श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 43

द्वारका में सुनंद: कृष्ण को रुक्मिणी का पत्र और जरासंध की तैयारी

कई दिनों की यात्रा के बाद ब्राह्मण सुनंद द्वारका पहुँचा और रुक्मिणी का पत्र श्रीकृष्ण को सौंपा। पत्र पढ़कर कृष्ण ने विदर्भ जाने का निश्चय किया, उधर शिशुपाल के प्रस्ताव से जरासंध सतर्क हो गया। पढ़ें पूरी कथा।

द्वारका में सुनंद: कृष्ण को रुक्मिणी का पत्र और जरासंध की तैयारी
द्वारका में सुनंद: कृष्ण को रुक्मिणी का पत्र और जरासंध की तैयारी — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

ब्राह्मण सुनंद विदर्भ से द्वारका पहुँचे। वे राजकुमारी रुक्मिणी का संदेश लेकर आए थे। उनके मन में यही आशा थी कि श्रीकृष्ण समय रहते रुक्मिणी की सहायता करेंगे।

सुनंद का द्वारका पहुँचना

लंबी यात्रा के बाद सुनंद द्वारका नगरी पहुँचे। उन्होंने श्रीकृष्ण के दर्शन किए और विदर्भ में रुक्मिणी की चिंता तथा विवाह की तैयारियों का समाचार सुनाया।

ब्राह्मण ने आदरपूर्वक वह पत्र श्रीकृष्ण को दिया, जिसमें रुक्मिणी ने अपना विश्वास और मन की बात लिखी थी।

श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का संदेश पढ़ा

श्रीकृष्ण ने पत्र पढ़कर रुक्मिणी के दृढ़ विश्वास को समझा। उन्होंने सुनंद को आश्वासन दिया कि वे विदर्भ जाएँगे और रुक्मिणी को अकेला नहीं छोड़ेंगे।

उन्होंने यात्रा की तैयारी करने का निश्चय किया। सुनंद को यह समाचार देकर वापस भेजने से रुक्मिणी को आशा और साहस मिलना था।

विदर्भ की ओर बढ़ती हलचल

उधर शिशुपाल के साथ प्रस्तावित विवाह के कारण अन्य राजाओं में भी हलचल थी। जरासंध के सहयोगी इस समाचार पर ध्यान दे रहे थे।

श्रीकृष्ण की यात्रा अब केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि विश्वास और साहस की परीक्षा बन गई थी।

इस प्रसंग से मिलने वाली सीख

सुनंद ने संदेशवाहक का काम पूरी निष्ठा से किया। रुक्मिणी का प्रेम और विश्वास तथा कृष्ण का दिया आश्वासन इस प्रसंग के केंद्र में हैं।

कठिन परिस्थिति में भरोसेमंद सहायता माँगना और किसी के विश्वास का सम्मान करना इस कथा का सरल संदेश है।

कथा का सार

रुक्मिणी का संदेश सुनंद के हाथ द्वारका पहुँचा और श्रीकृष्ण ने विदर्भ जाने का निश्चय किया। कथा आगे रुक्मिणी और कृष्ण के मिलन की ओर बढ़ती है।