श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 40

द्वारका का निर्माण: कृष्ण का संकल्प, कालयवन का अभिमान और ऋषि मुचुकुंद की गुफा

कालयवन और जरासंध की दोहरी चुनौती के बीच कृष्ण ने संकल्प से पश्चिमी तट पर द्वारका नगरी का सृजन किया और मथुरा के सभी लोगों को वहाँ पहुँचा दिया। फिर कालयवन को छलिया चाल से ऋषि मुचुकुंद की गुफा तक ले गए, जहाँ उसका अंत हुआ। पढ़ें पूरी कथा।

द्वारका का निर्माण: कृष्ण का संकल्प, कालयवन का अभिमान और ऋषि मुचुकुंद की गुफा
द्वारका का निर्माण: कृष्ण का संकल्प, कालयवन का अभिमान और ऋषि मुचुकुंद की गुफा — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

कालयवन अपनी शक्ति के अभिमान में मथुरा पर चढ़ आया और उसी समय जरासंध के आने की खबर भी मिली। नगर की रक्षा के लिए कृष्ण ने संकल्प से पश्चिमी तट पर द्वारका नगरी का सृजन किया, सभी नागरिकों को वहाँ भेज दिया और कालयवन को ऋषि मुचुकुंद की गुफा तक ले गए, जहाँ उसका अंत हुआ।

कालयवन का अभिमान और नारद मुनि का आगमन

उन दिनों कालयवन नाम का एक बलशाली दैत्य था। उसे अपनी शक्ति और अपनी बेजोड़ सेना पर बहुत अभिमान था। एक दिन जब नारद मुनि उससे मिलने गए तो वह डींग हाँकते हुए बोला, ‘‘संसार में ऐसा कोई नहीं है जो मेरा मुकाबला कर सके। मैंने संसार के प्रत्येक योद्धा को अपनी शक्ति का लोहा मानने पर विवश कर दिया है।’’

नारद मुनि तो विधाता का कोई उद्देश्य लेकर ही वहाँ गए थे। वे बोले, ‘‘कालयवन, मैं तुम्हारी शक्ति के विषय में भली भाँति जानता हूँ। लेकिन क्या तुमने कृष्ण और बलराम के विषय में नहीं सुना? आजकल लोग कहने लगे हैं कि पृथ्वी पर उन दोनों की शक्ति को कोई चुनौती नहीं दे सकता।’’

नारद मुनि की यह टिप्पणी कालयवन की क्रोधाग्नि को भड़काने के लिए पर्याप्त थी। अपने नृशंस सैनिकों के साथ वह मथुरा की ओर चल पड़ा। वह दोनों भाइयों की शक्ति को कुचल कर विश्व के सामने अपनी शक्ति का सिक्का जमा देना चाहता था।

मथुरा पर कालयवन की चढ़ाई और जरासंध के आने की चिंता

शीघ्र ही उसकी सेना मथुरा नगर के द्वार तक जा पहुँची। कालयवन अपने रथ पर खड़ा होकर उन्हें युद्ध के लिए ललकारने लगा। जब दोनों भाई युद्ध के लिए तैयार हो रहे थे, तभी एक दूत भागता हुआ आया और उनसे बोला, ‘‘मगध नरेश अपनी सेना के साथ मथुरा पर चढ़ा आ रहा है। एक-दो दिनों में ही वह यहाँ पहुँच जाएगा।’’

कृष्ण और बलराम के लिए यह गम्भीर चिंता का विषय था। कृष्ण ने बलराम से कहा, ‘‘दाऊ, अब हम क्या करें? कहीं ऐसा न हो कि जब हम कालयवन की सेना से मुकाबला करने में व्यस्त हों, उसी समय जरासंध हमारे नगर में प्रवेश करके नागरिकों को मार डाले या कारागार में डाल दे।’’

बलराम भी तत्काल फैसला नहीं कर सके कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए। कृष्ण ने कहा, ‘‘दाऊ, हमें मथुरा के लोगों को जरासंध के यहाँ आने से पहले ही किसी सुरक्षित स्थान पर भेज देना चाहिए।’’ बलराम ने भी कृष्ण की बात से सहमति व्यक्त की।

