श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 46
भीम का प्रहार: राजसूय यज्ञ, कृष्ण की युक्ति और जरासंध से सत्ताईस दिन का मल्लयुद्ध
जरासंध ने सहानुभूति रखने वाले राजाओं को बंदी बना लिया और युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के मार्ग में खड़ा हो गया। कृष्ण, अर्जुन और भीम ब्राह्मण वेश में मगध पहुँचे और जरासंध को मल्लयुद्ध की चुनौती दी। सत्ताईस दिन तक भीम और जरासंध का भीषण संग्राम चलता रहा। पढ़ें पूरी कथा।

जरासंध ने कृष्ण-बलराम को पराजित मानकर अभिमान में उन सभी राजाओं को बंदी बना लिया जो कृष्ण से सहानुभूति रखते थे। इधर युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के लिए जरासंध का अंत आवश्यक था, इसलिए कृष्ण ने अर्जुन और भीम के साथ ब्राह्मण वेश में मगध जाकर उसे मल्लयुद्ध की चुनौती दी।
जरासंध का अभिमान और बंदी बनाए गए राजा
बाद में जब जरासंध को पता चला कि कृष्ण और बलराम जीवित हैं, तो वह इससे जरा भी विचलित नहीं हुआ। वह मुस्कुराता हुआ बोला, ‘‘अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पूरा संसार जानता है कि मैंने कैसे दोनों भाइयों को पराजित किया और मथुरा से बाहर खदेड़ दिया। मैं धरती का सबसे शक्तिशाली राजा हूँ। जो राजा कृष्ण और बलराम से सहानुभूति रखते हैं, अब मैं उन्हें भी दंड दूँगा। सेना को तैयार होने का आदेश दो।’’
इसके बाद तो महत्वाकांक्षी जरासंध ने अति ही कर दी। उसने उन सभी राजाओं के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया जो कृष्ण के प्रति सहानुभूति रखते थे। उसने उन सभी को पराजित करके कारागार में डाल दिया।
पांडवों का इंद्रप्रस्थ और युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ का विचार
उन्हीं दिनों कृष्ण के फुफेरे भाई पांडवों को इंद्रप्रस्थ का राज्य मिला था। एक दिन ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर के शुभचिंतकों ने उन्हें राजसूय यज्ञ करने की सलाह दी। राजसूय यज्ञ वह राजा करता था जो चक्रवर्ती सम्राट बनना चाहता था। यदि युधिष्ठिर इस यज्ञ को सफलतापूर्वक सम्पन्न कर लेते तो निर्विवाद रूप से वे भारतभूमि के सर्वोच्च नरेश बन जाते।
राजसूय यज्ञ के प्रस्ताव पर युधिष्ठिर विचार में पड़ गए, ‘‘राजसूय यज्ञ करना किसी भी राजा के लिए यशोदायी बात है। लेकिन मैं चक्रवर्ती सम्राट तभी बन सकता हूँ जब जरासंध को परास्त कर दूँ। क्या यह सम्भव है? मुझे इस सम्बंध में कृष्ण से सलाह लेनी चाहिए।’’
कृष्ण का सुझाव और ब्राह्मण वेश में मगध की यात्रा
कुछ ही दिनों बाद कृष्ण युधिष्ठिर से मिलने आए। जब युधिष्ठिर ने कृष्ण का सुझाव माँगा तो वे बोले, ‘‘राजसूय यज्ञ करने के लिए आपको जरासंध को समाप्त करना पड़ेगा और उसके द्वारा बंदी बनाए गए सभी नरेशों को मुक्त भी करना होगा। इस कार्य में मैं आपको अपना पूर्ण सहयोग देने को प्रस्तुत रहूँगा।’’
‘‘क्या जरासंध से सीधा युद्ध करना ठीक होगा?’’ युधिष्ठिर ने पूछा।
