श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ · अध्याय 29

अरिष्टासुर वध: साँड़ बनकर आए राक्षस का कृष्ण के हाथों अंत

कंस ने राक्षस अरिष्टासुर को वृंदावन भेजा, जिसने साँड़ का रूप धरकर खेत और चरागाह उजाड़ दिए। किसानों की पुकार पर कृष्ण ने उसके सींग पकड़कर उसे पटक दिया और उसी के सींग से उसका वध कर दिया। पढ़ें पूरी कथा।

अरिष्टासुर वध: साँड़ बनकर आए राक्षस का कृष्ण के हाथों अंत
अरिष्टासुर वध: साँड़ बनकर आए राक्षस का कृष्ण के हाथों अंत — श्रीकृष्ण बाल लीलाएँ

कृष्ण और बलराम के पराक्रम की चर्चा से परेशान कंस ने इस बार अरिष्टासुर को वृंदावन भेजा। साँड़ का रूप धरकर उसने खेतों और चरागाहों में उत्पात मचाया, पर किसानों की पुकार सुनते ही कृष्ण उनकी रक्षा के लिए आगे आए।

कंस की चिंता और अरिष्टासुर का चुनाव

वृंदावन में अब कृष्ण और बलराम के साहस और पराक्रम की ही चर्चा होती रहती थी। लोग तो अब खुलकर कहने लगे थे कि उन दोनों भाइयों में दैवी शक्तियाँ हैं। कंस अब बहुत परेशान हो गया था। अभी तक उसके भेजे गए सभी राक्षस कृष्ण के हाथों मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब वह किस राक्षस को कृष्ण के पास भेजे। आखिरकार उसने एक अन्य बलवान राक्षस अरिष्टासुर को कृष्ण के पास भेजने का निर्णय किया।

साँड़ बनकर आए अरिष्टासुर का उत्पात

अरिष्टासुर वृंदावन जा पहुँचा और उसने साँड़ का रूप धारण कर लिया। चरागाहों में धमाचौकड़ी करता हुआ वह पेड़-पौधों को कुचलने और उखाड़ने लगा। किसानों के खेतों में घुसकर उसने उनकी फसल नष्ट करनी शुरू कर दी। तब किसान और अन्य लोग सहायता माँगने के लिए कृष्ण के पास जा पहुँचे। कृष्ण से अपनी व्यथा बताते हुए उन्होंने कहा, “इस साँड़ ने हमें बहुत नुकसान पहुँचाया है। खेतों में घुसकर उसने हमारी फसल नष्ट कर दी है। खेतों में की गई हमारी सारी मेहनत साँड़ ने बेकार कर दी है। इस तरह हमारे सामने जीने-मरने का संकट खड़ा हो गया है। इतना ही नहीं वह चरागाह को भी नष्ट कर रहा है। हमारे सामने अपने मवेशियों को चराने की समस्या भी खड़ी हो जाएगी। कृष्ण, अब तो हमें तुम्हारा ही आसरा है।” कृष्ण उन सबको दिलासा देते हुए बोले, “चिंता मत करो। मैं तुम्हारे साथ खेतों तक चलूँगा।”

कृष्ण ने पहचानी असलियत और साँड़ को ललकारा

एक खेत में जाकर कृष्ण ने देखा कि वहाँ साँड़ ने किस तरह उत्पात मचाया है। उसी समय साँड़ भी वहाँ आ पहुँचा। उसे देखते ही कृष्ण उसकी असलियत समझ गए। वे उसे डाँटते हुए बोले, “मूर्ख, तू इन निर्दोष किसानों और चरवाहों को क्यों परेशान कर रहा है? चुपचाप यहाँ से चला जा, नहीं तो तुझे अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा।” यह कहकर कृष्ण एक गाँववाले के कंधे पर हाथ रखकर खड़े हो गए। उनके मुख पर भय लेशमात्र भी नहीं था। यह देखकर वह साँड़ गुस्से से फुफकारने लगा। जमीन पर अपने पैर पटकता हुआ वह कृष्ण की ओर दौड़ पड़ा। जैसे ही उसने कृष्ण पर अपने सींगों से आक्रमण किया, वे फुर्ती से उसके रास्ते से अलग हो गए और फिर उसके सींगों को कसकर पकड़ लिया।

