श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 60
देवी दुर्गा की चेतावनी: कंस के हाथ से छूटी कन्या की कथा
कन्या के रोते ही कंस कारागार पहुँचा और उसे पटकने चला, पर कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में देवी दुर्गा के रूप में प्रकट हुई। देवी ने चेतावनी दी कि कंस का काल जन्म ले चुका है। पढ़ें पूरी कथा।

वासुदेव के कारागार लौटते ही जंजीरों ने फिर उन्हें जकड़ लिया और उसी क्षण गोद में रखी कन्या ने रोना शुरू कर दिया। यह रोना कंस के लिए वह समाचार था जिसकी वह व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा था, पर इस बार उसके हाथ से उसका शिकार निकल गया और उसे मिली एक कठोर चेतावनी।
कन्या का रोना और कंस का आगमन
जैसे ही जंजीरों ने वासुदेव और देवकी को दोबारा जकड़ा, उस कन्या ने तेज स्वर में रोना शुरू कर दिया। अगले ही पल पहरेदार अपनी गहरी नींद से जाग उठे। बच्चे के रोने की आवाज सुनकर कुछ पहरेदार भागते हुए कंस को सूचना देने गए।
कंस तो व्यग्रता से इसी समाचार की प्रतीक्षा कर रहा था। वह तुरंत पहरेदारों के साथ कारागार की ओर दौड़ पड़ा।
देवकी की गुहार
कंस को सामने देखकर देवकी उसके पैरों पर गिरकर गिड़गिड़ाने लगी। उसने कहा कि कंस ने उसकी सभी संतानों के प्राण ले लिए हैं, पर इस बार उसकी आठवीं संतान बेटा नहीं बल्कि बेटी है, जो किसी भी तरह कंस को हानि नहीं पहुँचा सकती। उसने भगवान का वास्ता देकर कन्या की हत्या न करने की विनती की।
लेकिन नृशंस कंस ने बहन की एक न सुनी। वह तो उसकी सभी संतानों के प्राण हर लेने पर उतारू था। उसने देवकी के हाथों से कन्या को छीन लिया, उसे पैरों की ओर से पकड़ा और फर्श पर पटककर मारने के लिए तैयार हुआ।
चमत्कार: कन्या बनी देवी दुर्गा
तभी एक चमत्कार हुआ। वह कन्या कंस के हाथ से छूटकर आकाश में जा पहुँची और वहीं उसने देवी दुर्गा का रूप धारण कर लिया। कंस यह देखकर हैरान रह गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि नवजात कन्या उसके बलशाली हाथों से कैसे छूट गई।
तब देवी ने कंस को चेतावनी देते हुए कहा, “अरे मनुष्य वेशधारी दानव, तेरा काल तो पहले ही जन्म ले चुका है और अब वह एक सुरक्षित स्थान पर है। वह शीघ्र ही तेरा जीवन समाप्त कर विश्व को आसुरी शक्तियों से मुक्ति दिलाएगा। मैं कोई साधारण कन्या नहीं, बल्कि देवी दुर्गा हूँ। मुझे हानि पहुँचाना तेरे वश के बाहर की बात है।”
कंस की उलझन और नया आदेश
कंस को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। इतने पहरेदारों की मौजूदगी में उसका काल सुरक्षित स्थान तक कैसे पहुँच गया? वासुदेव और देवकी तो जंजीरों में बंधे थे और उसके विरुद्ध षड्यंत्र करने की हालत में ही नहीं थे। उसे कुछ समझ नहीं आया।
अंत में अपने शत्रु को मारने की शपथ लेकर वह क्रोध से पैर पटकता हुआ कारागार से बाहर चला गया। महल पहुँचकर कंस ने विकट दानवों और दानवियों को बुलाया और उन्हें श्रावण माह में उत्पन्न होने वाले राज्य के सभी शिशुओं को मार डालने का आदेश दिया।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि अधर्मी चाहे कितना भी बलशाली हो, ईश्वर की योजना को नहीं रोक सकता। जिस कन्या को कंस अपने बलशाली हाथों से भी नहीं पकड़ सका, वह स्वयं देवी दुर्गा निकली।
दूसरी सीख यह है कि चेतावनी मिलने पर भी जो अहंकार और क्रोध में अंधा हो, वह सुधरता नहीं, बल्कि और बड़े पाप की ओर बढ़ता है। कंस ने देवी की बात सुनकर भी निर्दोष शिशुओं के वध का आदेश दे दिया।
तीसरी बात यह कि देवकी की गुहार में माँ के हृदय की पुकार है। निर्दयता के सामने भी करुणा की आवाज उठानी चाहिए, क्योंकि अंत में धर्म की ही जीत होती है।
कथा का सार
देवी दुर्गा की यह चेतावनी कंस के अंत की घोषणा थी, पर उसने सुधरने के बजाय और क्रूरता का मार्ग चुना। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।