‘यह सब कारगुजारी देवराज इंद्र की है। उनकी पूजा न करने के कारण वे हमसे नाराज हो गए हैं और हमें तबाह कर देना चाहते हैं। आप लोग बिल्कुल चिंता न करें। सब कुछ ठीक हो जाएगा।’’ फिर कृष्ण ने सोचा, ‘इंद्र का ऐसा व्यवहार सहन किए जाने योग्य नहीं है। इंद्र को सबक सिखाया ही जाना चाहिए, ताकि वह भविष्य में ऐसा करने का साहस न करे।’

कृष्ण ने उँगली पर उठाया गोवर्धन पर्वत

यह सोचकर कृष्ण ने सब लोगों से मवेशियों को साथ लेकर अपने पीछे चलने को कहा। वे सभी लोगों को गोवर्धन पर्वत के पास ले गए और उसे उठा लिया। वे उस पर्वत को अपने बाएँ हाथ की छोटी उंगली से उठाए हुए थे। उन्होंने सभी को वर्षा से बचने के लिए गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण ले लेने को कहा। सभी ग्रामवासियों ने ऐसा ही किया। सात दिनों तक वृंदावन में लगातार वर्षा होती रही। इस दौरान कृष्ण ने न केवल सब लोगों की वर्षा और तूफान से रक्षा की, बल्कि उन्हें भोजन और पानी भी उपलब्ध कराया।

इंद्र का अभिमान टूटा और क्षमायाचना

जब देवराज इंद्र को कोई मृत शरीर नहीं दिखा तो वे परेशान हो गए। माजरा क्या है, यह समझने के लिए वे पृथ्वी पर आए। जब उन्होंने कृष्ण को अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाए हुए देखा तो वे सब कुछ समझ गए। उनका अभिमान तिरोहित हो गया। मन ही मन उन्होंने कृष्ण से क्षमायाचना की। कृष्ण ने उन्हें माफ कर दिया। उन्होंने तो इंद्र के घमंड को चूर करने के लिए ही यह लीला की थी।

वर्षा थमी और वृंदावन फिर सामान्य हुआ

इंद्र ने बादलों को वर्षा रोकने का आदेश दिया। तूफान भी वापस हो गए। शीघ्र ही सूर्य पहले की तरह चमकने लगा। गीली धरती भी सूख गई। फिर कृष्ण ने सब लोगों को वृंदावन लौट चलने को कहा। सभी लोग पर्वत की छाया से बाहर आ गए। कृष्ण ने पर्वत को यथास्थान रख दिया। उन्होंने अपनी शक्ति से गाँव का स्वरूप पहले जैसा बना दिया था। सब लोग पुनः चैन से वृंदावन में रहने लगे।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि मनुष्य को अपने कर्मों का ही फल मिलता है। कृष्ण ने समझाया कि अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल बुरा होता है।

दूसरी सीख यह है कि जो वस्तुएँ हमारे दैनिक जीवन में काम आती हैं, जैसे खेत, गौएँ और पर्वत, उनका सम्मान और पूजन करना चाहिए।

तीसरी सीख यह है कि घमंड और क्रोध अंत में विनाश ही लाते हैं। इंद्र ने क्रोध में वृंदावन को तबाह करना चाहा, पर अंत में उन्हें स्वयं क्षमा माँगनी पड़ी।

चौथी सीख यह है कि जो ईश्वर की शरण में जाता है, वह हर संकट से सुरक्षित रहता है। सात दिन तक पूरा वृंदावन गोवर्धन पर्वत की छाया में सुरक्षित रहा।

कथा का सार

गोवर्धन धारण की लीला से कृष्ण ने इंद्र का घमंड चूर किया और वृंदावनवासियों की रक्षा की। यह कथा सिखाती है कि अपने कर्मों पर भरोसा रखना चाहिए और घमंड का अंत सदा पराजय में होता है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।