श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 27

गंधर्व की मुक्ति: कृष्ण ने अजगर बने विद्याधर को शाप से मुक्त किया

शिवरात्रि पर अम्बिका वन में सोते हुए नंद को एक विशाल अजगर निगलने लगा। कृष्ण ने अपने पैर से प्रहार किया तो अजगर गंधर्व विद्याधर बन गया और उसे ऋषि अंगिरा के शाप से मुक्ति मिली। पढ़ें पूरी कथा।

गंधर्व की मुक्ति: कृष्ण ने अजगर बने विद्याधर को शाप से मुक्त किया
गंधर्व की मुक्ति: कृष्ण ने अजगर बने विद्याधर को शाप से मुक्त किया — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

बारह वर्ष के कृष्ण जब पिता नंद के साथ शिवरात्रि पर अम्बिका वन पहुँचे, तब एक विशाल अजगर ने नंद को निगलना शुरू कर दिया। कृष्ण के एक स्पर्श से वह अजगर शाप से मुक्त होकर गंधर्व बन गया।

नंद की शपथ और अम्बिका वन की यात्रा

अब कृष्ण की उम्र बारह वर्ष हो चुकी थी। नंद ने शपथ ली थी कि कृष्ण के बारह वर्ष का होने पर वे देवी अम्बिका की पूजा करेंगे। शिवरात्रि के दिन नंद अपने कुछ मित्रों और कृष्ण के साथ अम्बिका वन की ओर चल पड़े। उस दिन उन सबने उपवास रखा था। अम्बिका वन एक बहुत ही सुंदर स्थान था। पवित्र नदी सरस्वती अम्बिका वन से होकर बहती थी। सभी लोगों ने पवित्र नदी में स्नान किया। फिर वे लोग विभिन्न धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना करने लगे। पूजा पूरी करने के बाद उन्होंने घने वृक्षों की छाया में कुछ देर आराम करने का निश्चय किया। शीतल हवा में उन्हें जल्दी ही गहरी नींद आ गई।

अजगर ने नंद को निगलना शुरू किया

अचानक एक विशाल अजगर रेंगता हुआ उस ओर आ पहुँचा। नंद और उनके साथियों को सोया हुआ देखकर वह उन्हीं की ओर बढ़ा। नंद के पास पहुँचकर उसने उन्हें पैरों की ओर से निगलना शुरू कर दिया। नंद उस समय गहरी नींद में सोए हुए थे। कुछ कष्ट का अनुभव होने पर उनकी नींद खुली। जब उन्होंने एक अजगर को खुद को निगलते हुए देखा तो उनकी आँखें भय से खुली की खुली रह गईं। वे सहायता के लिए अपने साथियों को पुकारने लगे। नंद की पुकार सुनकर उनके मित्रों की नींद खुल गई। नंद अब भी पुकार रहे थे, ‘‘पुत्र कृष्ण, मुझे बचाओ! यह अजगर मुझे खा जाएगा!’’ नंद के साथियों ने जलती हुई मशालों से अजगर को भगाने का यत्न किया। यद्यपि अजगर का शरीर जगह-जगह से जल गया, लेकिन इसके बाद भी उसने नंद को नहीं छोड़ा।

कृष्ण के चरण-स्पर्श से अजगर बना गंधर्व

उधर कृष्ण पिता की पुकार सुनकर भागते हुए उनके पास पहुँचे। कृष्ण ने उस अजगर पर अपने एक पैर से प्रहार किया। उनके ऐसा करते ही वह अजगर गायब हो गया और उसके स्थान पर एक गंधर्व प्रकट हुआ।

विद्याधर की कथा: ऋषि अंगिरा का शाप

वह गंधर्व कृष्ण के चरणों में गिर कर बोला, ‘‘हे भगवन, मैं विद्याधर नाम का गंधर्व हूँ। एक बार मैं अपने रथ पर सवार होकर कहीं जा रहा था, तभी मेरी दृष्टि ऋषि अंगिरा पर पड़ी। उनका कुरूप मुख देखकर मुझे हँसी आ गई। इससे क्रोधित होकर उन्होंने मुझे अजगर बन जाने का शाप दे दिया। मेरे क्षमा माँगने और बहुत अनुनय-विनय करने पर उन्हें दया आ गई। उन्होंने कहा कि जब श्रीकृष्ण तुम्हारा स्पर्श करेंगे, तभी तुम्हें मुक्ति मिलेगी। तभी से मैं आपकी प्रतीक्षा कर रहा था। आपके पिता का स्पर्श भी मैंने इसी उद्देश्य से किया था अन्यथा ये मेरे लिए भी वंदनीय हैं। भगवन, अब मुझ पर अपनी कृपा की वर्षा करके मुझे परमधाम दीजिए।’’

गंधर्व को परमधाम की प्राप्ति

कृष्ण और उस गंधर्व के बीच होने वाला यह वार्तालाप नंद तथा अन्य ग्रामवासी नहीं सुन सके। उन्होंने तो बस यही देखा कि वह अजगर शांत पड़ गया और एक दिव्य ज्योति उसके शरीर से निकल कर आकाश में विलीन हो गई।

कथा का सार

कृष्ण के स्पर्श से गंधर्व विद्याधर को ऋषि अंगिरा के शाप से मुक्ति मिली और नंद की भी रक्षा हुई। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।