‘‘सीधा युद्ध हम नहीं करेंगे। हम मल्लयुद्ध में उस दुष्ट नरेश को समाप्त करेंगे,’’ कृष्ण रहस्यमय हँसी हँसते हुए बोले, ‘‘आप अर्जुन और भीम को मेरे साथ भेज दीजिए। बाकी प्रबंध मैं कर दूँगा।’’ युधिष्ठिर की सहमति से कृष्ण अर्जुन और भीम को साथ लेकर चल पड़े। वे सब ब्राह्मणों का वेश रखकर चल रहे थे। वे सब मगध की राजसभा में पहुँच गए। कृष्ण ने हाथ जोड़कर जरासंध से कहा, ‘‘नरेश, हम बहुत दूर से आए हैं। आशा है आप हमें निराश नहीं करेंगे।’’
जरासंध की राजसभा में मल्लयुद्ध की चुनौती
उनकी बातें सुनकर जरासंध की आँखें सिकुड़ गईं। उनका रंगरूप देखकर वह समझ गया था कि वे तीनों ब्राह्मण नहीं, बल्कि क्षत्रिय हैं। उसने कहा, ‘‘आप मुझे बताइए कि आप क्या चाहते हैं। यदि मेरे वश में आपकी इच्छा को पूरी करना होगा तो मैं अवश्य पूरा करूँगा।’’
कृष्ण बोले, ‘‘हमारी इच्छा है कि आप हममें से किसी एक के साथ मल्लयुद्ध करें।’’
इस पर जरासंध हँसता हुआ बोला, ‘‘शायद आप जानते नहीं हैं कि मैं ब्राह्मणों से नहीं लड़ता।’’
तब कृष्ण ने बात साफ की, ‘‘हम ब्राह्मण नहीं बल्कि ब्राह्मण वेशधारी क्षत्रिय हैं। मैं समझता हूँ कि आपको हमारी शक्ति और पराक्रम की जानकारी होगी।’’
यह सुनकर जरासंध ने कृष्ण, भीम और अर्जुन को ध्यान से देखा और उन्हें पहचान गया। वह मल्लयुद्ध के लिए सहमत होते हुए बोला, ‘‘ठीक है, मैं मल्लयुद्ध करने के लिए तो तैयार हूँ। लेकिन कृष्ण के साथ मैं कदापि युद्ध नहीं करूँगा। यह युद्धभूमि छोड़कर भाग जाने वाला कायर है। अर्जुन का शरीर मल्लयुद्ध के योग्य नहीं है। यह धनुर्विद्या में प्रवीण भले ही हो, लेकिन मल्लयुद्ध में मेरा मुकाबला करने की शक्ति इसमें नहीं है। हाँ, भीम मेरे जोड़ का है। इससे मैं मुकाबला करूँगा। बलवान शत्रु को मारकर मुझे भी यश प्राप्त होगा।’’
भीम ने ठहाका लगाया, ‘‘वह तो समय बताएगा, जरासंध, कि यश किसे प्राप्त होता है।’’
भीम और जरासंध का गदायुद्ध
जरासंध ने भीम को एक भारी गदा उछाल कर दी और एक गदा स्वयं उठा ली। फिर वे दोनों अखाड़े की ओर चल पड़े। वहाँ भारी भीड़ जमा हो गई थी। दोनों ने अखाड़े की मिट्टी को उठाकर अपने माथे पर लगाया और गदाएँ उठाकर भिड़ गए। उनकी गदाएँ टकराने से वज्राघात के समान आवाज हुई। भारी गदाओं के टकराने से चिनगारियाँ निकल रही थीं।
तभी जरासंध ने उछलकर भीम के सिर पर गदा का प्रहार किया। लेकिन भीम ने जरासंध का वह प्रहार अपनी गदा पर थाम लिया और जरासंध पर पलटकर वार किया। जरासंध फुर्ती से भीम का वार बचा गया। दोनों ही योद्धा पूरी ताकत से एक-दूसरे पर अपनी गदाओं पर प्रहार कर रहे थे। लेकिन कोई किसी से कमजोर नहीं पड़ रहा था। कभी दोनों गदाएँ फेंककर घूँसों से लड़ने लगते और आपस में गुथ जाते, तो कभी वे एक-दूसरे को हवा में उठाकर जमीन पर पटकने की कोशिश करते।
सत्ताईस दिनों का संग्राम और कृष्ण का विचार