कृष्ण के संकल्प से द्वारका नगरी का सृजन

फिर कृष्ण ने आँखें बंद करके मन में संकल्प किया। उनके ऐसा करते ही भारत के पश्चिमी तट पर द्वारका नगरी का सृजन हो गया। अपनी शक्ति के बल पर कृष्ण ने मथुरा के सभी नागरिकों, मवेशियों, भवनों और धन-दौलत को द्वारका स्थानांतरित कर दिया।

कालयवन की ललकार और कृष्ण का पैदल आगे बढ़ना

फिर कृष्ण और बलराम अपनी छोटी-सी सेना के साथ मथुरा के उस द्वार से बाहर निकले जहाँ कालयवन छाती फुलाए खड़ा था। शीघ्र ही दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध शुरू हो गया।

कृष्ण पैदल ही कालयवन के रथ की ओर चल पड़े। जब कालयवन ने कृष्ण को अपनी ओर आते देखा तो वह रथ से उतर कर कृष्ण को मारने के लिए उनकी ओर दौड़ा। उसे अपनी ओर आते देखकर कृष्ण मुड़े और वापस चल पड़े। इस पर कालयवन चिल्लाया, ‘‘अरे कायर, इस तरह भाग क्यों रहे हो? अगर इतना ही डरते हो तो डींग हाँकते क्यों घूमते थे? अब तुम्हें स्वयं को वीर कहने में संकोच होना चाहिए और मेरा भय स्वीकार करना चाहिए। चिंता न करो, तुम आत्मसमर्पण कर दो। मुँह में तिनका दबाकर मेरे पास आ जाओ। मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा और कोई हानि नहीं पहुँचाऊँगा।’’

कृष्ण ने कालयवन की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया और चलते रहे। कालयवन उनके पीछे दौड़ रहा था। लेकिन भरसक कोशिश के बाद भी वह उन्हें पकड़ नहीं पा रहा था। जब भी वह उन्हें पकड़ने के लिए हाथ घुमाता, उसका हाथ हवा में ही लहराकर रह जाता। अगले ही क्षण उसे लगता जैसे कृष्ण उससे बहुत आगे पहुँच गए हों।

ऋषि मुचुकुंद की गुफा में कालयवन का अंत

मीलों दूर पहुँचने के बाद कृष्ण ऋषि मुचुकुंद की गुफा में प्रवेश कर गए। कालयवन भी कृष्ण के पीछे ही था। वह अब भी चिल्ला रहा था, ‘‘तुम मुझसे बचकर भाग नहीं सकोगे। आज तुम्हारे जीवन का अंतिम दिन है। हाँ, अगर तुम मेरे सामने समर्पण कर दो तो मैं तुम्हें कम दर्दनाक मौत दूँगा।’’

गुफा के अंदर घनघोर अंधेरा था। आरम्भ में तो कालयवन को कुछ देख पाना ही मुश्किल लग रहा था, लेकिन धीरे-धीरे वह अंधेरे का अभ्यस्त हो गया। तभी उसकी दृष्टि गुफा के एक कोने में सोए एक व्यक्ति पर पड़ी। व्यक्ति ने अपना शरीर एक चादर से ढक रखा था। उसने उस व्यक्ति को कृष्ण समझ लिया और उसे कसकर एक ठोकर लगाई, ‘‘दुष्ट, युद्धभूमि छोड़कर भाग आया है और चादर ओढ़कर लेटा है!’’

वह व्यक्ति वास्तव में महर्षि मुचुकुंद थे। कालयवन की लात पड़ते ही वे अचकचा कर उठ बैठे। उनके मुँह से निकल पड़ा, ‘‘ऋषि मुचुकुंद की नींद में किसने बाधा डाली?’’

