श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 20

धेनुकासुर वध: गधे के रूप में रहने वाले राक्षस और फलों के बगीचे की कथा

फलों से लदे एक सुंदर बगीचे में गोप कृष्ण और बलराम के साथ पहुँचे, जो गधे के रूप वाले राक्षस धेनुकासुर का था। बलराम ने उसे और उसके पूरे परिवार को मार डाला और फिर सब बगीचे के फलों का आनंद लेने लगे। पढ़ें पूरी कथा।

धेनुकासुर वध: गधे के रूप में रहने वाले राक्षस और फलों के बगीचे की कथा
धेनुकासुर वध: गधे के रूप में रहने वाले राक्षस और फलों के बगीचे की कथा — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

कुछ समय तक वृंदावन में शांति रही, क्योंकि कंस समझ नहीं पा रहा था कि कृष्ण को मारने के लिए अब किस दानव को भेजे। इस बीच कृष्ण और बलराम बड़े होकर लंबे-बाँके नवयुवक बन गए थे। एक दिन जंगल में फलों से लदे बगीचे को देखकर गोपों के मुँह में पानी आ गया, पर वह बगीचा एक भयानक राक्षस का था।

वृंदावन की शांति और बड़े होते कृष्ण-बलराम

कुछ समय तक वृंदावन में शांति रही, क्योंकि अपने कई दानवों के मारे जाने के कारण कंस निश्चय नहीं कर पा रहा था कि कृष्ण को मारने के लिए क्या उपाय करे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके दानवों में से कौन कृष्ण को मार सकेगा।

उधर कृष्ण और बलराम भी समय के साथ बड़े हो रहे थे। अब वे लंबे-बाँके नवयुवक बन गए थे और उन्हें मवेशियों को लेकर जंगल में काफी दूर तक जाने की अनुमति मिल गई थी। नए स्थानों पर जाकर उन्हें बहुत आनंद आता था। ग्वालों को भी उनके साथ घने जंगलों में जाने में बिल्कुल डर नहीं लगता था, क्योंकि वे जानते थे कि जब तक कृष्ण और बलराम साथ हैं, उन पर कोई मुसीबत नहीं आएगी।

फलों से लदा सुंदर बगीचा

एक दिन चरागाहों से गुजरते समय उन्हें एक सुंदर बगीचा दिखाई दिया। उसके पेड़ सुंदर फलों से लदे थे। उन रसीले फलों को देखकर गोपों के मुँह में पानी आ गया। उन्होंने कृष्ण और बलराम से कहा कि वे जानते हैं कि दोनों बहुत शक्तिशाली हैं और उनकी शक्ति की बराबरी कोई नहीं कर सकता, इसलिए वे उनके लिए इन पेड़ों के फल ला दें, जो देखने में बड़े स्वादिष्ट लग रहे हैं।

धेनुकासुर और उसका परिवार

वह बगीचा धेनुकासुर नाम के एक भयानक राक्षस का था, जो विशाल गधे का रूप धारण करके रहता था। उसे अपने बगीचे से बहुत प्रेम था और वह किसी को भी उसके पास नहीं आने देता था। उसके साथ उसका परिवार भी रहता था, और जंगल के उस क्षेत्र को वे सभी अपना साम्राज्य समझते थे।

जिस समय गोप बगीचे में पहुँचे, उस समय दानव परिवार दोपहर की नींद ले रहा था, इसलिए गोपों की निगाह उन पर नहीं पड़ी।

धेनुकासुर का क्रोध और बलराम का पराक्रम

बलराम ने एक पेड़ पर चढ़कर उसे जोर से हिलाया। तत्काल कई फल नीचे गिर पड़े। सभी गोप जल्दी-जल्दी फल बटोरने लगे और कोलाहल करते हुए खाने लगे। उनकी आवाजें सुनकर धेनुकासुर की आँख खुल गई। अपने बगीचे में ग्वालों को देखकर उसके क्रोध की सीमा न रही।

अपने खुरों से धूल उड़ाता हुआ वह गोपों की ओर दौड़ा। उसकी ऊँचाई गोपों से तीन गुना ज्यादा थी, दाँत नोकीले और आँखें लाल थीं। गधे की तरह आवाज करते हुए उसने बलराम पर आक्रमण किया और पिछले पैर से प्रहार करना चाहा, पर बलराम उससे कहीं अधिक तेज थे।

उन्होंने फुर्ती से उसके उन्हीं पैरों को पकड़कर उसे हवा में उठा लिया। उसे हवा में तीन बार घुमाकर उन्होंने एक पेड़ पर दे मारा। चीत्कार करता हुआ वह दानव तुरंत मर गया।

पूरे परिवार का अंत

धेनुकासुर की मौत देखकर उसके परिवार के क्रोध की सीमा न रही। वे सब भी टापों से धूल उड़ाते हुए गोपों की ओर दौड़े। कृष्ण और बलराम ने गोपों से उन जंगली गधों के मार्ग से हट जाने को कहा और स्वयं उनका मुकाबला करने आगे आ गए।

उन सभी को यमराज के हवाले करने में उन्हें अधिक समय नहीं लगा। चीत्कार करते हुए वे सभी गधे मृत्यु को प्राप्त हो गए।

फलों का आनंद

फिर कृष्ण, बलराम और उनके सभी साथियों ने फलों का आनंद उठाया। उस दिन के बाद वे सब फल खाने के लिए उसी बगीचे में जाने लगे। पूरा दिन वे वहीं घने वृक्षों की छाया में खेलते और उनके फलों का स्वाद लेते।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि दूसरों की सीमाओं का आदर करना चाहिए। गोप बिना जाने दूसरे के बगीचे में पहुँचकर फल खाने लगे, और इसी से संघर्ष खड़ा हुआ। किसी की संपत्ति में प्रवेश करने से पहले जानकारी और अनुमति का ध्यान रखना जरूरी है।

दूसरी सीख यह है कि अहंकार और अधिकार का घमंड पतन का कारण बनता है। धेनुकासुर और उसका परिवार पूरे क्षेत्र को अपना साम्राज्य समझते थे, पर उनका वही घमंड उनके विनाश का कारण बना।

तीसरी सीख भाइयों और मित्रों के आपसी विश्वास की है। गोपों को पूरा विश्वास था कि कृष्ण और बलराम साथ हैं तो कोई संकट नहीं आएगा, और संकट आने पर दोनों भाइयों ने आगे बढ़कर सबको बचाया।

कथा का सार

धेनुकासुर के अंत के बाद वह बगीचा गोपों के आनंद का स्थान बन गया। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।