अरिष्टासुर का वध और किसानों की जय-जयकार

साँड़ ने कृष्ण को पटकने की कोशिश की, लेकिन सारी ताकत लगा देने पर भी वह उन्हें हिला तक नहीं सका। कृष्ण खड़े हुए मुस्कुरा रहे थे। फिर वे साँड़ को धक्का देते हुए उसे कुछ पीछे तक ले गए। साँड़ उनकी पकड़ से निकलने के लिए छटपटा रहा था। तभी कृष्ण ने उसे हवा में उठा लिया। तीन बार घुमाकर उन्होंने उसे जमीन पर पटक दिया। साँड़ पीड़ा से चीत्कार करने लगा। कृष्ण ने उसे उठने का मौका दिए बगैर पीटना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद कृष्ण ने उसके दोनों सींग अपने दोनों हाथों से पकड़कर उखाड़ लिए। फिर वे सींग कृष्ण ने साँड़ के ही पेट में घोंप दिए। फलस्वरूप साँड़ बने अरिष्टासुर की तुरंत मृत्यु हो गई। मरते ही वह अपने असली रूप में आ गया। यह देखकर किसान और ग्वाले कृष्ण की जय-जयकार कर उठे। उन्होंने कृष्ण को उनकी मदद के लिए धन्यवाद दिया।

भक्ति से जुड़ा संदेश: जिसे केवल कृष्ण का आसरा, उसे किसी का भय नहीं

इस कथा में भक्ति का सुंदर संदेश है। जब साँड़ ने खेत और चरागाह उजाड़ दिए, तब किसानों ने किसी और के पास जाने के बजाय कृष्ण से कहा कि अब तो हमें तुम्हारा ही आसरा है। जिसने भगवान का आसरा पकड़ लिया, उसे अंत में निराश नहीं होना पड़ता।

कृष्ण ने भी उन्हें दिलासा दी और स्वयं उनके साथ खेतों तक गए। भगवान अपने भक्तों की पुकार सुनकर दूर से ही आशीर्वाद नहीं देते, वे उनके संकट में साथ खड़े होते हैं।

इस कथा से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख यह है कि संकट में ईश्वर का आसरा लेना चाहिए। किसानों ने कृष्ण से सहायता माँगी और कृष्ण ने उन्हें दिलासा देकर उनकी रक्षा की।

दूसरी सीख यह है कि निर्दोष लोगों को सताने वाला चाहे कितना भी बलवान हो, उसका अंत निश्चित है। अरिष्टासुर ने किसानों की मेहनत बर्बाद की, पर अंत में उसे अपने प्राण गँवाने पड़े।

तीसरी सीख यह है कि सच्चा साहस भय से मुक्त होता है। साँड़ को सामने देखकर भी कृष्ण के मुख पर लेशमात्र भय नहीं था, वे मुस्कुराते हुए उसके सामने डटे रहे।

चौथी सीख यह है कि छल और बुराई कभी अपना असली रूप छिपा नहीं पाती। अरिष्टासुर ने साँड़ का रूप धरा, पर कृष्ण ने उसे देखते ही उसकी असलियत पहचान ली।

कथा का सार

अरिष्टासुर के वध से कृष्ण ने वृंदावन के किसानों और ग्वालों की रक्षा की और कंस की एक और चाल विफल कर दी। यह कथा सिखाती है कि जिसे ईश्वर का आसरा है, उसे किसी बलवान शत्रु से भी भय नहीं करना चाहिए। ऐसी और कथाएँ पढ़ने के लिए इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय देखें।