ऋषि मुचुकुंद की दृष्टि कालयवन पर पड़ी जो बड़ी हैरानी से उन्हें देख रहा था। ऋषि की क्रोध से जलती आँखें जब कालयवन पर पड़ीं तो वह धू-धू करके जलने लगा। इस प्रकार उसकी मृत्यु हो गई।

कृष्ण की वापसी और यादव सेना की विजय

बलराम अब तक कालयवन की सेना से लड़ते हुए थक चुके थे। लेकिन तभी कृष्ण लौट आए। इससे यादव सेना का उत्साह बढ़ गया और वह फिर से पूरे उत्साह के साथ कालयवन के सैनिकों पर टूट पड़ी। शीघ्र ही कालयवन की सेना कृष्ण और बलराम के हाथों पराजित होकर भाग गई।

भक्ति से जुड़ा संदेश: शरणागत की रक्षा और अहंकार का अंत

इस कथा में भक्ति का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भगवान अपनी शरण में आए लोगों की रक्षा के लिए असंभव को भी संभव कर देते हैं। जब कृष्ण ने केवल आँखें बंद करके संकल्प किया, तब पश्चिमी तट पर द्वारका नगरी बस गई और मथुरा के सभी नागरिक, पशु और धन वहाँ सुरक्षित पहुँच गए। जो भक्त अपने जीवन की डोर प्रभु के हाथ में सौंप देता है, उसकी चिंता प्रभु स्वयं उठाते हैं।

कथा यह भी दिखाती है कि ईश्वर की लीला के पीछे गहरा उद्देश्य होता है। नारद मुनि का कालयवन के पास जाना विधाता के किसी उद्देश्य से जुड़ा था, और कृष्ण का पीछे हटते हुए कालयवन को मुचुकुंद की गुफा तक ले जाना भी उसी लीला का भाग था। भक्त को हर परिस्थिति में विश्वास रखना चाहिए कि प्रभु की योजना में कुछ भी निरर्थक नहीं होता।

कालयवन का अभिमान उसके विनाश का कारण बना। जो स्वयं को अजेय समझता था, वह एक तपस्वी ऋषि की नींद में बाधा डालने के कारण भस्म हो गया। भक्ति का मार्ग विनम्रता और संतों के प्रति आदर सिखाता है, क्योंकि अहंकार में किया गया अपमान अंततः विनाश की ओर ले जाता है।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि अभिमान सबसे बड़ा शत्रु है। कालयवन को अपनी शक्ति पर इतना घमंड था कि वह नारद मुनि की एक टिप्पणी से भड़क गया और अपने ही विनाश की ओर चल पड़ा।

दूसरी सीख यह है कि संकट की घड़ी में धैर्य और विवेक से निर्णय लेना चाहिए। कृष्ण और बलराम ने नागरिकों की रक्षा को सबसे पहले रखा और सुरक्षित स्थान का प्रबंध किया।

तीसरी सीख यह है कि ईश्वर में अटल विश्वास रखने वाले की रक्षा का उपाय स्वयं प्रभु निकाल देते हैं। द्वारका का सृजन इसी विश्वास का प्रतीक है।

चौथी सीख यह है कि संतों और तपस्वियों का अनादर कभी नहीं करना चाहिए। कालयवन ने महर्षि मुचुकुंद को पहचाने बिना उन पर प्रहार किया और उसका परिणाम उसे तुरंत मिला।

पाँचवीं सीख यह है कि अपमानजनक शब्दों और ललकार का उत्तर देना हर बार आवश्यक नहीं होता। कालयवन के ताने सुनकर भी कृष्ण ने ध्यान नहीं दिया और अपनी योजना पर चलते रहे।

कथा का सार

मथुरा के नागरिकों की रक्षा के लिए कृष्ण ने संकल्प से द्वारका का निर्माण किया और कालयवन के अहंकार का अंत ऋषि मुचुकुंद की गुफा में हुआ। यह कथा सिखाती है कि अभिमान चाहे कितना भी बड़ा हो, वह प्रभु की लीला के आगे टिक नहीं पाता, और जो प्रभु की शरण में है, उसकी रक्षा का मार्ग प्रभु स्वयं बनाते हैं। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।