सत्ताईस दिनों तक भीम और जरासंध का भीषण संग्राम चलता रहा। लेकिन मुकाबले का कोई परिणाम नहीं निकला। अट्ठाइसवें दिन कृष्ण ने सोचा, ‘आज मुझे युद्ध के परिणाम का आयोजन करना चाहिए।’
भक्ति से जुड़ा संदेश: प्रभु का मार्गदर्शन और धर्म की स्थापना
इस कथा में युधिष्ठिर का आचरण भक्ति और विवेक का सुंदर उदाहरण है। राजसूय यज्ञ जैसे बड़े संकल्प से पहले उन्होंने अपनी बुद्धि पर अकेले भरोसा नहीं किया, बल्कि कहा कि मुझे कृष्ण से सलाह लेनी चाहिए। भक्त के जीवन में भी यही सीख है कि हर बड़े निर्णय से पहले ईश्वर और सच्चे मार्गदर्शक की शरण लेनी चाहिए।
कृष्ण ने सीधे युद्ध की जगह मल्लयुद्ध की युक्ति सुझाई और बाकी प्रबंध स्वयं करने का आश्वासन दिया। जो भक्त प्रभु को अपना मार्गदर्शक मान लेता है, उसे हर कठिन कार्य का मार्ग प्रभु स्वयं दिखाते हैं। कृष्ण का यह वचन कि मैं पूर्ण सहयोग दूँगा, शरणागत के प्रति ईश्वर के आश्वासन का प्रतीक है।
इस कथा में कृष्ण का उद्देश्य केवल एक राजा को हराना नहीं, बल्कि बंदी बनाए गए सभी राजाओं को मुक्त कराना भी है। भगवान के कार्य में अपना हित नहीं, दूसरों के कल्याण की भावना होती है। जरासंध का अहंकार जिस अत्याचार का कारण बना, उसका अंत करने के लिए प्रभु ने धैर्य और सही समय की प्रतीक्षा की, और अट्ठाइसवें दिन परिणाम का आयोजन सोचने की बात यही दिखाती है कि हर कार्य की प्रभु की अपनी लीला और अपना समय होता है।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
पहली सीख यह है कि अहंकार में किया गया अत्याचार अंततः अपने ही विनाश का कारण बनता है। जरासंध ने स्वयं को सबसे शक्तिशाली मानकर सहानुभूति रखने वाले राजाओं को भी कारागार में डाल दिया।
दूसरी सीख यह है कि बड़े निर्णय से पहले अनुभवी और सच्चे मार्गदर्शक की सलाह लेनी चाहिए। युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ के विषय में कृष्ण से परामर्श करना उचित समझा।
तीसरी सीख यह है कि हर समस्या का समाधान सीधे टकराव से नहीं, सही युक्ति और रणनीति से भी निकलता है। कृष्ण ने सीधे युद्ध की जगह मल्लयुद्ध का मार्ग चुना।
चौथी सीख यह है कि कठिन कार्य में धैर्य रखना आवश्यक है। सत्ताईस दिन तक कोई परिणाम नहीं निकला, फिर भी भीम डटे रहे और कृष्ण ने उचित समय की प्रतीक्षा की।
पाँचवीं सीख यह है कि अपने से कमजोर या अलग दिखने वाले को तुच्छ मानना भूल है। जरासंध ने अर्जुन को मल्लयुद्ध के अयोग्य और कृष्ण को कायर कहा, पर यह उसका अपना अभिमान था।
कथा का सार
जरासंध के अहंकार को समाप्त करने और बंदी राजाओं को मुक्त कराने के लिए कृष्ण, अर्जुन और भीम ब्राह्मण वेश में मगध पहुँचे, और सत्ताईस दिनों के संग्राम के बाद अट्ठाइसवें दिन कृष्ण ने युद्ध के परिणाम की योजना सोची। यह कथा सिखाती है कि प्रभु का मार्गदर्शन और उचित समय की प्रतीक्षा ही बड़े से बड़े अत्याचार के अंत का मार्ग खोलती है। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।